काम वाली बाई’ और ‘मैडमजी’ के बीच रिश्तों की टूटती डोर..!

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अजय बोकिल
इस कोरोना काल में अगर मध्य मवर्गीय गृहिणियों ( कई पुरूषों का भी) का एक खास मनोरंजन व्हाॅ्टस एप पर चलने वाले ‘काम वाली बाइयों’ पर केन्द्रित मैसेज भी हैं। इनका मकसद काम वाली बाइयों के अभाव में गृहिणी पर पड़ने वाले काम के बोझ, इससे उपजे विनोद या फिर काम वाली बाइयों के नखरे और अब कोरोना की मार से उनकी दयनीय आर्थिक हालत या नाक रगड़ने वाली स्थिति का चटखारेदार वर्णन होता है। परस्पर आश्रित रहने वाली ‘काम वाली बाई’ और ‘दीदी’ या ‘मैडम’ के बीच इन दिनो एक अजब-सा अविश्वास का रिश्ता घर कर गया है। यह ‘बाई से काम कराएं या न कराएं’ का गहरा वैश्विक असमंजस है। दरअसल कोरोना संकट ने घरेलू नौकरों ( जिनमें काम वाली बाइयां भी शामिल हैं) तथा मालिकों के बीच रहते आए बेहद नाजुक सामाजिक रिश्तों को नए सिरे से पारिभाषित किया है। दुर्भाग्य से प्रवासी मजदूरों के हल्ले में इन घरेलू नौकरों की बेरोजगारी का मुददा दब गया है। इसका कारण इनका असंगठित होना, सड़कों पर न उतर पाना, अंशकालिक काम करना तथा घर मालिकों ( या मालकिनों से) अलग तरह की रिलेशनशिप है। केन्द्र सरकार द्वारा पिछले साल दिए गए आंकड़ों के मुताबिक देश में घरेलू नौकरों की संख्या लगभग 39 लाख है ( इनमें भी 26 लाख महिलाएं हैं)। आलम यह है कि इनमें से 99 फीसदी का काम छूट चुका है। ये नौकर या नौकरानियां घरों में झाड़ू-पोंछा, बर्तन मांजने, कपड़े धोने, खाना बनाने तथा छोटे बच्चो को संभालने जैसे छोटे लेकिन जरूरी काम करती हैं। मुख्य रूप से मध्यम, उच्च मध्यम और उच्च वर्ग ही इन लोगों को काम देता है। उनकी अतिरिक्त आय, समय की कमी और कुछ आरामतलबी ही इन घरेलू नौकरों का घर चलाती है। अब लाॅक डाउन 4.0 में स्थिति यह है िक ज्यादातर काम वाली बाइयां अपने नियोक्ताअों से बार-बार पूछ रही हैं कि काम पर कब आ जाऊं ? जवाब मिलता है-ना, अभी नहीं !
इसके पीछे कोरोना संसर्ग का डर तो है ही, काम वाली बाइयों को सबक सिखाने की अघोषित ठसक तथा बीते 60 दिनों में विवशताजनित आत्मनिर्भरता का सबक भी है। जो लोग नौकरों के भरोसे जिंदगी जीने के आदी हो चुके थे, उन्हें कोरोना ने काफी हद स्वावलंबी बना दिया है। यह भाव पैदा किया है कि अरे, यह काम तो मैं भी कर सकता हूं/ सकती हूं। फिर इसके लिए घर में अलग से नौकर की क्या जरूरत?
दूसरी तरफ आत्मनिर्भरता का यह आत्मतोषी भाव हजारों घरों के चूल्हे बुझा भी रहा है, जिसके बारे में बहुत कम लोग सोच रहे हैं। सुविधा सम्पन्न उच्च और मध्यरम वर्ग जिंदगी को ज्यादातर अपने ही चश्मे से देखता है। उसके सुख-दुख को वह पूरे समाज के आईने में देखने की कोशिश करता है। आत्मनिर्भरता का यह एक नकारात्मक और ‘अ-सामाजिक’ पहलू है। इसमें यह भाव माइनस है कि किसी को घरेलू काम देकर आप एक खामोश पुण्य कार्य भी कर रहे हैं। वर्तमान में घरेलू नौकरों को बंद करने या उनके न आने से शहरों और कस्बों में मध्यम वर्गीय परिवारों का समाज शास्त्र भी बदल गया है। स्वावलंबन और पैसे की बचत की दृष्टि से यह भले ठीक हो, लेकिन समाज के निम्न वर्ग तथा मध्येम व उच्च वर्ग के बीच घरेलू नौकरों के रूप में कायम रहे मानव सेतु को ढहाने वाला भी है।
वैसे भी घरेलू नौकरों की सामाजिक दशा दिहाडी मजदूरों से भी बदतर है। कारण कि इस काम में किसी भी तरह की कानूनी, सामाजिक, आर्थिक तथा स्वास्थ्ये सुरक्षा नहीं होती। मेहनताने का कोई निश्चित मानदंड नहीं है। हालांकि घरेलू नौकरों को कानूनी सुरक्षा देने के लिए सरकारों ने कानून बनाए हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से उसका परिपालन बहुत कठिन है। घरेलू नौकरों को तो कामगार का दर्जा भी प्राप्त नहीं है। केन्द्रीय श्रममंत्री संतोष गंगवार ने पिछले साल घरेलू कामगारों के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाने तथा इस सम्बन्ध में विधेयक संसद में लाने की बात कही थी, जो अभी भी लंबित है। इस बिल में घरेलू कामगारों को निश्चित वेतन,सामाजिक सुरक्षा, कानूनी संरक्षण तथा यूनियन बनाने का अधिकार देने का प्रावधान है।
यहां बुनियादी सवाल यह है कि क्या घरेलू नौकरों को नियमित या अंशकालिक कामगार का दर्जा दिया जा सकता है? और दिया गया तो उस पर व्यावहारिक अमल कैसे होगा? इस सवाल के पीछे घरेलू नौकरों और मालिकों या नियोक्ताअों के बीच परस्पर सम्बन्धों की वह महीन बुनावट है, जो ‘प्रोफेशनल दक्षता’ के निर्मम आग्रह से ज्यादा परस्पर विश्वास और मानवीय रिश्तों पर टिकी है। यह रिलेशनशिप मालिक ौर मजदूर के सुपरिभाषित और तनावपूर्ण सम्बन्धों से बहुत अलग है। अभी भी घरेलू नौकरों की नियुक्ति उसकी विश्वसनीयता, ईमानदारी, काम की जरूरत और सम्बन्धितों से िमले फीड बैक के आधार पर ही होती है। बहुत से घरेलू नौकर मालिको के घरों के परिसर में ही रहते हैं। वो उस परिवार का अभिन्न अंग बन जाते हैं। कई दफा वो परिवार की उन अंतरंग बातों और घटनाअों के भी गवाह होते हैं, जो दूसरे कामगार शायद ही होते हैं या हो सकते हैं। इस लिहाज से घरेलू कामगार या ‘काम वाली बाई’ केवल एक नौकर भर नहीं होती, वह परिवार का एक छोटा मगर अनिवार्य हिस्सा होती है। शायद इसीलिए सनातन परंपरा में शादी में तथा कुछ अन्य पारिवारिक रस्मों में भी ‘काम वाली बाई’ की प्रतीकात्मक लेकिन जरूरी भूमिका रहती है। दूल्हे या दुल्हन द्वारा उसे दिया जाने वाला नेग इस अटूट रिश्ते की पावती होता है। उस ‘काम वाली बाई’ के दिल से निकली दुआएं पूरे परिवार के कुशल क्षेम का स्वस्ति वाचन मानी जाती हैं। भरोसे मंद घरेलू नौकरों को मालिक भी अक्सर परिवार के सदस्य के रूप में ट्रीट करते हैं। कई रूपों में उसकी मदद भी करते हैं। लिहाजा हर सुख-दुख में उसकी छोटी ही सही, हिस्सेदारी जरूर होती है।
इस मायने में घरेलू नौकरों की हैसियत उस घंटों के हिसाब से काम करने वाले या तय शुदा मजदूरी पाने वाले कामगार से बिल्कुल अलग है, जहां मालिक और मजदूर की रिलेशनशिप बहुत प्रोफेशनल और काफी हद तक ‘इमोशनलेस’ है। लेकिन घरेलू नौकरों की तस्वीर का स्याह पहलू यह भी है कि उनका शोषण भी खूब होता है। क्योंकि घरेलू नौकरों के काम को ‘उत्पादकता’ से जोड़कर नहीं देखा जाता। उनकी भूमिका ‘सदा सहायी’ की रहती है, जिनकी अपनी कोई मंजिल नहीं है। उनसे दुर्व्यवहार अथवा तुच्छता का भाव आम बात है। अशिक्षित होने, कम िशक्षित होने या फिर कोई भी काम न मिलने पर किसी के यहां घरेलू काम करना उनकी मजबूरी है और उनसे काम करवाना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, यह मान लिया जाता है।
पूरी दुनिया में कमोबेश यही स्थिति है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने वर्ष 2015 में दुनिया भर के देशों में किए गए सर्वे के आधार पर हमे बताया था कि विश्व में घरेलू नौकरों की संख्याे 6 करोड़ 71 लाख है ( एक अनुमान के मुताबिक यह 1 अरब भी हो सकती है)। इनमें 83 फीसदी महिलाएं हैं। लेकिन ज्यादातर को कोई कानूनी संरक्षण नहीं है। मानव इतिहास में भी इन घरेलू नौकरों की कोई जगह नहीं है। वो इतिहास के साक्षी होते हैं, इतिहास गढ़ने में उनका अनाम योगदान भी होता है, लेकिन कोई पहचान नहीं होती। अक्सर उनके नाम भी ऐरे-गैरे टाइप होते हैं। घरेलू नौकरों के सरनेम शायद ही कोई जानता हो।
कोरोना ने इन अनाम से कामगारों और लाखों ‘काम वाली बाइयों’ को काम से ही बेदखल कर दिया है। घरों का काम छूटेगा तो बाहर का कौन-सा काम मिलेगा, यह कोई नहीं जानता। घरेलू काम तो मनरेगा में भी नहीं आता। इससे भी बड़ी बात है काम वाली बाई और मैडमजी के बीच सुख-दुख, मोहल्ले की सूचनाअों की शेयरिंग तथा प्यार और नफरत से भरी डोर का टूटना है, जो सिर्फ श्रम के इसी सार्वकालिक राग में निहित है और शायद रहेगी भी।