उफ् ! ये ‘ट्रिब्यूट फ्राॅम होम’ का अ-सामाजिक समय…

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                                              अजय बोकिल
कोरोना ने समाज की सदियों पुरानी जिस मानवीय परंपरा को एक झटके में ढहा दिया है, वो है किसी स्वजन, परिजन, परिचित अथवा सामाजिक दायित्व के तहत किसी के अंतिम संस्कार में शामिल होकर उसे आखिरी विदाई देना। कोरोना ने यह सदिच्छा भी मानो छीन ली है। अब कोई किसी के अंतिम संस्कार में जाने की जगह, उससे बचने की हरसंभव कोशिश कर रहा है। जहां ज्यादातर जगह लोग खुद ही ऐसे कर्मकांड से बच रहे हैं, वहीं जहां कुछ लोग जाना चाहते हैं तो कोरोना के कारण उन्हें इजाजत नहीं मिलती। तो क्या अब अंतिम संस्कार को लेकर भी हमारा पारंपरिक सोच बदल रहा है? यह सवाल इसलिए अहम है कि आम आदमी तो दूर उन सेलेब्रिटीज को अंतिम विदाई भी उंगली पर गिनने लायक लोग दे पा रहे हैं, जिनकी एक झलक पाने के लिए हजारों लोग उमड़ा करते थे। बाकी मामलों में तो हालात इतने खराब हैं कि बेटा तक मृत बाप को मुखाग्नि देने तैयार नहीं है तो कहीं अकेली पत्नी ही पति की लाश को श्मशान घाट तक ले जाकर उसका दाह संस्कार कर रही है। कुछ जनाजे कब्रिस्तान के भीतर नहीं जा पा रहे हैं तो एक प्रतिष्ठित रागी की पार्थिव देह को श्मशान घाट भीतर आने देने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। आम आदमी की कोरोना मौत नारकीय मौत से भी बुरी है, लेकिन सेलेब्रिटीज की मौत का मातम भी अब सोशल मीडिया में ही मन रहा है। भले ही किसी की मौत कोरोना के बजाए किसी और बीमारी से हुई हो। विदेशों में तो ताबूत बनाने वाले थक चुके हैं तो कुछ देशो में उम्र देखकर इलाज और फ्यूनेरल किया जा रहा है। यानी जवान हो तो ज्यादा दुख और बूढ़ा हो तो सिर्फ इतनी आह कि उसे तो जाना ही था…!
ऐसी कई बातें पिछले कुछ दिनों से मन को बुरी तरह मथ रही हैं कि कोरोना-कम्पास समाज को कौन-सी दिशा में ले जा रहा है ? दो दिन पहले मशहूर अदाकार इरफान की मौत एक विरल कैंसर से लड़ते हुए हुई। उनके आखिरी सफर के गवाह सिर्फ 25 लोग ही हो सके। इसके दूसरे दिन मौत ने जाने-माने हीरो ऋषि कपूर को अपने पाले में खींच लिया। अंतिम यात्रा के साक्षी मात्र 20 लोग ही थे। ऋषि और इरफान वो लोग हैं, जिनके एक ट्वीट भर से सोशल मीडिया में तूफान आ जाया करता था। ऋषि कपूर जैसे ‘लवर ब्वाय’ की तो एक पूरी पीढ़ी ही दीवानी रही है। लेकिन ईश्वर ने उनकी जिंदगी का खाता शायद गलत वक्त पर क्लोज किया। गए भी तो कोरोना-काल में।
इससे भी क्षुब्ध करने वाली घटनाएं हमने बीते महिने भर में घटते देखीं। ऐसी घटनाएं, जहां दहशत ने जज्बात को लाॅक डाउन में डाल दिया है। सबसे विचलित करने वाला मामला शाजापुर जिले के शुजालपुर का है। कोरोना पाॅजिटिव पाए गए एक व्यक्ति की मौत के बाद उसकी पार्थिव देह को लेने उसकी पत्नी, बेटा और परिजन भोपाल पहुंचे तो प्रशासन ने कहा कि कोरोना मृतक का अंतिम संस्कार भोपाल में ही एसअोपी ( स्टैंडर्ड आॅपरेटिंग प्रोसीजर) के तहत करना होगा। यह सुनकर परिजन इतना घबरा गए कि उन्होंने सुरक्षा के लिए प्रशासन द्वारा दी गई पीपीई किट्स पहनने तक से इंकार कर दिया। उन्हें काफी समझाया गया, लेकिन वो नहीं माने। अंतत: तहसीलदार गुलाब सिंह बघेल ने पीपीई किट पहन कर मृत व्यक्ति को अग्नि दी। मृतक का बेटा और पत्नी दूर से यह सब देखते रहे। इस व्यक्तिगत प्रसंग में तहसीलदार असली ‘वाॅरियर’ साबित हुए। उधर महिला को मृत पति की अंत्येष्टि से ज्यादा अपने बेटे के जिंदा रहने की चिंता थी। पिता की जलती चिता दूर से देख रहे बेटे के मुंह से सिर्फ इतना निकला-‘भगवान ऐसी मौत किसी को न दे।‘
इसके विपरीत दूसरा उदाहरण रायसेन जिले में कोरोना के कारण अपने जवान पति को खो चुकी उस महिला का है, जिसके पति की मृत देह को कंधा देने के लिए भी कोई तैयार नहीं हुआ। भोपाल के सुभाष नगर विश्राम घाट पर अकेली महिला एक शव लेकर पहुँची तो विश्रामघाट के कर्मचारी भी हैरान रह गए। उस अकेली महिला ने पीपीई किट पहनकर उन कर्मचारियों की मदद से अपने पति को अग्नि दी। रोज अंतिम संस्कार देखने के आदी विश्रामघाट के कर्मचारियों की आंखें भी यह देखकर नम हो आईं। वो भी भीतर से कहीं हिल गए।
पंजाब के लुधियाना में कोरोना के कारण दम तोड़ चुकी एक बुजुर्ग महिला का शव उसके परिवार वालों ने लेने से इंकार कर दिया। अंतत: प्रशासन ने श्मशान के सेवादारों ने उस महिला का अंतिम संस्कार कराया। परिवार सिर्फ दर्शक बना रहा। वो भी दूर एक कार में बैठकर। लेकिन पंजाब के ही अमृतसर में ऐसे ही एक मामले में श्मशान घाट वालों का भी दिल नहीं पसीजा। कोरोना से मरने वाला यह शख्स कोई आम आदमी नहीं था। वे स्वर्ण मंदिर का पूर्व रागी और पद्मश्री से सम्मानित ज्ञानी निर्मल सिंह थे। जब उनका शव अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट ले जाया गया तो श्मशान घाट कमेटी ने इसकी अनुमति देने से इंकार कर िदया। परिजन दो श्मशान घाटों पर दर दर भटकते रहे लेकिन कमेटीवालों ने श्मशान घाट पर ही ताला डाल दिया। कहकर कि कोरोनाग्रस्त व्यक्ति के अंतिम संस्कार से दूसरों को संक्रमण का खतरा है। अंतत: गांव की पंचायत ने दाह संस्कार के लिए जमीन उपलब्ध कराई।
कब्रिस्तानों की कहानी भी इससे बहुत अलग नहीं है। कश्मीर के श्रीनगर में कोरोना पीडि़त एक वृद्धाक की मौत के बाद उसके जनाजे को कंधा देना तो दूर कोई कब्र खोदने के लिए भी तैयार नहीं हुआ। आखिर पुलिस कर्मियों ने ही कब्र तैयार कर मृत महिला को सुपुर्दे खाक किया। तमिलनाडु के चेन्नई में लोगों का इलाज करने वाले एक डाॅक्टर की कोरोना से मौत हो गई। जब प्रशासन के लोग डॉक्टर के शव को दफनाने कब्रिस्तान पहुंचे तो भीड़ ने एंबुलेंस पर हमला बोल दिया। राज्य के नेल्लोर में भी इसी तरह की एक क्षुब्धकारी घटना में कोरोना पीडि़त डाॅक्टर की मौत के बाद उन्हें अंतिम संस्कार के लिए ले गई पुलिस को स्थानीय लोगों के विरोध के कारण शव को वापस मर्च्यूरी ले जाना पड़ा। और बाद में तड़के चुपके से उसका अंतिम संस्कार करना पड़ा।
संवेदनहीनता की यह काली छाया पूरी दुनिया में पसरी है। कई देशों में कोरोना मृतकों की देह दफनाने के लिए अलग से कब्रिस्तान बनाए गए हैं, जहां पीपीई किट पहनकर चुनिंदा लोग अंतिम संस्कार करते हैं। लगभग सभी देशों ने फ्यूनरल में लोगों के एकत्र होने पर पाबंदी लगा दी है, या फिर उनकी संख्या सीमित कर दी है। केवल जरूरी धार्मिक संस्कार की अनुमति है। दक्षिण अमेरिकी देश इक्वेडोर में ताबूतों का इतना टोटा पड़ गया है कि कोरोना मृतकों के लिए लकड़ी की जगह गत्ते के ताबूत मुहैया कराए जा रहे हैं। ब्रिटेन मंअ ताबूत निर्माताअों का कहना है कि कोरोना के कारण भारी संख्या में मौतों के चलते वो ताबूतों की मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं।
यानी कितना फर्क ! कहां तो किसी की मय्यत में न जा पाने मलाल बरसों सालता था। कहां अब मौत की सूचना मिलने पर भी सिर्फ सोशल मीडिया में आंसू बहाने पड़ते हैं। यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि सारी संवेदनाएं अब किसी ‘फेसबुक’ और ‘ट्विटर’ की पोस्ट में आकर सिमट गई हैं। किसी के जाने की खबर मिलते ही सैंकड़ों लोग अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलि देने टूट पड़ते हैं। एक अघोषित स्पर्द्धा-सी चल पड़ती है कि कोई इस नेक काम में पीछे न रह जाए। शोक संवेदनाअों की ऐसी मूसलधार बारिश होने लगती है कि वास्तव में शोकमग्न कौन हैं और इस मातम का एपीसेंटर असल में कहां है, समझना कठिन हो जाता है। अभी तक लोग किसी की अंत्येष्टि में इसलिए शामिल होते रहे हैं, क्योंकि दुख की इस घड़ी में उसके परिजनों को मानसिक संबल िमले। यह व्यक्ति का व्यक्ति से एक मौन लेकिन जीवंत संवाद हुआ करता था। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। ‘वर्क फ्राॅम होम’ तो आ ही गया था, अब शायद ‘ ट्रिब्यूट फ्राॅम होम’ का जमाना है।
सोशल मीडिया में अब जो नजर आ रहा है, वह दरअसल संवेदनाअों का अ-संवेदनशील प्रदर्शन ज्यादा है। शोक प्रकट करने की सोशल मीडियाई खाना पूर्ति है। हद तो तब हो जाती है जब कोई अपनी मां की अर्थी तैयार करते वक्त भी इस ‘क्रिएटिव वर्क’ की तस्वीर तुरंत पोस्ट करने से नहीं चूकता। इसे आप क्या कहेंगे ? संवेदना की या संवेदनहीनता की पराकाष्ठा?