हिटलर वाली गलती दोहरा बैठे जिनपिंग

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 रवीन्द्र वाजपेयी
कोरोना के विश्वव्यापी प्रसार के साथ ही चीन पर उँगलियाँ उठने लगीं | हालांकि अब तक ये साबित नहीं हो सका कि इसके पीछे चीन का षडयंत्र था । लेकिन इस वायरस की जानकारी विश्व समुदाय को देर से देने का आरोप जरुर उस पर है | प्रारम्भ में कोरोना को चीन द्वारा जैविक हथियार बनाकर तीसरे विश्व युद्ध का पूर्वाभ्यास किये जाने की आशंका व्यक्त की गयी | कुछ लोगों ने उसे अतिशयोक्ति बताते हुए हवा में उड़ा दिया किन्तु जब चीन ने कोरोना की उद्गम स्थली वुहान की लेबोरेट्रीज के निरीक्षण के साथ अपने यहाँ कोरोना संक्रमित हुए लोगों विशेष रूप से मरने वालों की जानकारी छिपाई तब संदेह गहराने लगा | और फिर तो बात यहाँ तक बढ़ी कि विश्व स्वास्थ्य संगठन तक चीन का बचाव करने के कारण विवादग्रस्त हो गया |
जब यूरोप और अमेरिका सहित बाकी देशों में कोरोना चरम पर था तब चीन ने उससे मुक्त होने का दावा करते हुए पीड़ित देशों की सहायता का नाटक भी रचा | तभी विश्व समुदाय को लगा कि चीन सबकी अर्थव्यवस्था चौपट करने के बाद अपना आर्थिक साम्राज्य स्थापित करने की रणनीति पर चल रहा है | दुनिया की सभी बड़ी सामरिक और आर्थिक महाशक्तियां बीते अनेक महीनों से कोरोना से जूझने में व्यस्त होने से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को दुनिया का चौधरी बनने के सपने आने लगे |
उसने ताईवान को चारों तरफ से घेरने के साथ ही हांगकांग के लिए विवादास्पद कानून पारित करते हुए अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी को ठेंगे पर रखने के इरादे दिखा दिए | जिस वियतनाम ने चीन की मदद से अमेरिका के विरुद्ध विजय हासिल की वह भी चीन के विस्तारवादी रवैये के कारण उसका शत्रु बन बैठा | जबकि वह भी साम्यवादी देश ही है | कम्बोडिया , इंडोनेशिया , फिलीपींस और दक्षिण कोरिया ही नहीं अपितु जापान और ऑस्ट्रेलिया तक चीन की दादागिरी से भयभीत हैं | मंगोलिया पर भी उसकी गिद्ध दृष्टि है | रूस कभी – कभार अमेरिका के विरोध की खातिर उसका साथ दे देता है लेकिन वह भी उसकी बढ़ती ताकत को पसंद नहीं करता |
चीन के पड़ोस में भारत जैसी उभरती हुई महाशक्ति भी है जिससे उसके व्यापारिक सम्बन्ध मजबूत होने के अलावा शीर्षस्थ नेताओं के स्तर पर संपर्क और संवाद भी अच्छा रहा है | लेकिन उसने भारत के सभी पड़ोसियों को किसी न किसी एहसान के तले दबाकर उसके साथ खड़े होने से रोक दिया | केवल बांग्ला देश और म्यांमार ही हैं जो अभी भी भारत के प्रति द्वेषभाव नहीं दिखा रहे | रही बात नेपाल की तो वहां राजशाही का अंत होते ही जो साम्यवादी सरकार बनी वह चीन द्वारा प्रायोजित थी | पाकिस्तान तो खैर उसका दत्तक पुत्र जैसा है | जिनपिंग को लगता था कि वे नरेन्द्र मोदी के साथ याराना कायम कर अपनी वन बेल्ट वन रोड परियोजना को पूरा कर लेंगे | लेकिन ऐसा नहीं हुआ | भारत ने चीन के इस महत्वाकांक्षी अभियान में शामिल होने से इंकार कर दिया | और तो और जिस अक्साई चिन से वह गुजरने वाली है उसे अपना भूभाग बताकर विरोध भी जता दिया | इस कारण वन बेल्ट वन रोड प्रकल्प चीन के गले की हड्डी बन गया है |
इस तरह भारत उसकी आँखों में चुभ रहा था | चीन से सटी सीमा पर सड़क , पुल , हवाई पट्टी आदि के विकास के अलावा मोदी सरकार ने बीते छह सालों में सेना के लिए जिस बड़े पैमाने पर अस्त्र – शस्त्र , तोपें , रडार प्रणाली , हेलीकाप्टर , लड़ाकू विमान खरीदे उसके कारण भी उसे भारत में अपना प्रतिद्वंदी नजर आने लगा | इसलिए वह राजनयिक और व्यापारिक सम्बन्धों को बनाये रखते हुए भी भारत की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करता रहा | डोकलाम जैसी हरकतें तो आये दिन होती रही हैं |
दरअसल चीन कोरोना काल में कुछ ज्यादा ही उड़ने लगा और उसने आपदा के इस दौर में अमेरिका के भीतर अश्वेत समुदाय के अफ्रो – अमेरिकन लोगों को भड़काकर भयंकर दंगे करवा दिए | अमेरिका में कार्यरत चीनी कम्पनियों द्वारा कतिपय वामपंथी उग्रवादियों के जरिये दंगाइयों को भरपूर मदद की गयी | जिससे अमेरिका में गृह युद्ध के हालात बन गये | स्मरणीय है वामपंथियों द्वारा ऐसी ही स्थिति भारत में भी नागरिकता संशोधन कानून और जनसँख्या रजिस्टर के विरोध में उत्पन्न कर दी गई थी | दिल्ली स्थित शाहीन बाग़ में चला धरना इसका बड़ा उदाहरण था |
चीन को भारत का अमेरिका के करीब जाने का पैंतरा भी घोर आपत्तिजनक लगता है | कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने के साथ ही लद्दाख को केंद्र शासित राज्य बनाये जाने से भी उसके पेट में जबरदस्त मरोड़ उठा | इसे संरासंघ में उठाने की कोशिश भी उसने की किन्तु पाकिस्तान के अलावा उसे मलेशिया और टर्की भर का समर्थन मिला | यहाँ तक कि प्रमुख अरब देशों तक ने भारत का साथ दिया |
कोरोना के कारण विश्व बिरादरी में पूरी तरह अलग थलग पड़ चुके चीन की सबसे बड़ी नाराजगी अमेरिका द्वारा भारत को जी 7 देशों की बैठक में बुलाये जाने पर है | उसने भारत पर `अमेरिका की चाल में फंसने का आरोप लगते हुए परिणाम भुगतने की चेतावनी तक दे डाली | नरेंद्र मोदी द्वारा आस्ट्रेलिया के साथ प्रशांत महासागर में संयुक्त सैन्य अभ्यास की तैयारी भी उसे नागवार गुजर रही है |
जब उसे ये लगा कि एक तो भारत उसकी किसी भी आपत्ति को भाव नहीं दे रहा और उलटे पाक अधिकृत कश्मीर के गिलगित , बाल्टिस्तान और चीन के कब्जे वाले अक्साई चिन को हासिल करने इरादा खुले आम व्यक्त कर रहा है तो वह बौखला उठा | लगभग दो महीने से भारतीय सीमा पर अचानक सैन्य गतिविधियाँ बढ़ाने के पीछे उसका मकसद किसी न किसी तरह भारत को घुटनाटेक करवाकर अमेरिका से दूर करना था | परन्तु भारत ने जबरदस्त मोर्चेबंदी करते हुए बराबरी की टक्कर की स्थितियां पैदा कर दीं | बीते 15 जून को गलवान घाटी में हुई मुठभेड़ से जहाँ चीन का छिछोरापन जाहिर हुआ वहीं उसे भारत की सामरिक शक्ति और आत्मविश्वास का भी एहसास हो गया |
संभवतः कोरोना के कारण तमाम शक्तिशाली और सम्पन्न देशों की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा जाने से उत्साहित चीन को ये लगने लगा कि अब वह कुछ भी कर सकता है | लेकिन कहावत है कि होशियार कौआ भी कभी – कभी गलत जगह बैठ जाता है | आज जिनपिंग की भी स्थिति वैसी ही है | एक साथ ही हांगकांग , ताईवान , अमेरिका , भारत , वियतनाम और आस्ट्रेलिया आदि से एक साथ पंगा लेने के बाद अब वह बुरी तरह फंस गया है | उसका आर्थिक ढांचा अन्य देशों के सामान का उत्पादन करने पर टिका हुआ है | कोरोना के बाद अनेक बड़े ब्रांड वहां से कारखाना समेटकर वियतनाम , इंडोनेशिया , थाईलेंड , भारत आदि जाने की तैयारी कर रहे हैं | अमेरिका ने भी अपने सभी समर्थक देशों से चीन में किये निवेश को वापिस लेने कह दिया है | जापान ने तो चीन छोड़ने वाली कम्पनियों को भारी प्रोत्साहन राशि देने का आश्वासन दिया है |
इधर भारत में जिस तरह से जनता में चीन विरोधी भावनाएं जोर पकड़ रही हैं उनसे चीन भी परेशान है | तभी वह बातचीत के जरिये विवाद सुलझाने की बात कर रहा है किन्तु गलवान में जो कुछ हुआ और भारत ने जिस तरह उस पर कड़क रवैया अख्तियार किया उसके बाद से चीन बुरी तरह फंस गया है |
उसे ये लगता था कि कोरोना संकट से घिरा होने से विश्व भारत के साथ खड़े होने लायक नहीं रहेगा | और वह खुद भी इस महामारी के कारण सीमा पर अपेक्षित ताकत नहीं दिखा सकेगा । लेकिन उसे निराशा हाथ लगी |
इस प्रकार कोरोना के कारण हलाकान हुई दुनिया को अपनी मर्जी से हांकने का जिनपिंग का इरादा चीन के लिए मुसीबत का सबब बन गया है | हांगकांग के साथ ही ताईवान को हड़पने की उसकी चाल के विरुद्ध दुनिया भर लामबंद हो रही है । वहीं तिब्बत की आजादी भी एक बार फिर विश्व राजनीति में चर्चा का विषय बन रही है | अमेरिका ने हांगकांग के अलावा चीन में उईगर मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों का मामला उठाकर भी जिनपिंग की चिंता बढ़ा दी है |
कुल मिलाकर कोरोना में उलझी दुनिया पर अपना झंडा फहराने के फेर में चीन गहरे दलदल में जाकर फंस गया है | अभी तक उसकी आर्थिक तरक्की से प्रभावित देशों को उसकी धूर्तता समझ में आते ही सभी उससे दूर रहने की मानसिकता पाल बैठे हैं | बड़ी बात नहीं दुनिया पर राज करने की जल्दबाजी में जिनपिंग अपने देश में ही सत्ता से हाथ न धो बैठें |
एक साथ सभी मोर्चे खोलने के कारण वे भी हिटलर वाली गलती दोहरा बैठे हैं |