व्यंग स्टे शैफ-स्टे सेफ

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                                          प्रभात गोस्वामी
कोरोनाकाल में डॉक्टर,इंजीनियर, आईएएस सहित सारी कोचिंग क्लासेज बंद पड़ी हैं . लेकिन , सभी घरों में लॉकडाउन के सन्नाटे के बीच खाना-खज़ाना कोचिंग जमकर चल रहीं हैं . ‘उसकी साड़ी, मेरी साड़ी से सफ़ेद कैसे?’ की तर्ज़ पर ‘उसकी रेसिपी मेरी रेसिपी से अच्छी कैसे?’ का कॉम्पीटिशन ज़ोरों से चल पड़ा है . आप एक रेसिपी फेसबुक , व्हाट्सएप ग्रुप या इन्स्टाग्राम में डालकर देखो, पलक झपकते ही बीसियों रेसिपीज आपको ज़वाब में मिल जाएँगी .
इनमें कुछ वो लोग हैं जो सर्विस के सिलसिले में घर से दूर रहकर खाना बनाना सीख गए हैं . कुछ वो हैं जो शौकिया तौर पर कभी-कभार खाना बनाते थे पर पत्नीजी के लॉकडाउन की वजह से अब नियमित बना रहे हैं . कुछ चालू पुर्जे भी हैं जो कुछ भी नहीं बना रहे पर गूगल या अन्य कहीं से रेसिपीज के सुंदर चित्र कबाड़ कर अपने नाम से सोशल मीडिया में चला रहे हैं . कुछ सब को यकीन दिलाने के लिए सीधे रसोई से लाइव भी हो रहे हैं .
सोशल मीडिया तरह-तरह के लज़ीज़ पकवानों की आभासी महक से गुलज़ार हो रहा है . पत्नी के हाथ से बने मलाई कोफ्तों का आनंद लीजिए . बिटिया ने कमाल की भेलपूरी बनाई है . शर्माजी के हाथों से बनी रबड़ी खाइए , इसकी डिमांड तो दूर देशों से आने लगी है . अरे, आप गुप्ताजी के हाथ का कैरी का आचार और बेसिन की रोटी एक बार खा कर तो देखिये बाकी सब भूल जाएँगे ! मेरे हाथों की…मेरे हाथों की…उफ़्फ़, महाभारत में कौरव-पांडवों का युद्ध और घरों में रेसिपी युद्ध ?
खाना-खज़ाना का यह कॉम्पीटिशन सुबह के नाश्ते, लंच ,ब्रंच और फिर डिनर तक सोशल मीडिया में ज़बरदस्त ट्रेंड कर रहा है .  कुल मिलाकर कोरोना ने घर-घर में लज़ीज़ खाना बनाने और एक-दूसरे को आभासी स्वाद से तरसाने की कड़ी प्रतिस्पर्धा करवा दी है . यहाँ किसी को भी ये बर्दाश्त नहीं कि खाने के मामले में कोई उनसे आगे निकल जाए . सब एक से बढ़कर एक शेफ बने हुए हैं !
आज शाम अपनी बालकनी में खड़े थे . कुछ ही देर में मुंह लटकाए हमारे पड़ोसी, शाकाहार के परम ‘वारियर’ टल्लू लाल भी दिखाई पड़े . हमने पूछा,” भाई , आज क्या बनाया ?”
मुंह लटकाए टल्लू ने बड़े बेमन से बताया,” मुर्गा ?”
हमारी आँखें चकरा गईं ,” अरे भाई , क्यों मजाक करते हो ? सच-सच बताइए क्या बनाया ? आपने सोशल मीडिया में आज कुछ भी नहीं डाला ?”
टल्लू फिर रुआंसे हो कर,” अबे यार, बोल तो दिया मुर्गा बनाया .”
शहर में जोर-शोर से शाकाहार का प्रचार करने वाला आदमी मुर्गा बना रहा है ? हमें तो लग रहा है कि ये आदमी हमें उल्लू बना रहा है ! ये बात हज़म ही नहीं हो रही थी . आखिर ये बात को टाल क्यों रहा है , बताना क्यों नहीं चाह रहा ? लगता है कोई बड़ा तीर मारकर ये हमें गच्चा देगा. अचानक से कुछ सोशल मीडिया में डालने वाला तो नहीं ? कहीं हम इसकी रेसिपी से पीछे न रह जाएं ? सारा रिपोर्ट कार्ड ख़राब हो जाएगा ! सवाल-दर-सवाल से माथा चकरा रहा है.
इस बार हमें गुस्सा आ गया था . हमने कड़क कर पूछा,” सच-सच बताइए , हम से छिपकर आप क्या गुलगफाड़ा कर रहे हैं ? आप कब से मुर्गा बनाने लगे ? शर्म करो ? बताइए, नहीं तो सारे व्हाट्सएप ग्रुप में बदनाम कर देंगे आपको . कहीं का नहीं छोड़ेंगे . शाकाहार योद्धा का तमगा छिन जाएगा , समझ लीजिए अच्छे से.”
अब टल्लू लाल फफक पड़े . अश्रुधारा से भीगे गालों पर बहती गंगा-जमुना के बीच उसने फिर वही ‘राग मुर्गा’ का आलाप शुरू कर दिया . दुखी हो कर बोले,”भाई क्या बताऊँ, सुबह नाश्ता कर तम्बाकू की तलब पूरी करने के लिए घर की लक्ष्मण रेखा को तोड़कर चुपके से बाहर चौराहे तक गया था .रामायण देखने के बाद भी सबक नहीं लिया हमने . फिर क्या ? इसके दुष्परिणाम तो भुगतने ही थे . खाकी भाईयों ने पहले हाथ धुलवाए फिर एक घंटे मुर्गा बनाया .”
हम दर्द से अभी तक कराह रहे हैं और तुम्हें यकीन ही नहीं हो रहा ! पूरे दिन यह वाकिया याद कर साली भूख भी मर चुकी है, क्या खाक बनाएं खाना  ? पंडितजी,आप भी गुटखे-तम्बाकू का शौक कोरोना के बहाने हमेशा के लिए बिसारिए, कुछ दिन तो घर में ही गुजारिये. हमें कोरोना को मिलकर हराना है . इसलिए घर पर रहिये, खाना बनाते रहिए .”स्टे शेफ-स्टे सेफ.”
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