पूर्व न्यायाधीशों को लेकर आचार संहिता बननी चाहिए

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रवीन्द्र वाजपेयी

देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई एक बार फिर चर्चाओं के साथ विवाद में हैं। लेकिन उसकी वजह उनका अदालती फैसला न होकर राज्यसभा में उन्हें मनोनीत किया जाना है। राजनीतिक क्षेत्र के अलावा सोशल मीडिया पर भी उनके, मनोनयन पर पक्ष-विपक्ष में टीका-टिप्पणी हो रही है। ये कहा जा रहा है कि राम मन्दिर संबंधी फैसले के पुरस्कार स्वरूप उन्हें ये सौगात दी गई। कुछ लोगों का ये मानना है कि मोदी सरकार का ये कदम दूरगामी सोच की तरफ इशारा करता है। ऐसा करके उसने वर्तमान न्यायाधीशों को ये लालच दे दिया है कि वे सरकार के अनुकूल फैसले देते रहें तो सेवा निवृत्ति के बाद उनका ध्यान रखा जाएगा। और भी अनेक बातें पूर्व न्यायाधीशों को लेकर आचार संहिता बननी चाहिए | samachar-vicharकहीं जा रही हैं। वैसे ये पहला अवसर नहीं है जब न्यायपालिका की सर्वोच्च आसंदी से निवृत्ति के उपरान्त किसी को राजनीतिक सत्ता ने उपकृत किया हो। सबसे बड़ा उदाहरण देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रहे रंगनाथ मिश्र का है जिन्हें कांग्रेस सरकार ने राज्यसभा में भेजा। दिल्ली में सिख दंगों के दौरान हुए नरसंहार में कांग्रेस के कतिपय नेताओं को बेकसूर ठहरा देने वाले आयोग के श्री मिश्र ही मुखिया रहे। दूसरा उदाहरण देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एम एस गिल का था जिन्हें कांगे्रस ने राज्यसभा में भेजने के बाद केन्द्रीय मंत्रीमंडल में राज्य मंत्री भी बनाया। यद्यपि पूर्व न्यायाधीशों और नौकरशाहों को इस तरह से महिमामंडित करने पर आलोचना के स्वर सदैव उठे। ये सुझाव भी आया कि एक निश्चित अवधि तक उन्हें कोई पद स्वीकार नहीं करना चाहिए। न्यायपालिका में भी इस बारे में बुद्धिविलास होता रहा। अभी तक आम तौर से पूर्व न्यायाधीश किसी जांच आयोग, नियामक संस्थाएं, मध्यस्थत्ता ट्रिब्यूनल आदि में नियुक्त होते रहे। लेकिन राज्यसभा में मनोनयन का ये पहला प्रकरण है। फिर भी श्री गोगोई पर जिस तरह के तंज कसे जा रहे हैं उनके पीछे यदि नैतिक और पारदर्शी सोच होती तब उसे सहज रूप में लिया जा सकता था। लेकिन आज उनके विरोध में खड़े अधिकतर लोग वही हैं जो कुछ बरस पहले सर्वोच्च न्यायालय में चार न्यायाधीशों द्वारा की गयी पत्रकारवार्ता में श्री गोगोई के शामिल रहने पर उनके साहस की प्रशंसा करते नहीं थकते थे। उस दौरान तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के बहाने चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने मोदी सरकार पर न्यायिक स्वतंत्रता में दखल देने का आरोप लगाया। उस पत्रकार वार्ता ने पूरे देश में तहलका मचा दिया था। उस समय ऐसा माहौल बना जैसे देश में न्यायपालिका पूरी तरह से सरकार के शिकंजे में कैद होकर रह गयी। उन चार में से तीन तो सेवा निवृत्त हो गए। बचे श्री गोगोई जिनके बारे में ये माना जा रहा था कि कांग्रेसी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण शायद केंद्र सरकार उनसे कनिष्ट किसी को मुख्य न्यायाधीश बनायेगी। अतीत में भी ऐसा हुआ है। पत्रकार वार्ता में उनकी मौजूदगी भी उनकी राह में अवरोधक थी। लेकिन मोदी सरकार ने ऐसा नहीं किया। उनके पद पर आने के बाद ही उनके बारे में सरकार के साथ मिल जाने जैसी चर्चाएं शुरू हो गईं। राम जन्मभूमि के अलावा अनेक ऐसे प्रकरण हुए जिनमें श्री गोगोई द्वारा दिये गए फैसलों को सरकार की तरफदारी समझा गया। अयोध्या विवाद को दैनिक सुनवाई द्वारा उन्होंने जिस तत्परता से निपटाया वह इतिहास बन चुका है। उसके लिए उनकी जबरदस्त तारीफ हुई लेकिन सेकुलर और अवार्ड वापिसी तबके को वह फैसला हजम नहीं हुआ जो उन्होंने अपनी सेवा निवृत्ति के ठीक पहले दिया। लेकिन याद रखने वाली बात येे भी है कि उस पीठ में चार न्यायाधीश और भी थे जिनमें एक मुस्लिम भी था। लेकिन सभी ने एक सा निर्णय दिया जो बड़ी बात थी। बहरहाल श्री गोगोई के पद से हटने के बाद भी उनके ऊपर निशाने साधे जाते रहे। ये भी कहा जाता है कि एक महिला द्वारा उन पर लगाये गये आरोप इसी षडय़ंत्र का हिस्सा थे जिस कारण वे दबाव में रहे। अनेक पूर्व मुख्य न्यायाधीश विभिन्न कारणों से विवादित हुए। कुछ पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगे और जांच भी हुई। भाई भतीजावाद भी न्यायपालिका में जमकर छाया रहता है। भ्रष्टाचार की बात तो खुद न्यायाधीश भी स्वीकार करते हैं। ऐसे में पूर्व मुख्य न्यायाधीश को राज्यसभा में मनोनीत किये जाने पर उठ रहे सवाल अपनी जगह सही हैं। बेहतर तो यही होता कि वे खुद होकर इसके लिए असहमति व्यक्त कर देते। लेकिन अब समय आ गया है जब इस तरह की नियुक्तियों को लेकर नियम या आचार संहिता बनाई जावे। सेवा निवृत्त न्यायाधीश के अनुभव का उपयोग करना बुरा नहीं है लेकिन ऐसा करते समय उसकी निष्पक्षता पर सवाल न उठें ये ध्यान रखना जरूरी है। हालांकि हमारे देश के नेता और न्यायपालिका से जुड़े लोग इस बारे में कितने सहमत होंगे ये कहना मुश्किल है। क्योंकि नैतिकता का ढिंढोरा पीटना और उसका पालन करना दो अलग बातें होकर रह गई हैं। यही वजह है कि श्री गोगोई की आलोचना वही लोग कर रहे हैं जिन्होंने खुद सत्ता में रहते हुए गलत परम्परा शुरू की। और जिनने ये मनोनयन किया वे उस समय उनका विरोध किया करते थे।