एहसास मर गया हो सारे शहर का जब …..

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रवीन्द्र वाजपेयी
आजाद हिंदुस्तान में ये संभवतः पहला अवसर है जब बिना किसी आन्दोलन के लाखों श्रमिक सड़कों पर हैं | देश के सभी राजमार्गों पर गठरी में गृहस्थी समेटे छोटे – छोटे बच्चों के साथ मजदूरों के झुण्ड नजर आ रहे हैं | जब पुलिस ने उन्हें रोका तो वे रेल की पटरियों पर चलने मजबूर हुए और ऐसे ही हजारों में से 16 अभागे मजदूर गत दिवस महाराष्ट्र – मप्र की सीमा के पास थककर रेल की पटरी पर ही नींद लेते हुए मालगाड़ी से कटकर मारे गए |
जिन बड़े शहरों में कुछ कमाने की हसरत लिए वे आये थे , उनकी बेरुखी देखने के बाद पैदल ही अपने गाँव – देस चल पड़े हैं | किसी के पास खाना नहीं है तो किसी के पास पानी की किल्लत | दवा तो बहुत बड़ी बात है | अधिकतर के जेब भी खाली है | किसी ने दया – धर्म दिखाते हुए कुछ दे दिया तो ठीक , वरना एक ऐसे सफर पर वे चले जा रहे हैं जिसका अंत कब होगा ये उन्हें नहीं पता | पूरी तरह से नाउम्मीद हो चुके इन मजदूरों से पूछने पर यही सुनने मिलता है कि मरना है तो कम से कम गाँव जाकर अपनों के बीच मरें | ये एक अकल्पनीय स्थिति है | टीवी तथा बाकी माध्यमों से उनकी पीड़ा और लाचारी सब देख रहे हैं | यद्यपि उनके लिए कुछ किया नहीं जा रहा ये कहना तो गलत है लेकिन जो हो रहा है वह इतना कम है कि ऊँट के मुंह में जीरा भी बड़ा प्रतीत होता है |
लॉक डाउन के बाद की परिस्थितियों में न तो उन्हें एक साथ उनके मूल स्थान तक पहुँचाना संभव था और न ही उचित | लेकिन रोजगार छिनने के बाद स्थानीय शासन और प्रशासन के साथ ही स्वयंसेवी संस्थाओं की उनके प्रति जो संवेदनशीलता थी वह भी धीरे – धीरे ढलान पर आती गयी | पहला चरण तो किसी तरह कट गया लेकिन दूसरा शुरू होते ही उनका धीरज जवाब देने लगा और तीसरा आते तक वह विस्फोटक स्थिति में आ गया |
ऐसे में प्रश्न है कि ये श्रमिक जिस भी नगर या महानगर में कार्यरत थे , वहां सरकार के अतिरिक्त क्या ऐसे गैर सरकारी संस्थान पूरी तरह से निष्क्रिय या नकारा साबित हुए जो आये दिन अपने सेवा कार्यों का प्रचार करने में आगे – आगे नजर आते थे | इनके अलावा दर्जनों धार्मिक संगठन , मंदिर , सार्वजनिक ट्रस्ट आदि भी हैं जिनके पास इतने संसाधन तो हैं ही जिनसे प्रतिदिन सैकड़ों लोगों को दो समय का भोजन दिया जा सकता था | बाकी को छोड़ दें तो मुम्बई जो देश की व्यवसायिक राजधानी होने के साथ ही धनकुबेरों की बस्ती है वहां भी यदि प्रवासी मजदूर भूख से बेहाल हो गए तो ऐसी सम्पन्नता किस काम की ?
हालांकि उद्योगपतियों ने मुक्तहस्त से सरकार को दान दिया | फ़िल्मी सितारे भी पीछे नहीं रहे | कुछ ने सीधे दान की बजाय अप्रत्यक्ष रूप से मदद की घोषणा की | किसी ने भोजन बाँटने की बात कही तो किसी ने बिस्किट , ब्रेड पानी जैसी चीजों की | मास्क और सैनीटाइजर भी बहुतों ने दिए | लेकिन फिर भी ऐसा क्या हुआ जो प्रवासी मजदूर परेशान होकर पैदल ही निकल पड़े | मंदिरों में करोड़ों का दान एक दिन में देने वाले लक्ष्मीपुत्रों की लंबी कतार मायानगरी में है | एक हफ्ते में 200 – 300 करोड़ की कमाई करने वाली फ़िल्में बनाने वाले भी यहीं रहते हैं | देश में सबसे ज्यादा आयकर भी यही शहर देता है | इसकी महानगरपालिका का बजट अनेक राज्यों से भी ज्यादा है | ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब सभी स्कूल – कॉलेज बंद हो चुके थे तब क्या इन प्रवासी मजदूरों को वहां रहने की जगह और दो वक्त का भोजन मुम्बई नहीं दे सकती थी ?
स्मरणीय है इसी शहर में दुनिया के सबसे धनी खेल संगठन बीसीसीआई का मुख्यालय भी है |
हालाँकि ये बात सही है कि मुम्बई में कोरोना का प्रकोप सबसे ज्यादा होने से वहां का शासन – प्रशासन उसमें भी व्यस्त हो गया , लेकिन इस महानगर की सम्पन्नता को देखते हुए प्रवासी मजदूरों को बेसहारा छोड़ना मानवीय दृष्टि से बेहद शर्मनाक है | और फिर ये वे मजदूर थे जिनके बिना मुम्बई की सामान्य ज़िंदगी चल नहीं पाती थी | और कोरोना संकट टलने के बाद यदि वे वापिस नहीं लौटे तब मुम्बई वालों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा |
वैसे मुम्बई तो एक उदाहरण है |
देश के राजधानी दिल्ली में वहां की सरकार ने 20 से 25 लाख बेरोजगार प्रवासी मजदूरों को रोजाना भोजन करवाने का आश्वासन दिया था । लेकिन मात्र तीन – चार दिन बाद ही इस तरह के हालात बना दिए गये जिनसे भगदड़ मच गई | यही हाल तीसरे सबसे ज्यादा संक्रमित अहमदाबाद का रहा | गुजरात में धार्मिक संस्थाओं और समाजसेवा के लिए कार्यरत ट्रस्टों की बड़ी संख्या है | गरबा के आयोजन में ये शहर करोड़ों रूपये रोज खर्च कर देता है लेकिन जिन श्रमिकों के बल पर यहाँ के कारखाने और व्यवसाय चलते थे , उनको दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंका गया | ये देखते हुए लोगों की धार्मिकता पर संदेह होने लगता है |
और दक्षिण भारत , जहां धर्म का पालन बड़ी ही श्रद्धा से किया जाता है तथा जहाँ के कुछ बड़े मन्दिरों के पास अरबों रु. का सोना है , क्या वे प्रवासी श्रमिकों को मुसीबत के इन दिनों में सहारा नहीं दे सकते थे ?
उक्त सभी उल्लेख सांकेतिक हैं | वैष्णो देवी मंदिर , अमृतसर का स्वर्ण मन्दिर , दिल्ली और गांधीनगर का स्वामी नारायण मंदिर , शिर्डी का साईं बाबा मंदिर , मुंबई के सिद्धि विनायक और लालबाग के गणेश जी , तिरुपति देवस्थानम , तिरुवनन्तपुरम का पद्मनाभ मन्दिर आदि के पास अकूत दौलत है | कोरोना राहत हेतु इनके द्वारा दान भी दिया गया | इनमें से कुछ में तो लाखों लोगों को नित्य निःशुल्क भोजन भी दिया जाता है | लॉक डाउन के बाद यहाँ आने वालों की संख्या शून्य हो गयी | ऐसे में यदि इनके द्वारा निकटवर्ती इलाकों में भोजन व्यवस्था का जिम्मा लिया जाता तब शायद प्रवासी मजदूरों की ये दुर्दशा न होती |
धार्मिक संस्थानों और मंदिर प्रबंधनों की आलोचना करने का कोई उद्देश्य न होते हुए भी ये कहने को मजबूर होना ही पड़ता है कि भगवान के नाम पर जमा ऐसी दौलत किस काम की जो उसके ही बन्दों के काम न आये | उक्त बड़े नाम ही क्यों हमारे देश में और भी हजारों मंदिर – मठ और आश्रम हैं | इनके प्रमुख जो भी साधु – संत हैं उनके शिष्यों और अनुयायियों में बड़े – बड़े धनकुबेर हैं | इन सभी ने कोरोना राहत कोष में कुछ न कुछ दिया है , और कहीं – कहीं राहत के काम में खुलकर हिस्सेदारी भी की | लेकिन किसी धर्मस्थान के निर्माण या आध्यात्मिक आयोजन में करोड़ों खर्च करने वाले श्रद्धालुओं ने यदि अपने – अपने स्थान पर दायित्वबोध दिखाया होता तो भूखे प्यासे मजदूर जिंदा लाश की तरह घिसटते हुए नजर नहीं आते |
भारत में धर्म के नाम पर इन्सान सब कुछ करने को तैयार हो जाता है | साधु , सन्यासियों , महंतों , मठाधीशों का जो आभामंडल और प्रभाव है उसके कारण एक इशारे पर बड़े से बड़े काम चुटकी बजाते हो जाया करते हैं | ऐसे में अपेक्षित ये था कि आध्यत्मिक विभूतियाँ पीड़ित मानवता की सेवा के इस महत्वपूर्ण अवसर पर अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करवाते हुए आध्यात्म के सर्वश्रेष्ठ स्वरूप को प्रस्तुत करते हुए पूरी दुनिया को भारतीय संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं से युक्त संस्कारों का परिचय देतीं | अनेक धर्मस्थलों , न्यासों , संतों आदि ने इस बारे में काफी योगदान दिया भी ।
देश के विभाजन के बाद पहली बार ऐसे हालात पैदा हुए जब लाखों लोग जिनमें औरतें और बच्चे भी हैं, भूखे – प्यासे बदहवासी की स्थिति में एक ऐसे सफर पर निकल पड़े हैं जिसका अंत अनिश्चित है |
कहना गलत नहीं होगा कि इन प्रवासी मजदूरों की देखभाल और सलामती की जिम्मेदारी सर्वप्रथम तो उस संस्थान की थी जहाँ ये काम करते थे | उसके बाद सरकार का नम्बर आता है | लेकिन समाज की अपनी भूमिका भी तो है | यदि इन तीनों में थोड़ा सा भी समन्वय होता तब जो दर्दनाक स्थितियां बनीं , वे टाली जा सकती थीं |
देश पहले भी तरह – तरह के संकट में फंसा और उन पर विजय भी प्राप्त की | सरकार के साथ समाज ने भी सदैव पूरी क्षमता से उसमें अपनी भमिका का निर्वहन किया | लेकिन ये संकट अभूतपूर्व और अकल्पनीय होने के साथ ही बड़ा ही चुनौतीपूर्ण है
जिसमें एक साथ अनेक मोर्चों पर पूरे देश को लड़ना पड़ रहा है | प्रवासी मजदूरों को उनके काम वाले स्थान पर रोके रखना कोरोना के फैलाव को थामने के लिए अत्यावश्यक था | वरना तो शुरू में ही उन सबको रेलगाड़ियों में ठूंसकर उनके गाँवों तक पहुंचा दिया गया होता |
गत दिवस दिल्ली स्थित एम्स के डायरेक्टर ने जून और जुलाई के महीने में कोरोना के चरमोत्कर्ष की जो आशंका व्यक्त की उसके पीछे इन मजदूरों की वापिसी भी हो सकती है |
प्रवासी मजदूरों के पलायन रूपी इस समस्या ने सत्ताधीशों की ईमानदारी और प्रशासनिक अमले की क्षमता के साथ ही धर्म और आध्यात्म के नाम पर फैले आस्था के बड़े साम्राज्य के अलावा समाजसेवा के तथाकथित ब्रांड एम्बैसडर्स का असली चेहरा भी उजागर कर दिया है , जो मास्क लगाने के बाद भी अपनी फोटो खिंचवाने और छपवाने में तनिक भी नहीं झिझक रहे ।
प्रवासी मजदूरों की जगह यदि कोई नेता या साधु – संत सड़कों से गुजरता होता तो उनके काफिले के लिए अनगिनत स्वागत द्वार , चाय – नाश्ता , भोजन – पानी और विश्राम की शानदार व्यवस्था हो जाती | लोग फूल – माला लिए खड़े रहते | यद्यपि कुछ जगहों पर लोगों ने श्रमिकों के लिए जो बन सका किया भी लेकिन उन्हें आगे जाने से नहीं रोका जा सका क्योंकि उनका भरोसा जवाब देने लगा था |
ताज भोपाली का एक शेर मानों इन हालातों के लिए ही लिखा गया था | जिसमें पहली पंक्ति मैं अपनी ओर से जोड़ने की गुस्ताखी कर रहा हूँ :-
एहसास मर गया हो सारे शहर का जब …..
पीछे बंधे हैं हाथ मगर शर्त है सफर ,
किससे कहें कि पाँव के काँटे निकाल दे |