युद्ध हुआ तो चीन की पराजय तय

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प्रेम शर्मा 

चीनी राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। विवादास्पद प्रत्यर्पण विधेयक पर हांगकांग के हिंसक प्रदर्शन पूरी दुनिया देख चुकी है। ताइवान में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी की चुनौती जटिल होती जा रही है। शिनजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों के खिलाफ सरकार की नीतियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना बढ़ी है। रही सही कसर कोरोना महामारी ने पूरी कर दी। दुनिया में चीन की छवि रसातल में पहुंच चुकी है। लम्बे अरसे तक पाकिस्तान को अपना मोहरा बनाकर भारत के खिलाफ उकसाने वाला चीन अब अपनी चाल में नेपाल को भी शामिल  कर चुका है। गलवन भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद दोनो देषों के बीच  आशंका  बढ़ गई हैै। कई देशों  की नजर में किरकिरी बन चुके चीन के लिए युद्ध की स्थिति में हार्वर्ड  विश्व  विद्यालय की हालियाॅ रिपोर्ट वह खतरे की घंटी है जिसमें चीन के मुकाबले भारत को मजबूत बताया गया है। भारत की सरकार भी मजबूत स्थिति में होने के कारण सरकार को निर्णय लेने में भी कोई बाधा नही है। अगर वाकई भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ तो चीन की पराजय  निश्चित  है। हार्वड विष्वविद्याल की रिपोर्ट के मुताबिक 1962 की तुलना मे भारत को चीन के खिलाफ पारंपरिक लाभ हुआ है। एक अन्य अध्ययन में भारतीय और चीनी रणनीतिक क्षमताताओं के तुलनात्मक अध्ययन और दोनों देषों की परमाणु क्षमताओं, थल,वायु सेना में भारत का पल्ला भारी है। चीन के मुकाबले के लिए भारत की थल सेना उत्तरी, मध्य और पूर्वी कमांड में संगठित है। चीन से लगती सीमा के पास भारतीय सेना के हमलावर बल की संख्या करीब सवा दो लाख है। इनमें से लद्दाख में 34 हजार कर्मी टी-72 टैंक ब्रिगेड और करीब एक हजार कर्मी अरूणाचल प्रदेश  में ब्रहमोस मिसाइल रेजीमेन्ट में है। वही इण्डियन एयरफोर्स के 270 लडाकू विमान और 68 अटैक एयरक्राट चीन से लगती अपनी सीमा पर मौजूद है। भारतीय सेना और एयरफोर्स चीनी सीमा के करीब है जिससे कम समय में चीन के हमले का जबाब देने के लिए भारतीय सेना हर समय तैयार है। यही नही बीते 17 अप्रैल को भारत सरकार ने एक चैंकाने वाले फैसले के तहत देश में होने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों को उन पड़ोसियों के लिए और सख्त कर दिया जिनकी सीमाएं आपस में मिलती हैं। नए नियम के तहत किसी भी भारतीय कंपनी में हिस्सा लेने से पहले सरकारी अनुमति अनिवार्य है। इस नीति का सर्वाधिक प्रतिकूल असर चीन पर पड़ा है। अमेरिका से चल रहे ट्रेड वार ने देश की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाई है। कोरोना से डर से दुनिया के तमाम देशों की कंपनियां वहां काम करने से कन्नी काटती दिख रही हैं। कोई देश चीनी उत्पाद खरीदने से पहले सौ बार सोच रहा है। आर्थिक मोर्चे पर पैदा हुई ये दिक्कतें राजनीतिक साबित होती दिख रही है। चीनी नागरिकों में शासन के प्रति असंतोष स्पष्ट दिखने लगा है। विशेषज्ञों की मानें तो कठिन परिस्थितियों के बीच जनता के अंदर राष्ट्रवाद जगाने का चीनी राष्ट्रपति का यह एक तरीका हो सकता है। तभी दक्षिण चीन सागर, ताइवान और भारत, हर सीमा पर चीन इसी तरह आक्रामक रुख-रवैया अपना रहा है। चीन को लगता है कि उसकी चाल किसी को समझ में नहीं आती है, लेकिन यह उसका महज भ्रम है। पांच मई, 2020 को जब भारत समेत दुनिया के ज्यादातर देश कोरोना वायरस के संक्रमण की दहशत से भयभीत थे, उसी दौरान चीन की पीपुल्स आर्मी के 200 से ज्यादा जवान पूर्वी लद्दाख स्थित पैंगोंग झील के पास जानबूझकर भारतीय सैनिकों के आमने सामने हो गए। शायद चीनी सैनिकों को यह लग रहा था कि भारतीय सैनिक उनके सामने आने पर इधर-उधर निकल जाएंगे, उनसे टकराएंगे नहीं और इस तरह चीनी सैनिक भारतीय सैनिकों पर अपना मनौवैज्ञानिक दबदबा कायम कर लेंगे। किंतु ऐसा नहीं हुआ।
चीनी सेना ने लद्दाख की गलवन घाटी में जैसी घिनौनी और नीच हरकत की, उसके बाद भारत के सामने इसके अलावा अन्य कोई उपाय नहीं कि उसे माकूल जवाब दिया जाए। आनन-फानन विश्व महाशक्ति बनने के नशे में चूर तानाशाह चीन को जवाब देने के कई तरीके हैं और उनमें से एक प्रभावी तरीका उसकी आर्थिक ताकत पर पूरी शक्ति से प्रहार करना है। यह अच्छा है कि इसकी शुरुआत कर दी गई। बीएसएनएल के 4जी टेंडर से चीनी कंपनियों को बाहर रखने के फैसले के बाद कानपुर से मुगलसराय के बीच फ्रेट कॉरीडोर प्रोजेक्ट में चीनी कंपनी का ठेका रद्द करने का फैसला सही दिशा में उठाया गया कदम है। ऐसे कदमों का सिलसिला तेज कर चीनी कंपनियों को चुन-चुनकर बाहर किया जाना चाहिए। इसके लिए जरूरी हो तो नए नियम-कानून बनाए जाने चाहिए। चीनी कंपनियों की ओर से हासिल किए गए ठेके और उनके साथ हुए समझौते प्राथमिकता के आधार पर रद्द होने चाहिए। क्या यह सही समय नहीं कि महाराष्ट्र सरकार और चीन की वाहन निर्माता कंपनी ग्रेट वॉल मोटर्स के बीच हुआ करार रद्द किया जाए? दुर्भाग्य से यह करार उसी दिन हुआ, जिस दिन चीनी सेना ने गलवन घाटी में शर्मनाक ढंग से भारत की पीठ पर वार किया। बिगड़ैल और अहंकारी चीनी नेतृत्व को यह पता चलना ही चाहिए कि उसे धोखेबाजी की कीमत चुकानी पड़ेगी। आर्थिक-व्यापारिक मामलों में चीन पर निर्भरता कम करने के लिए यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि आत्मनिर्भर भारत अभियान का एक बड़ा लक्ष्य ही यह बने कि चीन से आयातित माल के भरोसे नहीं रहना और देश में काम तलाश रहीं उसकी कंपनियों पर हर हाल में अंकुश लगाना है। वैसे भी इस छल-कपट भरी नीति का मकसद हागंकांग और ताइवान को तिब्बत की तरह हड़पना है। भारत को विश्व मंचों पर यह संदेश देने के लिए भी सक्रिय होना होगा कि चीन अपनी तानाशाही दुनिया पर नहीं थोप सकता और उसे विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा बनने से रोकने की सख्त जरूरत है। बहरहाल इस विश्वासघाती घटना के बाद चीन डैमेज कंट्रोल की कोशिश में जुट गया और सुबह ही मेजर जरनल स्तर की बातचीत की पेशकश की। जब बातचीत के दौरान चीन को लगा कि भारत किसी भी तरह से न तो कमजोर होता लग रहा है, न झुकने को तैयार है तो दिन के करीब एक बजे जब यह बात दुनिया को उजागर हो गई कि चीन ने धोखे से हमारे सैनिकों पर हमला करके 20 से ज्यादा सैनिकों मार डाला है, तो पूरी दुनिया में चीन के प्रति गुस्से की लहर दौड़ गई। बीते कुछ दिनों में चीनी सेना ने लद्दाख के साथ सिक्किम में भी भारतीय सीमा में छेड़छाड़ की जो कोशिश की वह महज दुर्योग नहीं हो सकती। चीन भारतीय सीमाओं का अतिक्रमण करने की कोशिश जानबूझकर कर रहा है, यह इससे पता चलता है कि उसने एलएसी पर यथास्थिति बनाए रखने के लिए बनी सहमति का उल्लंघन किया। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि चीनी सेना ने योजनाबद्ध तरीके से भारतीय सैनिकों पर हमला किया। चीन के हमलावर रुख के पीछे कई कारण नजर आते हैं। इसमें कोरोना वायरस फैलाने में अपनी संदिग्ध भूमिका से दुनिया का ध्यान हटाना चाहता है। इस वायरस के संक्रमण से न केवल लाखों लोग मारे गए हैं, बल्कि दुनिया आर्थिक मंदी की चपेट में भी आ गई है। कई विकसित देश उसे आड़े हाथ ले रहे हैं। चीन को लगता है कि भारत उसके खिलाफ विकसित देशों संग खड़ा हो रहा है। ध्यान रहे अमेरिकी राष्ट्रपति ने हाल में जहां चीन को कठघरे में खड़ा किया वहीं भारतीय प्रधानमंत्री को जी-7 सम्मेलन में निमंत्रित किया।चीन से त्रस्त ऑस्ट्रेलिया भी भारत से अपनी निकटता बढ़ा रहा है। चीन की दादागीरी से परेशान जापान पहले से ही भारत के साथ है। चीन इससे भी सहमा है कि क्वॉड के जरिये भारत अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ मिलकर उसकी घेरेबंदी कर रहा है, लेकिन गलवन में उसकी हरकत से तो भारत इस गठबंधन को मजबूती देना ही पसंद करेगा। चीन इसे लेकर भी परेशान दिख रहा कि भारत दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में अपने आधारभूत ढांचे को मजबूत कर रहा है। बीते छह साल में मोेदी सरकार ने चीन से लगती सीमा पर आधारभूत ढांचे के निर्माण में न केवल खासी तेजी दिखाई है, बल्कि यह भी साफ किया है कि यह काम उसकी प्राथमिकता में शामिल है। हालांकि चीन यह अच्छे से जानता है कि आज का भारत 1962 वाला भारत नहीं है, लेकिन उस पर भरोसा न करने में ही भला है।