नाक की साख……….

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नाक की साख………. | samachar-vichar
ज़हीर अंसारी
ख्यात साहित्यकार एवं व्यंग्यकार स्व. हरिशंकर परसाई साहब ने ‘दो नाक वाले लोग’ की मीमांसा बड़े ही रोचक और व्यंग्यात्मक ढंग से की थी। ‘दो नाक वाले लोग’ अपना पूरा जीवन कैसे गिरगिट की तरह रंग बदलकर चलते हैं और ऐसे लोग अपनी ‘नाक’ बचाने के लिए किसी भी हद चले जाते हैं। ‘नाक की साख’ पर शायद ही कभी किसी ने परसाई जैसा लिखा हो।
दशकों बाद फिर ‘नाक की साख’ बचाने की नौबत आ गई है। दुनिया में हमारी ‘नाक’ कटती रहें, मुल्क में सड़ती रहें, अब इससे बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता है। वजह साफ़ है कि बहुतायत लोगों ने अपने मुख पर ‘नाज़ी नाक’ लगवा ली है। इस नाक की ख़ासियत है कि ये रिमोट संचालित होती है। जिस तरह रिमोट के ज़रिए आवाज़ कम-ज़्यादा होती है उसी तरह इनकी नाक संचालित होती है। आवश्यकतानुसार ’नाक सूंघ’ क्षमता तय की जाती है। इस नाक की एक और विशेषता है कि इन्हें अपने बदबू मारते हैं मगर विदेशी महकते हैं। ऐसे लोग महकने वालों लोगों की नाक का ख़ास ख़्याल रखते हैं। कहीं इनकी नाक में भारतीय दुर्गन्ध न भर जाएँ वरना ‘प्लांटेड नाज़ी नाक’ कट जाएगी।
अब देखिए न, जहांपनाह और अपनी बेगम के साथ तशरीफ़ ला रहे हैं। ये दोनों बुरा देख न सके और बदबू सूंघ न सकें इसके लिए माक़ूल इंतज़ाम किया जा रहा है। गुजरात में जहांपनाह गंदी बस्ती और गंदे लोग देख न सके इसके लिए लम्बी-ऊँची दीवार बना दी गई ताकि उन्हें सबकुछ चकाचक नज़र आये। इसी तरह ताजमहल के पिछवाड़े बहने वाली यमुना नदी जो किसी ज़माने में कलकल बहती थी अब दलदलनुमा हो दुर्गन्ध से भर गई है, की ‘स्मेल’ जहांपनाह दम्पत्ति की नाक को प्रदूषित न कर दे इसका विशेष ध्यान देते हुए सैकड़ों किलोमीटर दूर हरिद्वार से गंगाजल लाया जा रहा है। तक़रीबन 500 क्यूसेक गंगा का पानी नदी फिर नहर के ज़रिए मुज़फ़्फ़रनगर, मेरठ, बुलंदशहर, गौतमबुद्ध नगर फिर मथुरा के रास्ते आगरे में यमुना में छोड़ा जाएगा। इस तरह से विश्व की सबसे ताक़तवर नाक को दुर्गन्ध से बचाया जाएगा।
इस तरह लोग नाक बचाने के किए तरह-तरह के प्रायोजन करते हैं। वो हमारे मेहमान-ए-ख़ास हैं। उनकी नाक का ख़्याल रखना लाज़िमी है। अपनी नाक बचाने के लिए उनकी नाक में ख़ुश्बू डालना ही चाहिए।
मगर इससे होगा क्या.. क्या हम सुधार जाएँगे.. क्या हम ये संकल्प लेंगे कि आज के बाद हम अपनी ‘नाक की साख’ रखने के लिए एकजुट होकर भारत के नवनिर्माण में जुट जाएँगे। यदि ये संकल्प हम लेते हैं तो वाक़ई हम बहुत जल्द विश्वगुरु होंगे और अपनी ‘मूल नाक’ पर गर्व कर सकेंगे।