भयभीत भले न हों लेकिन लापरवाही जानलेवा हो सकती है

0
91
रवीन्द्र वाजपेयी
दिल्ली स्थित एम्स (आखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) एक तरह से देश में चिकित्सा जगत का प्रतिनिधि संस्थान माना जाता है। कोरोना संकट में इसके निदेशक डा रणदीप गुलेरिया एक अधिकृत प्रवक्ता के तौर पर सामने आये हैं। समय – समय पर वे कोरोना के बारे में अपना आकलन प्रस्तुत करते रहे हैं। चूँकि एम्स देश का सबसे बड़ा सरकारी चिकित्सा और शोध संस्थान है इसलिए उसके प्रमुख द्वारा कही बात को सरकार का नीतिगत वक्तव्य भी माना जाता है। वे डा. गुलेरिया ही हैं जिन्होंने कोरोना को लेकर व्याप्त आशावाद को सबसे पहले दूर करते हुए कह दिया था कि उसका चरम जून – जुलाई में आयेगा और हमें उसके साथ रहने की आदत डालनी होगी। उनके बयान के पहले तक ये माना जाने लगा था कि 31 मई तक कोरोना का फैलाव रुक जाएगा। सरकार द्वारा लॉक डाउन को खत्म करते हुए जनजीवन को सामान्य बनाने के लिए एक जून से बहुत सारी बंदिशें हटा ली गईं। प्रमुख मार्गों पर चुनिन्दा रेल गाड़ियाँ शुरू करने के साथ ही सड़क परिवहन खोल दिया गया। हवाई सेवा भी कुछ सेक्टर्स के लिए प्रारंभ कर दी गई। बाजार, होटल, रेस्टारेंट प्रारंभ करने की अनुमति भी दे दी गई। एक तरफ डा. गुलेरिया द्वारा कोरोना का चरम आने की चेतावनी और दूसरी तरफ लॉक डाउन हटाने का फैसला परस्पर विरोधाभासी होने से सवाल उठे। लेकिन ये मानते हुए कि दो महीने से ज्यादा तक लॉक डाउन में रहते हुए जनता कोरोना से जुड़े शिष्टाचार सीख गई होगी , लॉक डाउन में इस उम्मीद से ढील दी गई कि लोग कोरोना संबंधी अनुशासन का पालन करेंगे। लेकिन जो नजारा देखने में मिला उससे सरकार के फैसले का औचित्य सवालों के घेरे में आ गया। ऐसा ही तब हुआ जब 40 दिनों के बाद शराब की बिक्री शुरू की गई थी। बाजारों में लोग जिस लापरवाही से मंडराते दिख रहे हैं उससे तो लगता ही नहीं कि देश एक भयंकर महामारी से जूझ रहा है। सोशल डिस्टेंसिंग और सैनिटाइजर का उपयोग तो दूर की बात है, मास्क के उपयोग के प्रति भी लापरवाही साफ नजर आती है। पुलिस द्वारा चालान भी किये जाते हैं किन्तु लोग हैं कि सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे। जब शहरों की ये स्थिति है तब ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में लोगों की बेफिक्री का अनुमान सहज रूप से लगाया जा सकता है। जबकि कोरोना का फैलाव अब शहरों से इन क्षेत्रों में भी हो रहा है। प्रवासी श्रमिकों के लौटने के साथ ही लॉक डाउन में शिथिलता के बाद बाहर देश-विदेश में फंसे लोगों के घर लौटने के कारण भी कोरोना का संक्रमण अब तक अछूते रहे इलाकों तक आ पंहुचा। ऐसे में छूट का मतलब ये निकालना गलत है कि कोरोना अब मलेरिया जैसा सामान्य रोग हो गया है। डा. गुलेरिया की ताजा चेतावनी के अनुसार कोरोना का चरम जून के मध्य से शुरू होकर जुलाई के अंत तक जाने के बाद अगस्त के पहले हफ्ते से उसमें गिरावट आने की उम्मीद है। अन्य सूत्र भी ये मानकर चल रहे हैं कि कोरोना पर प्रभावी नियंत्रण सितम्बर आने पर ही महसूस होगा। लेकिन साथ ही ये भी चेताया जा रहा है कि कोरोना अंतिम रूप से विदा नहीं होगा। और कम से कम आगामी एक वर्ष तक हमें उससे बचाव हेतु सभी सावधानियां बरतनी होंगीं। इस बारे में अब घुमा-फिराकर बात करने की बजाय सरकार द्वारा भी साफ संकेत दे दिए गए हैं कि कोरोना से मुक्ति में देर है और वह पूरी तरह जाने वाला नहीं है। डा.गुलेरिया का ताजा बयान ऐसे समय आय है जब गत दिवस 18 हजार नये मामलों के साथ ही कुल कोरोना संक्रमितों की संख्या 5 लाख तक पहुंचने के कगार पर आ गई। नये संक्रमणों की संख्या रोज बढ़ने से अब ये कहा जा सकता है कि जुलाई बीतते – बीतते देश में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 20 से 25 लाख तक पहुंच सकता है। निश्चित रूप से वह एक भयावह संख्या होगी लेकिन इसी के साथ ये तथ्य राहत पहुँचाने वाला है कि उनमें से तकरीबन 60 फीसदी स्वस्थ होकर लौट चुके होंगे। लेकिन जब तक नये संक्रमण का आंकड़ा ठीक होने वालों की संख्या से कम नहीं होता तब तक खतरा बरकरार रहने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। चूंकि देश भर में जांच की संख्या भी दिन ब दिन बढ़ रही है इसलिए भी नये मामले ज्यादा आने लगे हैं। कुल मिलाकर कोरोना में गिरावट के लिए अगस्त तक का इन्जार अवश्यम्भावी हो गया है। आज ही सरकार ने 12 अगस्त तक नियमित रेल सेवा बंद रखने की घोषणा कर तत्संबंधी संकेत भी दे दिए। लेकिन केवल डा. गुलेरिया और सरकार के अनुमान ही कोरोना के प्रकोप को नहीं रोक पायेंगे। इसके लिए जनता को भी अपने स्तर पर सतर्क और अनुशासित रहना होगा। सावधानी हटी , दुर्घटना घटी वाला नारा कोरोना के सन्दर्भ में बहुत ही प्रासंगिक हो चला है। कुछ लोग ये कहने से भी बाज नहीं आ रहे कि सरकार ने लम्बे लॉक डाउन के बाद अब जनता को बेसहारा छोड़ दिया। लेकिन ये बात बिलकुल सही है कि उसके बाद का लॉक डाउन समाज में अव्यवस्था और अराजकता का कारण बन जाता। दो माह से भी अधिक लोगों को घरों में बंद रखने के कारण कोरोना को प्रारंभिक अवस्था में नियंत्रित रखा जा सका। तब तक उससे लड़ने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा खड़ा करने का काम किया गया। लेकिन जिस तेजी से नये मामले निकल रहे हैं उसके बाद भी कोरोना के हॉट स्पॉट देश के लगभग एक दर्जन महानगरों और नगरों में ही हैं। ऐसे में यदि जनता अपने स्तर पर सावधानी बरते तो वह इस जंग में सबसे बड़ा सहयोग होगा। कोरोना के फैलाव को रोकना काफी कुछ हमारे हाथ में है। कुछ शहरों और राज्यों ने ऐसा करके दिखा भी दिया है। भले ही कोरोना को लेकर आम जनों में शुरुवाती दौर में देखा गया डर नहीं रहा लेकिन जरा सी लापरवाही अपने और अपनों के लिए जानलेवा हो सकती है और इसीलिये हमें कोरोना से बचने के प्रति गम्भीर रहना होगा।