पब्लिक की ख़ैरियत और कैफ़ियत…..

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ज़हीर अंसारी
हाल ही में एक फ़िल्म आई थी ‘छिछोरे’ जिसमें हीरो स्व. सुशांत सिंह राजपूत ने बेहतरीन अदाकारी की है। उन पर फ़िल्माया गाना ‘ख़ैरियत पूछो, कभी तुम कैफ़ियत पूछो’ काफ़ी लोकप्रिय हुआ है। इस गाने के बोल से याद आता है कि अब सिसायत में जनता की ख़ैरियत और कैफ़ियत (विवरण) पूछने का रिवाज ख़त्म सा हो गया है। देश में नए तरीक़े के सियासत चालू हो गई है। जिसे आप ‘थोपन राजनीति’ कह सकते हैं। अमूमन सभी पार्टियां और उनके नेता जनता की ख़ैरियत और कैफ़ियत पूछने से परहेज़ करने लगे हैं। पार्टियों के नेता खुद की ख़ैरियत और कैफ़ियत का वजन कर अपना प्रतिबद्धता और अपनी वचनबद्धता तय कर लेते हैं। प्रतिबद्धता जिसे दिखा-दिखाकर टिकिट के लिए अपने नेताओं की परिक्रमा करते हैं और वचनबद्धता जिसकी नुमाइश करके जनता से घिघिया कर वोट माँगते हैं। वोट के बाद जीत मिलते ही कुछ नेताओं को सियासी बाज़ार में अपनी मार्केट वैल्यू का सूचकांक ऊँचा लगने लगता है। लिहाज़ा उच्च दाम आफ़र मिलते ही कुछ पद, पैसा या पावर लोभी नेता अपनी प्रतिबद्धता और वचनबद्धता को गठरी में बांधकर गटर में फेंक देते हैं। इसके पहले नोटों की शैया पर अपनी अंतरात्मा को सुला देते हैं।
इस तरह के बीमार नेता पहले छोटी-मोटी क्षेत्रीय पार्टियों में मिला करते थे मगर आजकल देश में सबसे ज़्यादा वक्त तक शासन करने वाली कांग्रेसी पार्टी में काफ़ी मिलने लगे हैं। गोवा, कर्नाटक, मणिपुर, गुजरात और मध्यप्रदेश इसके ताज़ा मिसाल है, जहां के कतिपय कांग्रेसी विधायकों ने अपनी ख़ैरियत और कैफ़ियत का ख्याल करते हुए पार्टी की प्रतिबद्धता और जनता से की गई वचनबद्धता से मुकर गए। जिस तेज़ी से कांग्रेसी विधायक या नेता बिक रहे हैं वह बेमिसाल है। कांग्रेसी फटाफट क्यों बिक रहे हैं इस सवाल का सटीक जवाब कई जानकारों से भी नहीं मिल सका।
अब बात करते हैं ‘थोपन राजनीति’ की। इस राजनीति से आशय यह है कि जहां-जहां जिस पार्टी के सरकार है वहाँ-वहाँ भी जनता के बीच जाकर उनकी ख़ैरियत या कैफ़ियत नहीं पूछी जा रही है। जनता और प्रदेश की तरक़्क़ी के नाम पर बंद कमरों में नीतियाँ बनाई जाकर जनता पर थोप दी जा रही है। यही रवैया दलों के ज़मीनी कार्यकर्ताओं के साथ हो रहा है। कुलमिलाकर यह कहा जा सकता है कि जनता और दलीय कार्यकर्ताओं की ख़ैरियत और कैफ़ियत पूछने का चलन सियासत से आऊट हो चुका है। वक्त आ गया है कि जनता अपनी ख़ैरियत और कैफ़ियत का खुद ख्याल रखे।