व्यंग्य   ज़रूरत है दस नाक वाले ‘ दशानक’ की  

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                                 प्रभात गोस्वामी
हमारे बॉस के अड्डे (ऑफिस) में अति हर कोने में फैली हुई है . हाल ही में बॉस की आज्ञा से कुछ नए चमचों की नियुक्ति के लिए ऑफिस में एक इंटरनल ज़ुबानी विज्ञापन भी जारी किया गया है . उसकी शर्तें भी कुछ अति करने जैसी ही हैं. क्या बताएं बॉस बात-बात में नाक का सवाल बनाकर सब को झिंझोड़ते रहते हैं . फिर अपनी नाक में मक्खी भी नहीं बैठने देते . चमचे उनकी उम्मीदों पर खरे न उतरे तो नाक के बाल की मानिंद एक झटके में उन्हें बर्फ में लगाकर एक किनारे में पटक देते हैं . बॉस तो आखिर बॉस ठहरे . चित भी मेरी और पट भी मेरी .
 उनकी शर्त ये है कि अब दस नाक वाले चमचे ढूंढे जाएं ! आप आश्चर्य मत करना ! त्रेता युग में रामायण के विद्वान विलेन रावण के दस मुंह थे तो दस नाक भी तो थी न !! अब कलयुग में उन्हें सिर्फ दस नाक ही चाहिए . ज्यादा मुंह वालों की ज़रूरत नहीं है . बॉस किसी को ज्यादा मुंह भी नहीं लगाना चाहते . जितने ज्यादा मुंह होंगे तो उतनी ही ज्यादा बातें भी होंगीं . हमें सोचने , चिंतन –मंथन करने वालों से परहेज है . दस नाक वाले ‘दशानक’, ही  हमारे लिए आज के दौर में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं . उनका कार्य बॉस की नाक बचाना और उनकी जगह अपनी नाक कटाना रहेगा .
  इस विज्ञापन में भी असल शर्त तो नाक की ही है . चमचे की नाक पूरी तरह से साफ़ व सक्रिय होनी चाहिए. ‘नोज फॉर द न्यूज़’, का सेन्स बेहद ज़रूरी है. जिससे वह बॉस के भी बॉस से लेकर नीचे के मातहतों तक की विशेष खबरें सूँघ कर बॉस के सोशल मीडिया ग्रुप पर तुरन्त वायरल कर, उन्हें अपडेट रख सकें . वह दशा’नक'(दस नाक) होगा तो जॉब की गारंटी भी होगी . ये बॉस की नाक का सवाल जो है . आजकल बात-बात में नाक काटने व कटने का चलन जो चल पड़ा है . लोग नाक कटवाने के कार्य में इसीलिए माहिर भी होते जा रहे हैं !
 सभी नाकों पर सर्दी-जुकाम, कोरोना प्रूफ होने की शर्त भी लागू है. नाक कड़ी,खड़ी और ढीठी हो तो उसे प्राथमिकता मिल सकती है . नाकों चने चबाने और सर ..नहीं ..नहीं  नाक के बल चलने का अनुभव भी हो.. नाक के बढ़ते महत्त्व को देखते हुए ही बॉस के अड्डे में एक नाक रिपेयरिंग वर्कशॉप भी चौबीसों घंटे चलती है . किसी दिन सभी दस नाकें कट जाएं तो तुरन्त ही कोई पुरानी नाक स्टेपनी के रूप में उपलब्ध करवाई जा सके .
 वैसे रामायणकाल से लेकर आज तक दशानन यानि रावण के दस मुंह का ज़िक्र अब घिसते-घिसते कश्मीर की धारा -370 की तरह ख़त्म हो गया है . अब सारा दारोमदार नाक पर आ टिका है . नाक आज मुंह से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गई है . चेहरा तो वक़्त के साथ बदल भी जाता है . पर, नाक नहीं बदलती. क्योंकि नाक का कोई चेहरा नहीं होता . आज हर जगह, बात-बात में ‘नाक के सवाल’ का  ज़िक्र भी तो बखूबी होता है . कभी ‘मुंह का सवाल’ सुना है आपने ? बड़ा नकचढ़ा या नकचढ़ी है . कहीं नाक न कटवा देना, मुई त्रेता युग में एक नाक कटी थी जिसका परिणाम राम –रावण युद्ध हुआ था .
 इन दिनों हालात ऐसे ही हैं कि लोग नाकों चने चबा रहे हैं ! अब नाक नहीं – होती तो ये लोहे के चने भी नसीब नहीं होते . लोहा हमारे स्वस्थ शरीर में आयरन की कमी भी तो पूरी करता है . बॉस के अड्डे में इसीलिए ही नाक की इम्पोर्टेंस  को प्राथमिकता दी जा रही है . नाक का इतिहास भी यदि आज़ादी के दौर में देश के लिए सर कटवाने जैसा हो तो उसे बॉस के अड्डे में दस रत्नों में शामिल होने का अवसर भी मिल सकता है . बॉस का कहना भी है कि जिसके पास नहीं मजबूत नाक, उसका जीवन है खाक .
आज के दौर में कान कटने की परवाह किसी को भी नहीं . हम तो चाहते ही हैं कि कोई हमारे कान काट ले ताकि सुनने के झंझट से सदा के लिए मुक्त हो जाएं . पर , किसी भी कीमत में नाक नहीं कटनी चाहिए .जब देश की आज़ादी के लिए हमारे अमर शहीदों ने बिना उफ़ किये अपने सर कटवा लिए. तो क्या ऑफिस के काम से आज़ादी पाने वाले बॉस के खास चमचे अपनी नाक नहीं कटवा सकते ?
  विज्ञापन का सारांश यही है कि जो बॉस के लिए अल सुबह से देर रात तक, विपरीत परिस्थितियों में नाक कटवा कर , अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार रहेगा, उसे नियुक्ति के बाद सबसे अधिक ‘न्यौछावर’, मिलेगी  . यदि  आपकी नाक इन शर्तों और  आवश्यकताओं को पूरा करती है तो यह विज्ञापन आपके लिए ही है .   फोटो प्रतीकात्मक है