उनके नाम के साथ ‘ साहब ‘ जुड़ना श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक

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                                            रवीन्द्र वाजपेयी
घर में उनका आना महत्वपूर्ण अवसर होता था | कोई न कोई प्रमुख सदस्य उनके स्वागत हेतु तैयार रहता | उनके आते ही उनका बैग उठाकर उन्हें अंदर लाया जाता | वे बैठते तो पहले अतिथि की तरह सत्कार की रस्म निभाई जाती थी | फिर उन्हें उस व्यक्ति से मिलवाया जाता जिसके लिए उन्हें बुलवाया गया था | उसका हालचाल जानने के बाद वे उसकी समस्या के निदान हेतु अपना उपक्रम करते थे | इस दौरान परिवार के बाकी सदस्यों की कुशलता का पता भी करते जाते | उनके लिए चाय बनाने का आदेश पहले ही जारी हो चुका होता था | वे और कोई नहीं हमारे फैमिली डॉक्टर होते थे |
मरीज की जाँच करने के लिए उनके गले में टंगा आला ( स्टेस्थोकोप ) और उनका चिकित्कीय अनुभव ही पर्याप्त था | जरूरी होने पर वे बैग में से एक मोटी सी सिरिंज मय सुई के निकलकर उसे गर्म पानी में उबालने कहते और बाद में मरीज को इंजेक्शन भी अपने पास से लगा देते थे | उसके खान – पान के बारे में जरुरी निर्देश देते हुए जरूरत पड़ने पर घरेलू उपाय भी सुझा देते थे | बुखार तेज होने पर ठंडे पानी की पट्टी माथे पर रखने जैसी सलाह आम थी | तदुपरांत चाय पीने के दौरान घर में छोटे बच्चों को उनके सामने डराया जाता कि दूध नहीं पियोगे तो डॉक्टर साहब सुई लगा देंगे | फीस लेकर वे कहते किसी को दवाखाने भेज दो , साथ में धुली हुई शीशी लेकर । मैं दवाई दे दूंगा | शीशी में पीने वाली दवा , कुछ गोलियां और पुड़ियाँ होती थीं | पीने वाली दवा की शीशी पर एक कागज इस तरह काटकर चिपका होता , जिससे कितनी खुराक लेनी है ये पता लग जाता था |
आज से दो – तीन दशक पहले तक उक्त दृश्य हर घर में दोहराया जाता था | उन डॉक्टरों में अधिकतर एमबीबीएस होते थे | उनके अलावा डिप्लोमा हासिल करने वाले भी थे लेकिन उन्हें कोई झोला छाप नहीं कहता था | विशेषज्ञों की संख्या गिनती की थी , वह भी बड़े शहरों में | डॉक्टरों की वह परम्परा गाँव – गाँव तक फैली थी | एक तरह से वे परिवार का हिस्सा ही थे |
धीरे – धीरे चिकित्सा विज्ञान ने तरक्की की तो फैमिली डॉक्टर वाली परिपाटी भी समाप्ति की और बढ़ चली | यद्यपि अभी भी शहर , कस्बे और ग्रामीण इलाकों में निजी डॉक्टरों के दवाखाने हैं लेकिन घर आकर देखना कम होता जा रहा है | जनता भी साधारण एमबीबीएस की बजाय और ऊँची डिग्री वाले डॉक्टर के पास जाने को प्राथमिकता देने लगी है | बीमरियां भी नए रूप में आने लग गई हैं | इसका परिणाम ये हुआ कि मोहल्ले वाले डॉक्टर साहब कम होते जा रहे हैं |
लेकिन कोरोना के कारण हुए लॉक डाउन में ये मोहल्ले वाले अधिकतर डॉक्टर भी दवाखाना बंद कर घर बैठ गये | प्रधानमन्त्री ने हाथ जोड़कर निवेदन जो किया था | लोगों को लगा कि एकाध दिन के लिए ऐसा होगा | लेकिन बाद में देखा गया कि दवाखाना स्थायी रूप से बंद है | कुछ ने तो अपने फोन चालू रखे किन्तु कुछ ने वे भी बंद कर दिए | ऐसे में उनके मरीज जरूरत पड़ने पर शासकीय अस्पताल गये लेकिन वहां तो कोरोना का बोलबाला होने से उनकी तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया | जो सक्षम थे वे निजी नर्सिंग होम में ज्यादा पैसा देकर इलाज करवा आए लेकिन बाकी बेचारे अपनी मजबूरी में फंसे हैं | इसमें भी ध्यान देने वाली बात ये है दवाखाना भले बंद हो लेकिन बाजू वाली दवा दूकान खुली रहने से लोग बाग उसी से पूछकर अपना इलाज कर रहे हैं | लेकिन जिन बुजुर्गों को संक्रमण के डर से अस्पताल ले जाने मना किया जा रहा है वे अपने नजदीकी डॉक्टर साहब की अनुपस्थिति में भगवान भरोसे ही हैं |
पिछले दिनों मुझे मप्र के मुख्यमंत्री से वीडियो कान्फ्रेंसिंग के दौरान वार्तालाप का अवसर मिला , तब मैंने उन्हें जनरल प्रैक्टिशनर्स के दवाखाने बंद होने से आम जनता को हो रही परेशानी से अवगत करवाया । बाद में सोशल मीडिया पर उस वार्तालाप की जानकारी सार्वजनिक की तो एक चिकित्सक मित्र ने फोन पर मुझसे सवाल किया कि दवाखाना खोलकर बैठ जाने पर डॉक्टर की सुरक्षा की जवाबदेही किसकी रहेगी ? प्रश्न वाजिब था , क्योंकि इंदौर के अलावा कुछ अन्य जगहों पर निजी दवाखाना चलाने वाले कुछ डॉक्टर्स कोरोना संक्रमित होकर चल बसे |
शासकीय सेवा वाले कोरोना वॉरियर्स का तो सरकार ने भारी बीमा करवा दिया लेकिन निजी डाक्टर्स उससे वंचित हैं | इसलिए उनकी आर्थिक सुरक्षा का मुद्दा है तो महत्वपूर्ण | लेकिन इसी के साथ ये विचार भी आया कि हम पत्रकार , हमारे सम्वाददाता , फोटोग्राफर आदि भी तो अपनी जान जोखिम में डालकर कोरोना के दौरान अपने काम में लगे हैं | समाचार पत्र बांटने वाला हॉकर , सब्जी और फल का ठेला लगाकर गली मोहल्लों में घूम रहा गरीब और दूध बांटने वाला ,भी तो खतरे से खेल रहा है |
डॉक्टर तो फिर भी स्वास्थ्य विषयक सावधानियों से अवगत हैं लेकिन ऊपर वर्णित लोगों में उतनी जागरूकता की अपेक्षा नहीं की जाती | और ऐसे समय हमारा परिचित डॉक्टर केवल इलाज नहीं अपितु मनोबल बढ़ाने वाला हौसला भी तो दे सकता है |
अपने देश में निजी क्षेत्र के दो पेशे ऐसे हैं जिन्हें सम्मान देते हुए साहब शब्द उनके साथ जोड़ा जाता है | और वे हैं डाक्टर और वकील | लेकिन लॉक डाउन के दौरान निजी प्रैक्टिस वाले डॉक्टर्स द्वारा दवाखाना बंद रखना आम लोगों को पसंद नहीं आया |
मेरे परम मित्र स्व. डॉ. सुधीर नेल्सन के कक्ष में एक दवा कम्पनी द्वारा प्रदत्त पोस्टर टंगा था | जिसमें लिखा था , “ We have not lost faith in God , but we have trasferred it in to Doctor .” ( हमने भगवान में विश्वास खोया नहीं है अपितु उसे डॉक्टर में स्थानान्तरित कर दिया है ) |
अब ऐसी सूरत में जरूरत के वक्त धरती के भगवानों की गैर मौजूदगी ने तमाम सवाल खड़े कर दिए हैं | डॉक्टर भी आखिर इंसान ही है जो बीमार हो सकता है | किसी भी संक्रमण से उसे अपना बचाव करना पड़ता है और सामान्यतया वे ऐसा करते हैं | किसी भी बीमारी के फैलने पर मास्क और सैनिटाईजर का उपयोग उनके द्वारा होता रहा है | लेकिन कोरोना काल में फैमिली डॉक्टर्स की परम्परा के इन अवशेषों की भूमिका से भविष्य में मरीज – डॉक्टर सम्बन्ध भी नये सिरे से परिभाषित करने की जरूरत पड़ गई है |
वैसे पहले से ही डॉक्टरी के पेशे पर अनैतिक तरीकों से पैसा कमाने की हवस का आरोप खुले आम लगता रहा है | कुछ अपवाद भले हों लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि पहले डॉक्टर के साथ लगने वाले साहब में जो श्रद्धा और सम्मान का भाव था वह लुप्त हो चुका है |
चिकित्सा सेवा से कब व्यवसाय बन गई ये अलग विश्लेषण का विषय है | लेकिन बीते एक माह में गली – मोहल्ले में सेवाएँ देने वाले अपने से लगने वाले ज्यादातर डॉक्टर्स की बेरुखी उनके पेशे के साथ जुड़ी पवित्रता और प्रतिबद्धता से पलायन तो है ही |
हालाँकि उनके पास अपनी सफाई के इतने तर्क होंगे जिनसे हम सब निरुत्तर होकर रह जायेंगे लेकिन ऐसे समय पर जैसा कि पूर्व में कहा गया डॉक्टर की भूमिका एक मनोवैज्ञानिक की भी होती है | अब इसे नियति का खेल भी कह सकते हैं कि पास वाले डॉक्टरों की गैर मौजूदगी में लोगों ने आत्मबल से स्वयं को स्वस्थ रखा | कुछ लोग तो ये भी कहते सुने जा सकते हैं कि लगता है वे बीमार थे ही नहीं |
लॉक डाउन के समय सरकारों ने निजी नर्सिंग होम बंद रखने के खिलाफ तो अनेक बार नाराजगी दिखाई लेकिन निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों द्वारा दवाखाने बंद रखने के विरोध में दो दिन पहले ही फरमान जारी किया | वैसे प्रैक्टिस करना न करना किसी डॉक्टर का निजी अधिकार है लेकिन ऐसे समय जब सामान्य जन को उसकी जरूरत रही तब उसका इस तरह नदारद हो जाना संवेदनहीनता नहीं तो और क्या कही जायेगी ?
मरीजों की मजबूरी है कि वह डॉक्टरों का विरोध चाहकर भी नहीं कर सकता क्योंकि दोनों के बीच जरूरत और भावनाओं से जुड़ा हुआ रिश्ता है | कोरोना कुछ दिन बाद तो चला ही जाएगा और ये डॉक्टर फिर दवाखाने खोलकर सेवा प्रदान करेंगे | लेकिन बीते सवा महीने के मुश्किल भरे दिनों की कटु स्मृतियाँ आसानी से मिटने वाली नहीं हैं |
लॉक डाउन के कारण काम पर नहीं आ रहे मेरे एक कर्मचारी ने सुबह फोन पर पत्नी का स्वास्थ्य खराब होने की जानकारी देते हुए सलाह माँगी | मैंने उसे अपने डाक्टर से सम्पर्क करने कहा किन्तु उसने कहा वे मिलते ही नहीं | फिर पता चला बीते एक माह से उसकी पत्नी की साप्ताहिक चिकित्सा जाँच भी नहीं हो सकी | किसी नर्सिंग होम में जाकर इलाज करवाने में वह सक्षम नहीं है इसलिये परेशानी और बढ़ गयी | मैंने उसकी समस्या का तात्कालिक हल तो करवा दिया लेकिन यदि लॉक डाउन ज्यादा चला तब क्या होगा ये सोचकर मैं भी चिंतित हूँ |
इसी बीच सरकारी विज्ञप्तियों में पढ़ने मिला कि प्रशासन झोला छाप डाक्टरों के यहाँ छापे मारकर उनके विरुद्ध कारवाई कर रहा है | अब उसे कौन समझाए कि मुसीबत का मारा मन्दिर और मज़ार का फर्क तक भूल जाता है , तब भला वह कैसे जानेगा कि कौन झोला छाप है और कौन असली डिग्री धारी ?
कोरोना ने अनेक ऐसे सवाल समाज के सामने विचारार्थ रख दिए हैं जिनका संज्ञान आज नहीं तो कल लेना ही पड़ेगा | इस महामारी के आते ही हमारे देश की दयनीय चिकित्सा व्यवस्था की चर्चा हुई | जन स्वास्थ्य को लेकर प्रति व्यक्ति बजट में आवंटित की जाने वाले राशि पर भी खूब तंज कसे गये | चिकित्सा को सरकार की जिम्मेदारी मानकर उसको निःशुल्क किये जाने की बातें भी चल पड़ीं | कोरोना वारियर्स के तौर पर काम करने वाले डॉक्टर्स और उनके सहयोगियों के अथक परिश्रम और समर्पण भाव की पूरा देश मुक्तकंठ से प्रशंसा भी कर रहा है किन्तु संकट की इस घड़ी में जनता से सीधी जुड़ी चिकित्सा सेवा द्वारा खुद को लॉक डाउन कर लेना अपराध न सही लेकिन अनुचित तो है ही |
इस बारे में सरकार और कानून क्या कर सकते हैं या करेंगे , ये तो वे ही जानें लेकिन जिन भी डॉक्टर्स ने इस दौरान अपने मरीजों को इलाज से वंचित रखा उन्हें अपने आपसे से पूछना चाहिये कि उन्होंने जो किया क्या सही था ?
वहीं जिन डाक्टर्स ने लॉक डाउन के दौरान भी अपने मरीजों की कुशलता का ध्यान रखा वे सभी साधुवाद और अभिनंदन के पात्र होने के अलावा आगे भी साहब कहे जाने के हकदार हैं।