दुष्काल और वैकल्पिक आर्थिक पुनर्रचना

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  राकेश दुबे
देश में पैदल, साइकिल,रेल और अन्य साधनों से घर लौटते मजदूरों का सिलसिला जारी है | इसी घर वापिसी में औरंगाबाद जैसी घटना भी घटी, जिसमें रेल पटरियों पर सोये मजदूरों का प्राणांत हो गया | घर लौट चुकी या लौट रही श्रमशक्ति के हाथ में काम होना अब बड़ी चुनौती है | सारे लोगों के उनके ठिकाने पर काम मिले इसके लिए एक बड़ी कवायद जरूरी है |
कवायद की शुरुआत में ही अर्थव्यवस्था के वैश्विक चक्र के साथ ही अब हमें स्थानीय स्तर के अर्थचक्र को वैकल्पिक समाधान के रूप में अपनाना होगा| उत्पादन, बिक्री, बाजार और रोजगार के अन्तर्सम्बन्ध को बरकरार रखते हुए उन संभावनाओं पर ध्यान देने की जरूरत है, जो इन सबसे परे हैं| जैसे गांवों, विशेषकर आदिवासी गांवों, में बहुत से ऐसे उत्पाद भी निर्मित किये जाते हैं, जिनका न तो कोई बाजार है और न ही बड़े पैमाने पर उनकी बिक्री हो पाती है|
इससे बड़ी आबादी के जीवन का निर्वाह भी होता रहता है| ये उत्पाद बाजार की संभावनाओं को भी व्यापक करते हैं| आज भी ये करोड़ों लोगों की जीविका का आधार हैं| अर्थव्यवस्था का ग्राफ चढ़ने और उनके गोते लगाने से भी इनका बहुत रिश्ता नहीं है. हमें संकट की इस घड़ी में अर्थव्यवस्था के इस देसी आधार को सहारे के रूप में अपनाने की जरूरत है| नीति आयोग से लेकर राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थाओं तक को इस बारे में सोचना चाहिए|
प्रवासी मजदूरों को कुछ दिनों के आराम के बाद फिर से शहरों में रोजगार की तलाश में जाने के लिए मजबूर करना न्यायसंगत नहीं होगा| उनके कौशल के आधार पर स्थानीय स्तर पर ही रोजगार और विकास के साधन मुहैया कराना उचित रहेगा| मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था की परिधि पर वैकल्पिक अर्थरचना के निर्माण में इनकी सहायता ली जा सकती है| गांव को अर्थव्यवस्था की धुरी बनाकर ये लोग क्रयशक्ति बढ़ा सकते हैं| फिर इसी विकास के जरिये महानगरों या बड़े शहरों के औद्योगिक केंद्रों के लिए बाजार को व्यापक आधार दे सकते हैं|
असुविधाओं के भंवर में फंसकर पलायन करनेवाले लोगों को अब अपने गांव में कोई आर्थिक संरचना शुरू करने में थोड़ी दिक्कत आयेगी, कहने को आज गांव भी सड़कों से जुड़ गये हैं, लगभग हर गांव में बिजली है, परन्तु शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की खाई भी है| इसलिए गांव आधारित वैकल्पिक आर्थिक पुनर्रचना की रणनीति अर्थव्यवस्था को भी हमेशा के लिए प्राण दान दे सकती है| कृषि की बेहतरी और इजरायल की तरह कृषि आधारित उद्योगों के जरिये बेहतर भविष्य का निर्माण| इसका मन्त्र हो सकता है,हमारे उद्योगपतियों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए और शहरों की जगह गांवों में उद्योग लगाने को प्राथमिकता देनी चाहिए|
प्रत्येक जिले में सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क की स्थापना से सूचना तकनीक के समावेशीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की जा सकती है| प्रधानमंत्री आवास योजना में तेजी लाकर भी शहर से गांव की ओर बढ़ रहे मजदूरों के हुजूम को रोजगार दिया जा सकता है| श्रम आधारित उद्योगों के विकास के अतिरिक्त सिंचाई के साधनों को बढ़ावा देकर भी रोजगार के नये अवसर पैदा किये जा सकते हैं|
विख्यात अर्थशास्त्री जेसी कुमारप्पा का ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक रणनीति के रूप में अपनाने का सैद्धांतिक अधिष्ठान “तोप के मुकाबले चरखे का हथियार” गांव को आर्थिक केंद्र बनाने का ही अस्त्र था| संकट के इस काल में इस समाधान का उपयोग विकास और समृद्धि की संभावनाओं से ग्रहण हटा सकेगा |