प्रवासी मजदूर : न चंदा देने की हैसियत और न हड़ताल की हिम्मत

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                                रवीन्द्र वाजपेयी
यदि लॉक डाउन की वजह से देश के विभिन्न हिस्सों से प्रवासी श्रामिकों की वापिसी राष्ट्रीय समस्या न बनती तब शायद देश के लोगों को इस सच्चाई का पता ही नहीं चलता कि अपना गाँव – देस छोडकर सैकड़ों मील दूर पूरी तरह अपरिचित माहौल में बतौर मजदूर काम करने वालों की संख्या सैकड़ों , हजारों नहीं बल्कि लाखों से भी ऊपर है | लॉक डाउन के बाद की स्थितियां जब असहनीय होने लगीं और कोई विकल्प नहीं मिला तो लाखों लोग पैदल ही लौट पड़े |
उनके साथ घटी दुर्घटनाओं ने देश का ध्यान आकर्षित किया और तब उनकी गरीबी और बेबसी का बखान हुआ | उनके प्रति हर किसी की सहानुभूति इसलिए है क्योंकि वे श्रमिक हैं और तब सहसा याद आया कि इस देश में श्रमिक संगठनों की भी भरमार है | कांग्रेस , भाजपा , वामपंथी , समाजवादी खेमे के अपने – अपने श्रमिक संगठन हैं | वामपंथियों के दो हिस्से हुए तो श्रमिक संगठन भी दो हो गए | लेकिन समाजवादी खेमा इतनी बार बिखरा कि उससे जुड़े श्रमिक संगठनों की पहिचान ही नष्ट हो गयी | इनके अलावा शिवसेना , द्रमुक और अद्रमुक तथा तृणमूल जैसे क्षेत्रीय दलों ने भी मजदूरों के बीच अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए संगठन बना रखे हैं |
इन संगठनों के जरिये राजनीतिक दल कर्मचारी वर्ग के साथ ही श्रमिकों को भी अपनी तरफ खींचने का प्रयास करते हैं | हालांकि मजदूर आंदोलनों से उपजे ये संगठन मुख्य रूप से कार्मिक वर्ग के हितों की रक्षा करने के लिए बनाये गये जिससे वेतन या मजदूरी पाने वाले का शोषण न हो |
सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में जिस तरह का वेतनमान लागू होता गया उसमें इन संगठनों का योगदान भुलाया नहीं जा सकता | सेवा निवृत्ति लाभ , अनुकम्पा नियुक्ति , न्यूनतम मजदूरी , काम के घण्टे , अवकाश , चिकित्सा सुविधा , मुआवजा और ऐसे ही अनेक लाभ श्रमिक आंदोलनों की ही देन है | इसीलिए बैंक , जीवन बीमा , रक्षा उत्पादन जैसे बड़े संस्थानों में राष्ट्रीय स्तर पर हड़ताल करवाने की ताकत इन संगठनों के पास रही है |
लेकिन इसमें जो धार अस्सी के दशक तक दिखाई देती थी वह अब महसूस नहीं होती | इसकी एक वजह ये भी है कि सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में वेतन भत्ते इतने आकर्षक हो गये कि अब लोगों को ट्रेड यूनियन के आन्दोलन में सड़क पर आकर इंकलाब जिंदाबाद और बोल मजूरा हल्ला बोल जैसी नारेबाजी करने में अपराधबोध की अनुभूति होती है | यही वजह है कि श्रमिक या कर्मचारी आन्दोलन अब पहले जैसा प्रभाव समाज और सरकार दोनों पर नहीं छोड़ पाते |
इसके पीछे एक बड़ी वजह श्रमिक संगठनों का राजनीतिक दलों के पिछलग्गू बन जाना भी रहा | जिसके कारण अपना मुख्य लक्ष्य भूलकर वे दलीय विचारधारा के प्रसार में लग गये | श्रमिक नेताओं का उपयोग करने के लिए उनकी पालक पार्टी ने उन्हें विधायक , सांसद और मंत्री बनाना शुरू कर दिया | सत्ताधारी पार्टी से जुड़े श्रमिक नेताओं को श्रम विभाग के अंतर्गत अनेक समितियों में मनोनीत करते हुए उपकृत किया जाना आम है | सरकारी सुविधाएँ भी दी जाने लगीं | अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में विदेश घुमाया जाने लगा। और धीरे – धीरे ट्रेड यूनियनों पर पेशेवर नेताओं का आधिपत्य होता गया | सरकार अथवा प्रबंधन के साथ निकटता के कारण हितों के आदान प्रदान का सिलसिला भी इसी के चलते शुरू हुआ |
कहने का आशय ये कि राजनीतिक दलों के साथ – साथ श्रमिक संगठन भी ईमानदारी , समर्पण , निःस्वार्थ सेवा तथा जनता के हितों के लिए संघर्ष की क्षमता जैसे गुणों से दूर होते – होते केवल संगठित क्षेत्रों तक ही सिमटकर रह जो कि सुविधाभोगी माना जाने लगा है | इस वर्ग के छोटे – बड़े कर्मचारी या अधिकारी स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति के प्रस्ताव का इंतज़ार करते रहते हैं | लेकिन इसके चलते श्रमिक आन्दोलन अपनी राह से भटक गया जिसका उदाहरण आज देश में सड़कों पर चले जा रहे वे प्रवासी मजदूर हैं जो असंगठित क्षेत्र के होने की वजह से श्रमिक संगठनों की अनदेखी और उपेक्षा के शिकार होकर निराशा में डूबकर अपनी बदकिस्मती का बोझ कंधे पर उठाये चले जा रहे हैं , उस रास्ते पर जिसका अंत कब , कहां और कैसे होगा ये उन्हें नहीं पता |
जिन जगहों पर ये काम करते थे वहां इनकी दुर्दशा देखने कोई श्रमिक संगठन या नेता नहीं आया | न ही किसी ने राज्य सरकार से मिलकर उन्हें राहत दिलवाने की पहल की | राष्ट्रीय स्तर पर भले ही चिट्ठियाँ और ज्ञापन भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली गई हो लेकिन कोई मैदानी प्रयास देखने नहीं मिला | प्रश्न ये है कि लाखों की संख्या वाले असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के बिना श्रमिक आंदोलन की कल्पना कैसे की जा सकती है ? श्रमिक नेताओं के रूप में स्थापित राजनीतिक दलों के कृपापात्र इस दौर में जिस तरह किसी मांद में जाकर छिपे उससे प्रवासी मजदूर नेतृत्व और दिशाविहीन होने के साथ ही खुद को असहाय और ठगा सा महसूस कर रहे हैं |
राजनीतिक दलों के तौर – तरीके केवल अपने नफे नुकसान तक सीमित रहते हैं | जबकि श्रमिक संगठन शोषण के विरुद्ध और मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए हर समय संघर्ष करने के लिए बनाये गये थे | लेकिन इन लाखों असंगठित प्रवासी मजदूरों को शायद इसलिये बेसहारा छोड़ दिया गया क्योंकि वे यूनियन को चंदा देने की स्थिति में नहीं होते | रोज कमाने और रोज खाने की उनकी मजबूरी उन्हें किसी भी हड़ताल , धरना या प्रदर्शन में हिस्सा लेने से भी रोक देती है |
पूंजीवाद , समाजवाद , उदारवाद जैसे शब्द उनकी जिन्दगी रूपी शब्दकोश में हैं ही नहीं | बुर्जुआ और सर्वहारा भी वे नहीं समझते | और इसी कारण वे किसी श्रमिक संगठन की भीड़ बढ़ाने का जरिया नहीं बन पाये | बीते लगभग डेढ़ महीने में श्रमिक आन्दोलन की उपस्थिति कहीं नहीं दिखाई दी | यदि किसी से पूछें कि राष्ट्रीय स्तर के किसी ट्रेड यूनियन नेता का नाम बताओ तो वह सोच में पड़ जाएगा | स्थानीय स्तर पर भी पहले कर्मचारी और श्रमिक नेताओं का जो दबदबा था , वह भी नहीं दिखता |
ये स्थिति खतरनाक संकेत दे रही है | जो लाखों प्रवासी श्रमिक इन दिनों सड़कों पर नजर आ रहे हैं , उनके भविष्य के बारे में नहीं सोचा गया तो वे देश के भविष्य पर भारी पड़ जायेंगे | असंगठित होना भले ही आज इनका अपराध और कमजोरी लग रही हो लेकिन इनके प्रति उपेक्षा का भाव कोरोना के बाद के हालातों को और चिंताजनक बना देगा |
श्रमिक संगठनों द्वारा इनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाना उनमें आये चारित्रिक बदलाव का प्रमाण तो है ही लेकिन उससे ये संकेत भी मिल रहा है कि भारत में श्रमिक संगठन क्रमशः समाप्ति की ओर बढ़ चले है | इसका एक प्रमुख कारण सोवियत संघ का विघटन होने के बाद चीन का पूंजीवादी हो जाना भी है जिसके परिणामस्वरूप भारत में साम्यवादी पार्टियों का प्रभावक्षेत्र लगातार सिमटता जा रहा है | एक समय उनकी समूची राजनीति किसान और मजदूर के नाम पर चलती थी | किसानों के अपने नेता बन गये और बढ़ते वेतन के कारण संगठित क्षेत्र खुद को श्रमिक कहलाने में लजाने लगा |
2004 में जब सीपीएम महासचिव हरिकिशन सिंह सुरजीत ने इस देश में पूंजीवादी उदारवाद और पश्चिमी देशों के हितों को सुरक्षित रखने वाली मुक्त अर्थव्यवस्था के जनक डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार को समर्थन देने के लिए वामपंथी दलों को राजी किया , उसी दिन से साम्यवादी पार्टियों का वैचारिक भटकाव शुरू हो गया । जिसकी वजह से श्रमिक आंदोलन पर वामपथी पकड़ कमजोर पड़ते – पड़ते समाप्ति पर आ गयी | जहाँ तक कांग्रेस के मजदूर संगठनों की हालत है तो वे उसी की तरह कमजोर होते जा रहे हैं और भाजपा समर्थक श्रमिक संगठन न चाहते हुए भी चुप रहने मजबूर हैं |
ऐसे में राजनीतिक स्वार्थ दूर रखकर सभी दलों को इन मौन प्रवासी कर्मवीरों के भविष्य को सुरक्षित बनाने का पक्का इंतजाम करना चाहिए | रही बात श्रमिक संगठनों की तो वे अपनी प्रासंगिकता खो ही चुके हैं | और आखिर में वे भी करेंगे तो वही जो उनके राजनीतिक आका हुक्म देंगे |