रहिमन विपदा हू भली जो थोरे दिन होय..!

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जयराम शुक्ल
संकट के समय मनुष्य दार्शनिक बन जाता है। एकांतवास में नाना प्रकार के विचार आते रहते है- सोचो आखिर साथ क्या जाएगा। मुट्ठी बाँधे आया है.. हाथ पसारे जाएगा। आया है तो जाएगा राजा रंक फकीर..। मनुष्य का मन प्रवचनकार बन जाता है। जबकि इससे जरूरी होता है आत्मवंचन।
हमारे शास्त्रों ने संकट में भी जीवन प्रबंधन के सूत्रमंत्र दिए हैं। वनवास के समय प्रभु श्रीराम वटवृक्ष की जड़ को तकिया और पत्तों को बिछौना बनाकर शयन कर रहे थे। यह दृष्य देखकर निषादराज विलाप करने लगे। वाह रे विधि चक्रवर्ती सम्राट का राजकुमार बल्कल वसन में इस अवस्था में। प्रभु की ये दशा..? क्रोधित निषादराज दशरथ-कैकेयी को बुराभला कहने लगे।लक्ष्मण ने निषादराज के आँसू पोछते हुए कहा भ्राता व्यर्थ चिंतित होते हो…प्रभु इस दशा का पूर्ण आनंद ले रहे हैं..। यह स्थिति उन्होंने स्वयं चुनी है।
संकट को अपने अनुकूल या अपने को संकट के अनुकूल बना लेने की कला सिर्फ हमारे दर्शन में है। दो शब्दों का सूत्र है, जो यहां के मनुष्य को सनातन से सँभाले हुए है..इच्छा और कृपा, इसे नोट करके रखिए।
यदि अच्छा ही अच्छा हुआ तो कृतज्ञ मनुष्य कहता है- ये प्रभु की कृपा है। संकट या विपत्ति आ जाए तो- यही प्रभु की इच्छा है कहकर आत्मा को संतोष देता है और बड़े बड़ा कष्ट झेल जाता है। प्रार्थनाओं में उसके दुख-सुख एकाकार हो जाते है। कृतज्ञत भाव से वह गा उठता है- करते हो तुम कन्हैया मेरा नाम हो रहा है।
पुराण कथाएं कोरी गप्प नहीं हैं जैसा कि सेकुलरिए अक्सर कहते हैं। पुराणों की हर कथा में जीवन प्रबंधन के सूत्र हैं, बस उन्हें पकड़ते बनना चाहिए। जो इन्हें नहीं मानते वही हिरण्यकशिपु हैं, वही रावण हैं। ये दोनों पात्र, पात्र से बढ़कर अहंकार के प्रतिरूप हैं।
अहंकार का हश्र क्या होता है एक न एक दिन सामने आता है। तुलसी कहते हैं- उघरे अंत न होंहि निबाहू। कालिनेमि जिमि रावन राहू।
दुनिया की ताकतें एक अनदेखे-अबूझे जीवाणु से त्रस्त हैं। सबको जीत लेने की मंशा रखने वाली शक्तियों को एक वायरस छकाए पड़ा है, वे पस्त हैं। न डालर- पौंड काम आ रहा है, न एटम बम-मिसाइलें।
तरक्की भी बूमरैंग करती है। उसी के आयुध उसी को मार जाते हैं। दूसरों को मारने के लिए खरीदी गई रिवाल्वर प्रायः खुद की कनपटी खोल देती है। आँकड़े बताते हैं कि लायसेंसी बंदूकों से हत्याओं से ज्यादा आत्महत्याएं होती है।
करोना के विषाणुओं को दूसरे के नाश के लिए पाला गया अब खुद का नाश कर रहा है। अमेरिका कहता है कि यह चीन ने बनाया, चीन कहता है कि अमेरिका के वैज्ञानिकों की दिमागी उपज है..। वे हमारा नाश करना चाहते थे। दोनों देश ही अपने-अपने हिस्से का अर्धसत्य बयान कर रहे हैं..दोनों ही तबाह हैं। कई राष्ट्राध्यक्ष अवसाद में चले गए। खबर मिली कि जर्मनी के वित्तमंत्री ने रेल में कटकर जान दे दी।
मानवजनित विपत्ति में भगवान भी मदद नहीं करता। तुमने बेसाहा है तो तुम्हीं निपटो। हमारे दर्शन में सबकुछ ईश्वर की कृपा और इच्छा से चलता है। यह विचार ही आधे संताप को हर लेता है। मजबूत मनोबल का आदमी पहाड़ों से टकरा जाता है।इस मनोबल के मूल में ईश्वर है। इसी की ताकत के दमपर यहां का मनुष्य एक हजार किलोमीटर चलना भी ठान लेता है। यह जिजीविषा दैवीय है।
एक बार दुर्भिक्ष में महर्षि विश्वामित्र मित्र को निषिद्ध प्राणी का मांस खाना पड़ा। यह देख लोग उलाहना देने लगे कि ये किस बात के महर्षि हैं, स्वयं पापकर्म करते हैं दूसरों को उपदेश देते हैं। विश्वामित्र ने कहा- मूर्खों पाप के डर से मरने से बेहतर है कि जिंदा रहकर पुरुषार्थ करें। कालांतर में विश्वामित्र ने अकालजयी अन्नों की खोजकर अकाल जैसी विपत्ति को चुनौती देदी।
कोदौ,कुटकी,साँवा,ज्वार,बाजरा इन्हें विश्वामित्री अन्न कहा जाता है। सालों साल बिना घुने बिना सड़े ये रहे आते हैं। कौदौ ने न जाने कितने अकालों से उबारा।
हमारी ग्यानपरंपरा में हर संकट की काट है। बस जीवन के यथार्थ को समझने की कोशिश भर करिए। करोना महामारी ने जीवन का यथार्थ बता दिया। मीडियावी युग में दुनिया को और भी डरा के रख दिया है।
पहले प्लेग और हैजा जैसी बीमारियों से शहर के शहर श्मशान में बदल जाते थे। आज के विकासशाली युग में मनुष्य की जिंदगी की कीमत भी बढ़ गई है। भौतिकता में बिंधे हुए मनुष्य को सबकुछ खो जाने का डर है। इस के चलते वह ज्यदा डरा है..।
तुलसीदास कह गए-
धीरज,धरम,मित्र अरु नारी। आपतकाल परिखेहु चारी।
खुद की परिजनों, परजनों की परख के लिए जिंदगी में आपत्ति का आना जरूरी है। जिंदगी की यह महत्वपूर्ण परीक्षा है। हर किसी के पास इसका एक दक्षता प्रमाणपत्र होना चाहिए।
इसकी पैरवी तुलसी के सखा रहीमदास कर गए हैं-
रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय।
हित-अनहित या जगत में, जान परत सब कोय।।
विपत्ति के समय यह समाज कैसा संव्यवहार करता है जानना जरूरी है। परीक्षाएं दो होती हैं एक सैद्धांतिक दूसरी व्यवहारिक। विपत्तिकाल मनुष्य की व्यवहारिक परीक्षा है। इस परीक्षा में परिजन, परजन, महाजन, सुधीजन, भद्रजन, सबकी परीक्षा हो जाती है। करोना ने यह समय दिया है। इसने यह बताया कि सब रिश्तों से ऊपर दर्द का रिश्ता होता है। ये दर्द का रिश्ता समूची मानवता को अपनी डोर में बाँध लेता है।
यह परीक्षा की घड़ी है। ऐसी ही परीक्षाओं में उत्तीर्ण होकर रामचंद्र, हरीशचन्द्र, रंतिदेव, उसीनर, दधीचि, राजा नल, विक्रमादित्य आदि महापुरुष में कालजयी,यशस्वी हुए हैं।
विपत्ति के समय धैर्य,संयम और विवेक सबसे बड़ा सहारा है। यही सहारा हमें इस आसन्न संकट से पार लगाएगा। ध्यान रहे ईश्वर उसी की मदद करता है जिनमें दूसरों के लिए मदद की भावना रहती है। ईश्वर और अपने आत्मबल पर विश्वास रखें अंततः सब ठीक हो जाएगा..।