मध्यम वर्ग करे पुकार , हमको भी कुछ दे सरकार

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 रवीन्द्र वाजपेयी
भारत का विशाल मध्यम वर्ग पूरी दुनिया के लिये कौतुहल और अध्ययन का विषय रहा है | The Great Indian Middle Class जैसी पुस्तकें भी लिखी गईं हैं | ये भारतीय समाज का वह वर्ग है जो बाजार से लेकर सरकार तक को प्रभावित करता है | पिछले तीन दशक में भारत की जो बदली हुई तस्वीर नजर आती है उसका बड़ा कारण यही मध्यम वर्ग है | सड़कों पर बढ़ती जा रही कारें और मोटर सायकिलों के अलावा मोबाईल , लैपटॉप , एलईडी , वाशिंग मशीन , फ्रिज , एयर कंडीशनर जैसी चीजों का सबसे बड़ा खरीददार यही तबका है | फ़्लैट , डुप्लेक्स खरीदने या मकान के निर्माण में भी सबसे आगे मध्यम वर्ग ही नजर आता है | अच्छे स्कूलों में भीड़ और उच्च शिक्षा के प्रति बढ़ता रुझान भी देश में इसी वर्ग की देन है | घरेलू पर्यटन के अलावा विदेश यात्रा करने वालों में हो रही उल्लेखनीय वृद्धि में भी मध्यमवर्गीय परिवारों का योगदान है जो अपने सीमित दायरे से निकलकर देश के बाहर पैर रखने की महत्वाकांक्षा से प्रेरित हो चले हैं | और यही तबका है जो भारत की बैंकिंग व्यवस्था को जबरदस्त मंदी के बावजूद भी गतिशील बनाये रखता है | उदारवाद की कोख से जन्मे उधारवाद को दिल खोलकर अपनाते हुए अपनी छोटी – छोटी इच्छाओं और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बैंक से कर्ज लेकर उसकी ईएमआई ( मासिक किश्त ) चुकाने में आगे रहने वाला मध्यम वर्ग भारत में बाजारवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा संरक्षक बनकर सामने आया है | ये कहने में लेश मात्र भी अतिशयोक्ति नहीं है कि आधुनिक भारत को विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाने में इसी मध्यम वर्ग ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया , अपनी सोच को पहले राष्ट्रीय और फिर वैश्विक बनाकर |
पाठक सोच रहे होंगे कि मैं भारतीय समाज के किसी सर्वेक्षण की रिपोर्ट पेश करने जा रहा हूँ | लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है | मेरा आशय मौजूदा माहौल में इस मध्यम वर्ग के मन में उठ रही टीस को शब्द देकर राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ना मात्र है |
कोरोना संकट आते ही जब पूरे देश में लॉक डाउन लागू हुआ तब उच्च वर्ग तो आराम से घर बैठ गया | काम – धंधा बंद हो जाने से आर्थिक नुकसान उसे भी खूब हुआ किन्तु ये माना जाता है कि उसके पास इतने संचित संसाधन थे कि ज्यादा कठिनाई नहीं झेलनी पड़ी | दूसरी तरफ निम्न आय वर्ग या जिसे मजदूर और कुशल श्रमिक कहा जा सकता है , उसे लॉक डाउन के साथ ही सरकार ने पहले सस्ता और फिर मुफ्त राशन के साथ रसोई गैस देकर उपकृत कर दिया | कुछ नगद राशि भी उसके खाते में जमा की गई |
लेकिन मध्यम वर्ग को क्या मिला ?
और यही प्रश्न है जो समाज के उस बड़े वर्ग को उद्वेलित कर रहा है जिसके मन में ये पीड़ा अंदर तक समा चुकी है कि अपनी शक्ल – सूरत थोड़ी सी संवारने का दंड उसे भोगना पड़ रहा है | विडम्बना ये है कि न तो ये तबका अमीरों की बराबरी से बैठने की हैसियत में है और न ही गरीबों से हिल -मिलकर रहना उसके लिए सम्भव रहा | ऐसे में न तो उसे संपन्न वर्ग वाली हैसियत मिलती है और न ही गरीबों पर होने वाली इनायत का लाभ खाते में आता है | इस वर्ग में केवल सरकारी या निजी क्षेत्र के कर्मचारी ही नहीं वरन स्वरोजगार के माध्यम से अपना परिवार पालने वाले प्रोफेशनल और व्यापारी भी हैं |
इस वर्ग के मन में ये बात तेजी से घर करती जा रही है कि सरकार को उसकी चिंता नहीं है | लॉक डाउन में सरकारी कर्मचारी भले घर बैठा रहा लेकिन उसे वेतन – भत्ता मिलता रहा | जबकि इसी वर्ग के बाकी लोगों को भारी नुकसान हुआ | निजी क्षेत्र में नौकरी करने वालों पर छटनी या वेतन कटौती की मार पड़ी | दुकानदार या अन्य पेशेवरों का कारोबार भी बंद होने से उनकी आय का साधन बंद हो गया | लेकिन उसकी दुविधा ये रही कि वह किसी भी प्रकार की सहायता से वंचित हो गया | बीते अनेक दशकों में बनाई उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा उसके पांवों में जंजीर बन गयी | न तो वह प्रवासी मजदूर के तौर पर समूचे राष्ट्र की सहानुभूति का पात्र बन सका और न ही गरीबों को मिलने वाली सहायता उस तक पहुँची |
लॉक डाउन खत्म होने के बाद निजी नौकरी या स्वयं का व्यवसाय पुराने स्वरूप में नहीं आ सका | और ऊपर से बिजली वाले बिल जमा करने का दबाव बना रहे हैं , निजी क्षेत्र की कम्पनी ने एक दो मैसेज भेजने के बाद घर का वाईफाई बंद कर दिया , ऑन लाइन पढ़ाने वाले विद्यालय बच्चे की फीस के लिए परेशान कर रहे हैं | सोसायटी का शुल्क और नगर निगम के टैक्स के लिए लगातार टेलीफोन पर तकादा किया जाने लगा है | जीएसटी की देनदारी के लिये मिली मोहलत भी पूरी होने को आई | बैंक से लिए विभिन्न कर्जों की ईएमआई के लिए भले ही छह महीने की मोहलत मिल गई लेकिन इस अवधि का ब्याज तो सिर पर लद ही रहा है |
जो बच्चे बाहर कोचिंग करने गये थे वे लौट आये हैं | फीस तो कोचिंग सेंटर ने अग्रिम ही ले ली थी | यद्यपि पढ़ाई ऑन लाइन करवा तो रहे हैं लेकिन उसका अपेक्षित प्रभाव न दिखने से बच्चे के भविष्य की चिन्ता सताने लगी है | कोटा या पुणे में जिस कमरे को उसने किराये पर ले रखा था उसका मालिक किराया मांगने फोन कर रहा है |
लॉक डाउन खुले तीन सप्ताह होने को आये लेकिन किस्मत और ज़िन्दगी के जो दरवाजे 25 मार्च को बंद हुए वे खुलने का नाम नहीं ले रहे | बाजार खुलते ही रोजमर्रे की चीजें महंगी होने से खर्च बढ़ गया | सब्जी – फल सब रंग दिखाने लगे | जिन घरेलू नौकरों को लॉक डाउन के नाम पर एक माह का वेतन देकर नमस्ते कह दिया था वे काम पर लौटना चाहते हैं लेकिन किसी न किसी वजह से उन्हें टरकाना पड़ रहा है | और ऊपर से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में रोजाना की वृद्धि डराये हुए है |
ऐसी और भी छोटी – बड़ी समस्याएं हैं जिनसे मध्यमवर्गीय इंसान जूझ रहा है किन्तु उसके दर्द को न कोई समझने वाला है और न दूर करने वाला | प्रश्न ये है कि सरकार ने क्या ये मान लिया है कि मध्यम वर्ग का अर्थ केवल शासकीय कर्मचारी हैं जिन्हें इस दौरान किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं हुई | हालांकि ये मान लेना गलत होगा कि उच्च आय वर्ग और गरीबों को किसी भी तरह से परेशान नहीं पड़ा । लेकिन ये भी सही है कि सरकार का पूरा फोकस प्रत्यक्ष तौर पर तो उच्च वर्ग की शिकायतें सुनने और उन्हें दूर करने में है क्योंकि वह ज्यादा टैक्स के साथ ही रोजगार प्रदाता भी है | इसके साथ ही वह गरीबों के खाने , रहने , रोजगार से जुड़े राहत और पुनर्वास के कार्यों को भी सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है । लेकिन मध्यम वर्ग को इस दौरान किसी भी प्रकार की ऐसी मदद नहीं मिली जिससे उसके सिर पर आयी मुसीबतों का बोझ कुछ कम हो सके |
वैसे भी इस वर्ग के प्रति सत्ता सदैव लापरवाह रही है | बजट में कहने को तो प्रत्यक्ष करों में राहत के नाम पर खूब सौगातें दी जाती हैं लेकिन दूसरे हाथों से ब्याज सहित छीन भी ली जाती हैं | वैसे तो यह वर्ग अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में उलझा रहकर इस सबके बारे में उतना नहीं सोच पाता किन्तु लॉक डाउन के तकरीबन सवा दो महीनों में घर में बैठे – बैठे उसे अपने साथ होने वाले उपेक्षापूर्ण व्यवहार पर विचारने का जो अवसर मिला उसने एक तल्खी उसके मन – मष्तिष्क में समूची व्यवस्था के प्रति भर दी है |
उसका ये सोचना गलत नहीं है कि सरकार किसानों के कर्जे माफ कर देती है , करोड़ों का कर्ज न लौटाने वालों को भी ढेर सारी रियायतें देती है लेकिन मध्यमवर्ग को देते समय उसका हाथ तंग हो जाता है | केंद्र में आसीन मौजूदा सत्ता के प्रति इस वर्ग का शुरू से झुकाव रहा है लेकिन इसका कोई प्रतिफल उसे नहीं मिलना एक तरह की कृतघ्नता ही है | ऐसे में यदि वह उदासीनता ओढ़ ले तो बड़े बदलाव की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता |
आखिर जो जनमत बनाता है वह बिगाड़ भी तो सकता है |