कंबाला: भैंसों के प्रति नजरिया बदलने पर विवश करता विश्व रिकाॅर्ड…!

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अजय बोकिल
ये खबर इसलिए महत्वपूर्ण तो थी ही कि कर्नाटक के एक किसान ने ग्रामीण खेल में दुनिया के सबसे तेज धावक उसेन बोल्ट का रिकाॅर्ड तोड़ा बल्कि इसलिए भी दिलचस्प थी कि यह रिकाॅर्ड उसने भैंसों के साथ दौड़ कर तोड़ा। जो जानकारी सामने आई उसके दावे की पुष्टि होना बाकी है, लेकिन जो हुआ, उसने महान उसेन को भी हैरत में जरूर डाल दिया होगा। जो जानकारी सामने आई है, उसके मुताबिक कर्नाटक के किसान श्रीनिवास ने राज्य के दक्षिण कन्नडा जिले के के मूडाबिद्री गांव में 2 फरवरी को आयोजित ‘कंबाला’ ( भैंस दौड़) में इतनी तेज दौड़ लगाई कि वह उसेन बोल्ट को भी पीछे छोड़ गया। सौ मीटर रिले दौड़ में उसेन का रिकाॅर्ड 9:58 सेकंड का है। श्रीनिवास ने यही दौड़ 9:55 सेकंड में पूरी कर के दिखा दी और वह भी भैंसो के साथ। अगर यह दावा सही है तो यकीनन विश्व रिकाॅर्ड है।
हालांकि ‘कंबाला’ की सीधे तौर पर तुलना एथलेटिक्स में होने वाली 100 मीटर रिले रेस से नहीं की जा सकती। क्योंकि दोनो के अलग-अलग कारण, तकनीक और तकाजे हैं। फर्राटा दौड़ एथलेटिक्स का वैश्विक स्तर पर मान्य प्रकार है और यह मनुष्य के दौड़ने की अधिकतम रफ्तार का पैमाना भी है। जबकि कंबाला दक्षिण कर्नाटक का एक लोकप्रिय ग्रामीण खेल है। इस क्षेत्र में कंबाला करीब 1 हजार सालों से होता रहा है। शुरू में इसका आयोजन राजाअों, जमींदारों के मनोरंजन के लिए होता था। आजकल यह स्पर्द्धा के रूप में होता है। जीतने वाले को इनाम मिलता है। लिहाजा लोग इसकी काफी मेहनत से तैयारी करते हैं। कंबाला वास्तव में भैंसों की जोड़ी के साथ की जाने वाली दौड़ है। यह धान के पानी भरे खेत में होती है। इसका एक उद्देश्य भगवान मंजूनाथ ( शिव का स्थानीय अवतार) के प्रति आभार व्यक्त करना और अच्छी फसल की खुशियां मनाना होता है। यह दौड़ अमूमन नवंबर से मार्च के बीच होती है। इसका आयोजन स्थानीय कंबाला समितियां करती हैं। राज्य में करीब आधा सैंकड़ा स्थानो पर यह आयोजित होती है।
इस बार कंबाला में किसान श्रीनिवास अपने प्रतिद्वंबद्वियों को पीछे छो़ड़ने की इच्छा से इतना तेज दौड़ा ‍कि उसे पता ही नहीं चला कि वह बोल्ट को पीछे छोड़ चुका है। जो रिपोर्ट हुआ है, उसके मुताबिक गौड़ा ने कुल 143 मीटर लंबी रेस के पहले 100 मीटर में अविश्वसनीय गति से दौड़ लगाई। यह अंतर उसने 9.55 सेकंड में और पूरी दौड़ 13.62 सेकंड में पूरा कर डाला। श्रीनिवास इसके पहले भी कई कंबाला रेस जीत चुका है। श्रीनिवास की यह उपलब्धि इसलिए भी अनूठी है क्योंकि फर्राटा धावक उसने बोल्ट तो जमीन ( ट्रैक) पर दौड़ने के आदी हैं, लेकिन श्रीनिवास ने यह दौड़ पानी में और वो भी दो भैंसों के साथ पूरी कर दिखाई। इस दृष्टि से श्रीनिवास का यह रिकाॅर्ड अनोखा है। कंबाला रेस इतनी आसान भी नहीं होती। इसमें दौड़ने वाली भैंस जोड़ी की गर्दन पर लकड़ी के हल जैसा एक उपकरण मजबूत रस्सी से बंधा होता है। हल के एक सिरे पर धावक का एक पैर रखा होता है। धावक चाबुक मारकर भैंसों को और तेजी से दौड़ने के लिए प्रेरित करता है। कंबाला देखने के लिए लाखों की भीड़ जुटती है। हालांकि पशु अधिकार समर्थक इसे भैंसों के साथ अत्याचार के रूप में देखते हैं। उनके विरोध के चलते सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में तमिलनाडु के जल्लीकट्टू के साथ कंबाला पर भी रोक लगा दी थी। लेकिन व्यवहार में इसका कोई खास असर पर नहीं हुआ। कंबाला आज भी लोकरंजन का महत्वपूर्ण जरिया माना जाता है।
कंबाला पशु अधिकारों का उल्लंघन है या नहीं, भैंसों को इस तरह दौड़ने पर मजबूर किया जाना चाहिए अथवा नहीं, इन बातों को अलग रखें तो यह वो खेल है, जो भैंसों को एक अलग गरिमा बख्शता है। उनकी क्षमताअो के नए द्वार खोलता है। कंबाला रेस जीतकर भैंसे कितनी खुश होती हैं और इस खुशी का इजहार वो कैसे करती हैं, यह तो पता नहीं, लेकिन वो इतना तो साबित कर ही देती हैं कि तकरीबन हर मामले में वो गायों के बराबर होने के बाद भी उन्हें मानव समाज गंभीरता से क्यों नहीं लेता ? क्यों उनकी रेस अक्ल से कराई जाती है। क्यों उन्हें ठस और हठी ठहराया जाता है? जबकि वे दूध भी गायों से ज्यादा देती हैं। ताकत में भी वो गायों को चुनौती दे सकती हैं। और फिर कंबाला के लिए काली चक भैंसों को खासतौर पर तैयार किया जाता है। उन्हे खिलाया-पिलाया जाता है। मालिश की जाती है। सजाया जाता है। भैंसों की हरदम कोशिश होती है कि उन्हें केवल दूध देने वाला कुरूप और निर्बुद्ध जानवर न माना जाए। चूंकि कंबाला में मुकाबला भैंसों के बीच ही होता है, इसलिए वहां गायों जैसी आभिजात्यता का कोई पूर्वाग्रह नहीं होता। गायें वैसे भी ऐसी किसी रेस का हिस्सा कभी नहीं बनतीं। यह काम उन्होंने बैलों के लिए छोड़ रखा है। वे वात्सल्य और देवत्व का बाना अोढ़ कर अलग दुनिया में रहती हैं। उनके लिए गोशालाएं होती हैं, लेकिन भैसों की किस्मत में तबेले ही होते हैं। बराबरी के तमाम दावों के बावजूद भैंसे सिर्फ अपने रंग रूप और बौद्धिक क्षमताअोंके कारण गायों से उन्नीस करार दे दी जाती हैं।
इस अर्थ में कंबाला भैंसों की सामाजिक मान्यता और गौरव को बढ़ाने वाला खेल है। जिसके भी दिमाग में सबसे पहले यह विचार आया होगा, वह जरूर भैंस हितैषी रहा होगा। क्योंकि ज्यादा दूध, ज्यादा शक्ति और न्यूनतम अपेक्षाएं रखने वाली भैंसों को जानबूझकर देवत्व से दूर रखा गया। उन्हें पुराख्यानों में भी अपेक्षित जगह कभी नहीं मिली। कहते हैं आर्यो को भैंस की उपयोगिता काफी बाद में समझ आई, इसके पहले गायें उन तमाम क्षे‍त्रों में अपना आरक्षण करा चुकी थीं, जहां से देवत्व का रास्ता शुरू होता है। यूं सांत्वना के तौर पर भैंसा यमराज का वाहन जरूर है, लेकिन उसकी हैसियत भी संविदा नियुक्ति वाले रिटायर्ड ड्रायवर जैसी है। उल्टे यम के साथ रहने से भैंसों के प्रति एक भय का एक सहज भाव और जुड़ गया।
बहरहाल श्रीनिवास गौडा ने जो कर दिखाया, उसे वैश्विक मान्यता मिलेगी या नहीं, कहना मुश्किल है। फिर भी उसने यह तो साबित कर ही ‍ कि भैंसों के साथ दौड़कर भी रिकाॅर्ड बनाया जा सकता है। अर्थात भैंसे केवल उपभोग की वस्तु नहीं हैं, वो जीवटता वाली जीव भी हैं। मौका और दस्तूर हो तो वो दौड़ तो क्या दुनिया का कोई भी रिकाॅर्ड तोड़ सकती हैं। बस उन्हें सही मार्ग दर्शन और ट्रेनिंग चाहिए। भैंसों के काले रंग, भावहीन आंखों और पगुराने पर न जाएं। वक्त पड़े तो ये पगुराना गायों के रंभाने पर बीसा साबित हो सकता है।