अंतर्द्वंद्व में फंसे दलों का तीसरा मोर्चा

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(वी एन एस) हर चुनाव की तरह इस बार भी कुछ राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों ने तीसरा मोर्चा खड़ा करने की कवायद शुरू की है। कुल चौदह दल दिल्ली में बैठे और इस बात पर जोर दिया कि सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ एकजुट होने की जरूरत है। उद्देश्य साफ था कि बीजेपी को कैसे अलग-थलग किया जाये। कहने को यह कहा गया कि गैर कांग्रेस और गैर भाजपा गठबंधन बनाया जाये, पर ज्यादातर वक्ताओं के भाषणों में कांगे्रस के प्रति कहीं भी आलोचना के स्वर नहीं थे, जिसका साफ मतलब है कि इन दलों को कांग्रेस तो स्वीकार है, भाजपा नहीं।
कांग्रेस-भाजपा रहित तीसरे मोर्चे की कल्पना नई नहीं है लेकिन मुश्किल यह है कि इसकी पहल तब होती है, जब चुनाव सिर पर होते हैं। आपातकाल के बाद हुआ चुनाव ऐसा अकेला मौका था, जब पूरी तरह गैर कांग्रेसी दल एकजुट हुए थे। इसके 1989 में वीपी सिंह की सरकार में इसकी छाप थी। इन दो अवसरों को छोड़ दिया जाये, तो तीसरे मोर्चे का अर्थ कांग्रेस-बीजेपी रहित गठबंधन ही माना जाता है पर अभी जिस पहल की बात हो रही है उसका उद्देश्य कुल मिलाकर बीजेपी को रोकना है। वामपंथियों के अलावा समाजवादी पार्टी, जद (यू), बीजू जनता दल के नेताओं ने सांप्रदायिकता के मुद्दे पर एकजुटता की जो बात कही, वह यथार्थ से परे दिखाई देती है। यदि सांप्रदायिकता प्रमुख मसला है, तो तृणमूल कांगे्रस, बहुजन पार्टी और लालू यादव के राजद को बैठक से बाहर क्यों रखा गया? जाहिर है कि तृणमूल और वामपंथी, बसपा और सपा तथा जद यू और राजद एक साथ नहीं बैठ सकते तो फिर धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा राजनीतिक समीकरणों से ऊपर नहीं हो सकता। बैठक में शामिल अन्नाद्रमुक ने भी सांप्रदायिकता पर व्यक्त विचारों से खुद को अलग करते हुए नये मायने दिये। उसकी नजर में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों समुदायों से जुड़ी सांप्रदायिकता खतरनाक है।
हैरत की बात यह है कि संसद और बाहर कई बार मोर्चा खोलने वाले दलों ने कांग्रेस के प्रति चुप्पी साध ली। उन्हें न महंगाई कोई मुद्दा दिखा, न भ्रष्टाचार और न वंशवाद। संकेत साफ हैं। कई दल कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन का मार्ग खुला रखना चाहते हैं। भाजपा और मोदी का विरोध तो समझ में आता है किन्तु यह कैसे तय होगा कि सांप्रदायिकता के विरूद्ध धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई का नेता कौन होगा और भविष्य में कांग्रेस के प्रति इस मोर्चे का क्या दृष्टिकोण होगा? फिर यह भी सवाल हैै कि क्या यह मोर्चा परस्पर सीटों का तालमेल करेगा?
कुल मिलाकर दलों की संख्या के लिहाज से यह तथाकथित तीसरा मोर्चा बड़ा दिख सकता है किंतु चुनाव के बाद सत्ता के समीकरण में इस मोर्चे की एकता पूरी तरह संदिग्ध और अवसरवादी ही प्रतीत होती है। ऐसे में फिलहाल यह हवा के बुलबुले के सिवा कुछ नहीं लगता।