बिहार: ‘रणछोड़’ नीतीश और ‘धृतराष्ट्र’ लालू यादव…!

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अजय बोकिल
देश में जारी कोरोना संकट के बीच नीतीश-लालू के प्रदेश बिहार में क्या चल रहा है, यह जानना दिलचस्प है। कोरोना वायरस के कारण बिहार में अब तक 30 मौतें हुई हैं, जो कई बड़े राज्यों की तुलना में काफी कम हैं, लेकिन प्रदेश के राजनेताअोंकी दिलचस्पी अब कोरोना से लड़ने से ज्यादा उस विधानसभा चुनाव की तैयारी में है, जो इस साल अक्टूबर-नवंबर में संभावित हैं। ‘नीतीश अपनी राजनीतिक चतुराई और सीएम के रूप में एकमेव विकल्प के रूप में वोट मांगेगे तो सहयोगी भाजपा ने घोर जातिवादी चेतना में पगे इस राज्य में केन्द्रीय मंत्री अमित शाह की वर्चुअल रैली के बहाने भावी राजनीतिक डिजीटलीकरण का पहला सफल प्रयोग करके देख लिया है। पार्टी का दावा है ‍‍कि इस रैली को 1 करोड़ से ज्यादा लोगों ने देखा। विपक्षी राजद ने इसके जवाब में थाली बजाई और कहा कि वह विधानसभा चुनाव ‘डिजीटली’ के साथ ‘फिजीकली’ भी पूरी ताकत से लड़ेगी। इससे यह भी साबित हुआ कि चुनावी रणनीति में ताली-थाली बजाने का महत्व क्या है? इन सबसे मजेदार तो वो राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हैं, जो नीतीश और लालू के बीच चल रहे हैं। अभी भी राजनीतिक चारे में उलझे लालू ने ट्वीट के जरिए जद यू-भाजपा गठबंधन सरकार पर हमला करते हुए नीतीश पर निशाना साधा कि ‘आप तो रणछोड़ हो।‘ इस पर जद यू की अोर से लालू पर पलटवार हुआ कि ‘आप तो आधुनिक धृतराष्ट्र हो।‘ यानी ऐसा धृतराष्ट्र जो अपने पुत्र मोह में ही उलझा है। इस बीच अमित शाह ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि भाजपा विधानसभा चुनाव जद यू के साथ मिलकर ही लड़ेगी और नीतीश ही गठबंधन के नेता होंगे। साफ है कि बिहार अभी नीतीश के हाथों में रहेगा। और यह भी कि भाजपा ने राज्य में स्वतंत्र उड़ान भरने के सपने फिलहाल क्वारेंटाइन कर दिए हैं। वह महाराष्ट्र की तरह फिर कोई सियासी झटका नहीं खाना चाहती।
तमाम उतार-चढ़ावों और राजनीतिक खींच-तान के बाद अब यह तय माना जा रहा है कि राज्य में जद यू और भाजपा मिलकर ही विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। सीट बंटवारे का फार्मूला कोई भी हो सकता है। वैसे भी बदले राजनीतिक हालात ने जहां नीतीश की परवाज को बिहार तक सीमित कर िदया है, वहीं नीतीश ने उन नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व के आगे सिर झुका िदया है, जिन्हें वो कभी देश के सेकुलर चरित्र के लिए ‘सबसे बड़ा खतरा’ मानते थे।
गौरतलब है कि 2015 के विधानसभा चुनाव में जद यू ने राजद व कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर सत्ता हासिल की थी। लेकिन यह महागठबंधन दो साल भी नहीं टिका और नीतीश ने पैंतरा बदलते हुए वापस भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली। बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं। नई परिस्थितियों में सत्तारूढ़ एनडीए के अंतर्गत जद यू के पास 73, भाजपा 53, लोजपा 2 तथा 4 निर्दलीय शामिल हैं। जबकि विपक्षी राजद के पास 80 तथा कांग्रेस की 26 सीटें हैं। इनके अलावा सीपीआई 3, हम तथा एआईएमआईएम के पास 1-1 सीट है।
कोरोना संकट के पहले तक एनडीए गठबंधन में दरारें पड़ती दिख रही थीं। लेकिन कोरोना आपदा ने सबको औकात में ला िदया है। उधर विपक्षी राजद और कांग्रेस गठबंधन की हालत भी ‘कोरोना पाॅजिटिव’ जैसी है। राज्यसभा चुनाव में अपनी पार्टी के दो प्रत्याशी उतारकर राजद ने कांग्रेस को पहले ही ठेंगा दिखा दिया है। दूसरी तरफ राजद सुप्रीमो लालू यादव के घर में ही घमासान मचा है। इस पार्टी का हश्र भी अंतत: वही होना है, जो किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी का बंटवारे के बाद होता है। राजद की कमान छोटे बेटे तेजस्वी के हाथ में सौंपे जाने के बाद लालू का बड़ा और सनकी बेटा तेजप्रताप नाराज है तो बेटी मीसा भी नाखुश है। तेजस्वी का राजनीतिक तेज अभी तक तो कुछ खास नहीं दिखा है। और तो और उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता के चलते राजद की पूंछ पकड़कर चुनाव की वैतरणी पार करने वाली कांग्रेस भी बिदक गई है। ऐसे में बिखरा विपक्ष नीतीश की अपेक्षाअों के अनुकूल ही है। अलबत्ता राज्य में प्रवासी मजदूरों के लौटने और उनके पुनर्वास का मुद्दा आगामी चुनाव में अहम हो सकता है। जबकि भाजपा चुनाव के पहले साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की मोटर फिर चालू कर देगी। इतना ध्यान रखा जाएगा कि कुआं राजद के मुस्लिम वोटों का खाली हो न कि जदयू का। ये विधानसभा चुनाव बिहार की राजनीति में लालू परिवार की भूमिका के भाग्य का फैसला भी कर देंगे। इस बात का भी टेस्ट हो जाएगा कि उत्तर कोरोना काल में निर्णायक राजनीतिक मुद्दे कौन से हो सकते हैं। जमीनी मुश्किलात के या फिर जज्बाती खिलवाड़ के। इसी से आगे देश की राजनीति भी काफी हद तक तय होगी।
इस बीच भाजपा की यह ‘नैतिक जीत’ मानी जा सकती है कि राज्य में प्रमुख विपक्षी दल राजद भी थाली पीटने लगा है। अमित शाह ने अपनी वर्चुअल रैली में तंज किया था कि लालू की ( राजनीतिक) लालटेन बुझ चुकी है। अब एलईडी का जमाना है।दूसरी तरफ राजद इस बात से आत्ममुग्ध है कि उसके नेता और ‘कभी तेल पिलावन, लाठी घुमावन रैला’ निकालने वाले लालू आजकल सोशल मीडिया पर ही ज्यादा हैं और वहीं से सियासी लाठी घुमाते रहते हैं। हालांकि उनकी ये ‘लाठी’ उनके अपने घरू विवाद को दबाने के काम भी नहीं आ रही है। इस लिहाज से बिहार का विधानसभा चुनाव ‘प्रतीकों के आधुनिकीकरण’ का भी होगा। वो ये कि क्या बिहार की जनता फिर लालटेन जलाना पसंद करेगी या फिर वह एलईडी की रोशनी में नीतीश और भाजपा की तरह चकाचौंध सोचने लगेगी। हालांकि लालू की रणनीति में स्थानीयता का बोध और संदेश देने की पूरी कोशिश की जाती है।लेकिन िदक्कत यह है पिछड़े वर्ग और मुस्लिम समर्थन की जो लाठी वो बरसों से घुमाते रहे हैं, उसे उसी कौशल से घुमाते रहने वाला लालू का कोई वारिस नहीं है। जमीनी सचाई यह है कि कोरोना के कारण बिहार की जनता भी मुश्किल में है। काम-धंधे बंद हो रहे हैं। यह भी गौर करने लायक है कि कोरोना काल में नीतीश की राजनीति अन्य राज्यों से अलग रही है। देश के अन्य मुख्यमंत्रियों के विपरीत वे शुरू से प्रवासी मजदूरों तथा दूसरे राज्यों में कोचिंग ले रहे विद्यार्थियों की बिहार वापसी के सख्तग खिलाफ रहे हैं। हालांकि बाद में नीतीश ने दबाव के चलते कुछ मजदूरों को वापस आने दिया, लेकिन वो इन मजदूरो के बतौर वोटर बिहेवियर का अंदाजा नहीं लगा पा रहे हैं। शायद नीतीश को डर है कि प्रवासी मजदूरों की यह घर वापसी उनका चुनावी गणित न बिगाड़ दे। वैसे भी दुखी मन से घर लौटे इन प्रवासी मजदूरों का समर्थन किसे मिलेगा, अभी स्पष्ट नहीं है। इसके बावजूद नीतीश काफी हद तक ‘बेफिकर’ दिख रहे हैं तो इसी वजह यही है कि कोरोना ने मनुष्य को कई सबक सिखा दिए हैं। जनता के बीच कोरोना का गुस्सा आगामी चुनाव में फूटेगा या नहीं और फूटेगा तो किस के सर पर यह अभी तय नहीं है। ऐसे में चुनावी मुददे क्या होंगे, यह सोचने की बात है। देखना यह भी है कि बिहार विधानसभा चुनाव डिजीटली और वर्च्युअली ज्यादा लड़ा जाएगा या ‘फिजीकली’? कोरोना का दंश लालटेन के रूप में अभिव्यक्त होगा या फिर विपक्ष के हाथ थालियां ही बजाने को रह जाएंगी? कौन होगा ‘रणछोड़’ और कौन साबित होगा ‘धृतराष्ट्र’ ?