नेहरु जी लॉक डाउन वाले दिन वापस करना पड़ेंगे….

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             ज़हीर अंसारी
अब वक़्त आ गया है कि समस्त देशवासियों को नेहरु जी निंदा और भर्त्सना करना चाहिए। नेहरु जी ने आख़िरकार इतनी गंदी अर्थ नीति क्यों बनाई कि सरकारों को धन इकट्ठा करने के लिए कोरोना जैसी महामारी के दौरान भी दारू बिकवाना पड़ रही है। नेहरु जी की इस नासमझी का ख़ामियाज़ा आज देश की 135 करोड़ जनता को भुगतना पड़ रहा है। कोविड 19 के कारण पूरा मुल्क घरों में सिर्फ़ इसलिए सड़ रहा है कि कोरोना की चैन ब्रेक हो जाए। इस चैन ब्रेक के लिए 135 करोड़ लोगों ने अब तक के पचास दिनों तक लगातार अपने संयम की आहुतियाँ दी हैं। मुल्क की सूबाई सरकारों ने भी लोगों को कोरोना के क़हर से महफ़ूज़ रखने अपना सुख-चैन गँवाया है। मगर अब सरकारों का हौसला ठिठक गया है वो भी आर्थिक तंगी की वजह से। अब इस आर्थिक तंगी को दूर करने के लिए राज्य सरकारों के पास एकमात्र विकल्प यही है वो कोरोना और फ़िज़िकल डिसटेंसिंग को ताक पर रखकर शराब बिकवाने मजबूर हों।
नेहरु जी यह सब आपकी वजह से हो रहा है। अगर आपने गांधी जी बात मान ली होती और मद्य निषेध क़ानून लागू कर देते तो आज इतने पियक्कड़ पैदा न होते। राज्यों की सरकारें आबकारी आय पर निर्भर न होतीं। पियक्कड़ भी ‘इकॉनामिक वारियर्स’ के ख़िताब से ख़ुद को नवाज़ न पाते। आज ये ‘इकॉनामिक वारियर्स’ ख़ुद को अर्थव्यवस्था का पाँचवाँ स्तंभ बताते सड़कों पर दौंदरा मचा रहे हैं। हालाँकि नेहरु जी आपकी अदूरदर्शी सोच और नीतियों के चलते ऊपर के चार स्तंभ पहले ही कथित तौर पर दूषित हो चुके हैं। अब ‘इकॉनामिक वारियर्स’ यानि पाँचवाँ स्तंभ अपने घर और समाज को इंफ़ेक्टेड करने शराब मंडी तक खुल्लम-खुल्ला पहुँच रहा है और झूम बराबर झूम की तर्ज़ पर लौट रहा है। लौटते वक़्त अगर ये ‘इकॉनामिक वारियर्स’ कोरोना, इबोला, डेंगू, स्वाइन फ़्लू या कोई और घातक संक्रमण संग ले आए तो इनके साथ इनका घर-मोहल्ला तो जाएगा ही तेल लेने साथ ही स्थानीय प्रशासन की नाक में दम हो जाएगी। यही नहीं पिछले पचास दिनों से काम-धंधा और रोज़ी-रोटी छोड़ घर में बैठी जनता जो कोरोना भगाने ताली-थाली बजाई, दीये-बाती जलाई, उसकी इतने दिनों की तपस्या व्यर्थ चली जाएगी।
नेहरु जी आपको यह सोचना चाहिए था कि जब कभी देश में कोरोना वायरस जैसी कोई महामारी आएगी और लॉक डाउन की स्थिति निर्मित होगी तो राज्य सरकारों को दारू बिकवाकर रुपया इकट्ठा न करना पड़े। नेहरु जी यह सब आपकी वजह से हो रहा है। एम्स, आईआईटी, डैम, उच्च शिक्षा, संचार, इसरो, बड़े-बड़े प्लांट आदि में बेफ़िज़ूल पैसा ख़र्च कर गए। यही पैसा अगर बचत में होता तो हमारी राज्य सरकारों को दारू बेचकर रुपया उगाही नहीं करना पड़ता।
नेहरु जी यह देश आपको कभी माफ़ नहीं करेगा अगर इन कमाऊ ‘इकॉनामिक वारियर्स’ की वजह से कोरोना फैला तो। जनता की शराफ़त देखिए जब देश में सिर्फ़ पाँच सौ कोरोना मरीज़ थे तबसे रिंग मास्टर के एक इशारे पर सर्कस के शेर की तरह जनता ने ख़ुद घरों में क़ैद कर लिया। अपना काम, अपनी ख़ुशियाँ और अपने बच्चों की पढ़ाई, अपने ईश की आराधना सब त्याग दिया। यहाँ तक दाढ़ी, मूँछ और बाल तक बढ़ा लिए। लॉक डाउन के दरम्यान नारी शक्ति से गृह कार्य ले-लेकर उनका कचूमर निकाल निकाल दिया गया फिर भी देश की जनता ने उफ़्फ़ तक नहीं किया। अब जब कोरोना संक्रमित पचास हज़ार के पार हो गए तो भी हमें घर से क़दम निकालने की इजाज़त नहीं हैं मगर ‘इकॉनामिक वारियर्स’ की मौज के लिए दारू अड्डे खोल दिए गए। जैसे ‘इकॉनामिक वारियर्स’ कोरोना प्रूफ़ जन्में हों और वो जानलेवा कोरोना वायरस के कैरियर न बनेंगे।
नेहरु जी अगर इन ‘इकॉनामिक वारियर्स’ के ज़रिए कोरोना वायरस का फैलाव हुआ तो ये देश आपको कभी माफ़ नहीं करेगा और आपको हमारे लॉक डाउन वाले पचास दिन लौटाना ही पड़ेंगे। वैसे भी देश की जनता आपकी ग़लतियों का पुलिंदा सुन चुकी है। चूँकि कोरोना का असर सीधे जनता पर हो रहा है। इस संक्रमण से जितनी भी जन और धन की हानि हो रही है या होगी उसका दोष वर्तमान सरकारों पर न जाकर आप पर ही जाएगा।