मीडिया : “क्षणजीवी” होते जा रहे हैं “श्रमजीवी”

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राकेश दुबे
कोरोना का दुष्प्रभाव मीडिया में सामने आने लगा है | इंदौर में एक फोटो जर्नलिस्ट द्वारा इस दौरान उपजे आर्थिक दबाव के कारण आत्महत्या कर ली गई, भोपाल में एक समाचार पत्र के संपादक को अपने साथियों के लिए अन्न की व्यवस्था की अपील करना पड़ा| दिल्ली के बाद अब भोपाल में पत्रकारों और गैर पत्रकारों की नौकरियां जा रही है | सरकार का श्रम विभाग मीडिया उद्ध्योग के अलावा हर उद्ध्योग पर मुश्कें कसने की कवायद करता है, पर मीडिया उद्ध्योग में कार्यरत लोगों की दुर्दशा पर उसकी कोई फ़ाइल नहीं चलती न कोई टीप लिखी जाती है | आज़ादी के पहले से लेकर अब तक सरकार के जितने कानून बने वे इस उद्ध्योग में काम करने वालों के पक्ष में कभी काम नहीं आये | हाँ, सरकार जब नाराज हुई तो उसने संपादक को जरुर मुकदमेबाजी में उलझाया, अब मुकदमेबाजी का ये खेल प्रतिपक्ष खेल रहा है, अगर आप टी वी देखते हैं, तो इशारा समझ गये होंगे |
कोरोन के कारण दिल्ली से “श्रमजीवियों” को “क्षणजीवी” बनाने की चली हवा, भोपाल में आ गई है | भोपाल में इसका प्रभाव कैसा हुआ उसका वर्णन भोपाल के वरिष्ठ समाजसेवी ने कुछ इस तरह किया | एक अख़बार के संपादक ने अपने स्टाफ के लिए खाद्यान्न के पैकिट एक बड़े राजनीतिक दल से मांगे, उसने खाद्यान्न की जगह बने हुए खाने के कुछ पैकिट जो एक समय के लिए भी अपर्याप्त थे, भेज दिए | दूसरी बार उन्ही संपादक जी ने इन्ही समाजसेवी से सम्पर्क किया और अपने प्रबन्धन के निर्देश के तहत सहायता चाही | राजनीतिक दलों के समाचार के मुकाबले अन्य समाजसेवियों की सेवा को इस मीडिया एकांश में कम स्थान मिला तो शिकायत हुई तो बेचारे संपादक ने अपनी लाचारी कही| ये तो अच्छा हुआ आसानी से सहमत न होने वाले समाजसेवी सहमत हो गये |
भोपाल के मीडिया संस्थानों के अपने सुख है | श्रमजीवियों की कलम, अन्य लोगों की संख्या बताकर जो विज्ञापन सरकार और गैर सरकार से मिलते है, उसका बहुत छोटा हिस्सा वेतन के नाम पर वेतन भोगियों के हिस्से में आता है, अख़बार के संस्करण बढते हैं, कर्मचारी घटते हैं और सरकार सिर्फ देखती हैं | १९५० से जो घराने मध्यप्रदेश में इस धंधे में थे, सब मौजूद है |राजधानी भोपाल से निकलने वाले अख़बारों में से देशबन्धु जरुर कुछ सालों स्थगित हुआ,बाकि सब फूले फले और अख़बार के साथ अन्य बड़ी संपत्तियों के मालिक बने और प्रगति जारी है | वेतन की अनियमितता तो इस धंधे की प्रमुख बीमारी है अब इसमें क्षणजीविता का वायरस अभी लग गया है | इलाज के लिए सरकार अभी तक कोई दवा नहीं खोज सकी | यह रोग प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया में हैं | १५ माह पूर्व लिए गये निर्णयों से लघु और मध्यम अखबारों की तो कमर ही टूटने लगी है | केंद्र के साथ ही राज्य सरकारों की नीतियाँ भी संकट को बढ़ाने का कारण बनीं | एक समय था जब हर घर में साप्ताहिक , पाक्षिक , मासिक पत्रिकाएँ , आया करती थी. | इसी तरह कुछ साप्ताहिक पत्रों का तो देश भर के पाठक इंतजार करते थे, लेकिन वे सब भी प्रतिस्पर्धा में फंसकर मैदान से बाहर हो गए। |
मीडिया जगत के कुछ बड़े संस्थान भले ही इस बात से असहमत हो कि उनकी इस यात्रा में “संपादक” जैसी संस्था का भी, कोई योगदान कभी रहा है |लेकिन सम्पूर्ण समाज जिसने इन मीडिया मुगलों की यात्रा देखी है, साफ कहता है ये चमक फलां श्रमजीवी की कुशलता और रक्त-स्वेद का चमत्कार है | संपादक संस्था अब लगभग विलुप्त हो गई है | पत्रकारिता भी अब प्रतिस्पर्धा अब गुणात्मक न होकर आर्थिक संदर्भों पर केन्द्रित हो गई है, इसलिए पत्रकार को अपना धर्म निभाने में धर्मसंकट से गुजरना पड़ रहा है | मालिक की खुशी या नाराजगी पर ही उसका भविष्य टिका होता है | यह भी कहा जा सकता हैं कि उसकी पहचान उसकी प्रतिभा से ज्यादा उस ब्रांड पर टिकी है जिसका वह चाहे – अनचाहे हिस्सा बनकर रह जाता है| पहले संपादक ब्रांड बनाता था, अब ब्रांड जिसे चाहे संपादक बना देता है | कुछ दशक पहले यह बात सत्य थी कि “मीडिया सरोवर की वैतरणी से संपादक श्रमजीवी को गौ माता की भांति पार लगा देता है, अब प्रबन्धन रूपी महिष की पुंछ पकड़ वैतरणी पार करने का फैशन है, महिष परिवार के सारे सदस्य सिर्फ डुबोने का काम करते हैं|”हठी से बकरी बने संस्थानों की भी दारुण कथा है |वैसे अब कोई विकल्प नहीं है, इतिहास लिखेगा,भारत में “क्षणजीवी” हुआ करते थे |