बरेली: झुमके में चस्पां पहचान से झूमता शहर..

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अजय बोकिल
जो झुमका फिल्मी डांस के दौरान खो गया था, वो 54 साल बाद हकीकत में मिल गया है। वो झुमका जिसका बरेली से सिर्फ फिल्मी नाता था, अब बरेली की पहचान बनने जा रहा है। यह अपने आप में अनोखा उदाहरण है। दरअसल बरेली देश के उन बिरले शहरों में है, जिन पर एक पहचान चस्पां कर दी गई और शहर ने भी उसी पहचान को अपनी असल पहचान मानना शुरू कर दिया। वरना झुमके और बरेली का रिश्ता सिर्फ इतना ही रहा है कि वहां भी ज्वेलरी की दुकानों में वैसे ही झुमके मिलते हैं, जैसे किसी बंबई बाजार में। यही वो झुमका था, ‍ गुमने के बहाने अपने जमाने की खूबसूरत और शोख अदाकारा साधना ने चौराहे पर खूब ठुमके लगाए थे। बरेली का यह झुमका कुछ और फिल्मी गीतों में भी गुमा। इससे संदेश यह गया कि बरेली में झुमके बनते हों या न बनते हों, गुमते जरूर है। इस ‘झुमका आईडेंटिटी’ का आलम यह है कि इसने पांच सौ बरस पुराने इस शहर की पारंपरिक पहचानों को भी हाशिए पर ढकेल दिया और लोग झुमके की वर्च्युअल पहचान को ही सही मानने लगे। हालांकि यह आज भी रहस्य है कि 1966 में रिलीज़ हुई सुनील दत्त, साधना अभिनीत हिट फिल्म ‘मेरा साया’ के नायाब गीत ‘‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में’ के बोल लिखते समय मशहूर गीतकार राजा मेहदी अली खां ने बरेली नाम ही क्यों चुना? क्या यह सिर्फ तुक बिठाने के लिए था या फिर झुमके बरेली की जान रहे हैं? बरेली का इतिहास देखें तो उसके साथ कई तमाम दूसरी चीजें भी शिद्दत से जुड़ी हुई हैं, लेकिन इस में झुमकों का जिक्र कहीं नहीं मिलता।
झुमका गिरने से पहले बरेली की पहचान तो बांस रहा है। क्योंकि वहां बांस (केन) का फर्नीचर बहुत बड़े पैमाने पर और अच्छी क्वालिटी का बनता है। इसकी महत्ता इसी से समझे कि हिंदी में ‘उल्टे बांस बरेली जाएं’ मुहावरा वजूद में आया। बरेली शहर की स्थापना राजपूत राजा जगतसिंह कठेरिया उर्फ बासदेव ने 1537 में की थी। लेकिन शहर का बरेली नाम राजा के दो बेटों वसलदेव और बरालदेव को मिलाकर बना। राजपूतों के बाद बरेली पर मुगलों और अफगानों ने राज किया। बांस के अलावा बरेली अपने सुरमे और पतंग के मांझे के लिए भी मशहूर है। लोग इसे ‘मांझा सिटी’ नाम से भी पुकारते हैं। आज 10 लाख की आबादी वाला उत्तर प्रदेश का यह शहर देश की राजधानी‍ दिल्ली की काउंटर मैग्नेट सिटी का भी हिस्सा है।
बावजूद इन सबके बरेली के साथ झुमका जो चस्पां हुआ तो आज तक जारी है। यह फिल्म वालों की करामात या गीतकार के शब्दों की ताकत कहिए कि ‘मेरा साया’ के कुछ समय बाद आई फिल्म ‘किस्मत’ के एक प्रसिद्ध गाने ‘कजरा मुहब्बत वाला’ का एक अंतरा ‘झुमका बरेली वाला’ पर था। यही नहीं, हाल में आई एक और फिल्म ‘ एसपी चौहान’ में फिर एक गाना ‘ झुमका बरेली वाला’ शामिल किया गया। इससे यही सिद्ध हुआ कि बरेली वाले खुद को जो भी मानें, दुिनया की निगाह में ये शहर झुमकों का मायका है और झुमके दुनिया भर में स्त्री अलंकार का जरूरी और खूबसूरत हिस्सा हैं। बरेली में कोई झुमका ईजाद हुआ या नहीं, पता नहीं, लेकिन बाजार में झुमके कई तरह के मिलते हैं। मसलन गोल्ड झुमका, साउथ इंडियन झुमका, सिल्वर झुमका, मीनाकारी झुमका, हूप झुमका, क्रिस्टल झुमका, पर्ल झुमका, कश्मीरी झुमका आदि। सोने से लेकर आर्टिफिशियल ज्वेलरी तक झुमकों की लंबी रेंज है। झुमके, झुमके इसीलिए कहलाते हैं कि यह कानों में लटककर झूमते रहते हैं। मूल रूप से झुमके मंदिर अलंकारों का हिस्सा हैं। इसकी शुरूआत भरतनाट्यम के लिए किए जाने वाले श्रृंगार से मानी जाती है। यह ऐसा गहना है, जो पुल्लिंग के साथ स्त्रीलिंगी भी है। यानी झुमका है तो झुमकी भी है। ये कई स्तरों वाले भी होते हैं, जैसे कि तीन तल्ले वाला झुमका, वगैरह।
बहरहाल यह हकीकत है कि बरेली ने अपना नया चेहरा झुमके में खोज लिया है। भले ही इसके पीछे मंशा पर्यटन को बढ़ावा देने की हो। शायद इसीलिए बरेली विकास प्राधिकरण (बीडीए) ने शहर के परसाखेड़ा क्षेत्र में एक झुमका तिराहा बना डाला है, जहां 14 फीट ऊंचा और 270 किलो वजनी एक झुमका लटकाया गया है। ताकि इसे देखकर लोग समझ जाएं कि वे बरेली में हैं। उस बरेली में, जहां झुमके गिरते हैं और कभी मिल भी जाते हैं। इसके पीछे बीडीए की वाइस चेयरपर्सन दिव्या मित्तल का कहना है कि जब उनकी पोस्टिंग बरेली में हुई तो परिचित बरेली को ‘झुमका गिरा रे’ से कनेक्ट करते थे और पूछते थे कि आखिर यह (फिल्मी) झुमका आखिर गिरा कहां था? इसके बाद हमने सोचा कि बरेली में कोई ‘झुमका पाइंट’ तो होना ही चाहिए। इस नवाचारी काम में बीडीए की आर्थिक मदद एक बड़े व्यवसायी केशव अग्रवाल ने सीएसआर के तहत की। इस विशाल झुमके को बनाने में पीतल और तांबे का इस्तेमाल किया गया है। यह झुमका बनाने में आठ महीने और 20 लाख खर्च हुए। यह सही मायने में लखटकिया झुमका है।
लेकिन अफसोस कि इस झुमके पर भी सियासत शुरू हो गई है। राज्य में सत्तारूढ़ बीजेपी के स्थानीय विधायक डाॅ. श्याम बिहारी लाल ने ‘झुमका पाॅलिटक्स’ के तहत विरोधी मोर्चा खोल दिया है। विधायक श्याम‍ बिहारी का मानना है कि झुमके को बरेली की पहचान बताना इस गौरवशाली शहर का अपमान है। यह सांस्कृतिक दिवालियापन है। विधायक ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा कि अगर फिल्मी पहचान में शहर का अक्स देखना है तो फिर ‘बर्फी चौराहा’ भी बनाना होगा, क्योंकि एक फिल्म ‘बरेली की बर्फी’ में भी बरेली का जिक्र है। शहर की पहचान स्थापित करने के और भी तरीके थे। क्योंकि बरेली उन शहरों में शुमार है, जिसने 1857 की पहली जंगे आजादी में अहम भूमिका निभाई थी। श्याम बिहारी के अलावा कुछ और लोग भी बरेली को ‘झुमका सिटी’ बनाने का विरोध कर रहे हैं। यह स्थानीय राजनीति का ‍हिस्सा ज्यादा लगता है। लेकिन यह सच है कि फिल्मों में बंबई ( मुंबई) और दिल्ली के बाद अगर किसी शहर को इतना महत्व मिला है तो वो है बरेली। उस पर फिल्मी गीत लिखे गए। उसकी तासीर को झुमके की आभा और बर्फी की ‍ से जोड़ा गया। वह भी तब, जब किसी बरेलीवासी ने ऐसी मांग शायद ही की हो।
वास्तव में यह शायराना फितरत और कल्पनाशीलता का ही कमाल है कि कोई शहर किसी ऐसी पहचान से इस दर्जा जुड़ गया कि कोई चाह कर उससे उसे जुदा नहीं कर सकता। वरना झुमके और बर्फी कोई ऐसी दुर्लभ चीजें नहीं हैं, जिस पर बरेली का पेटेंट हो। बावजूद इसके बांस से झुमके तक का यह सफर बेहद रोमांटिक है। इस ( काल्पनिक ही सही) आनंद पर बरेली का जो हक कायम हुआ है, उसकी दूसरी मिसाल मुश्किल है। और बरेली ही क्यों, झुमके तो हर महिला को लुभाते हैं। उनका गिर कर खो जाना, जिस्म से जान हिराने जैसा है। किसी सुंदरी के कानो में टंका यह जेवर अपनी लटकन और दोलन के साथ चुपचाप स्त्री मन की थाह लेता भी रहता है और उसके मूड को भी प्रतिबिम्बित करता रहता है। दोनो कानो में झुमके का झूलते रहना सौंदर्य के सुरक्षित रहने की जमानत भी है। किसी शायर ने ठीक ही कहा है-
जुल्फें सिर्फ दायीं तरफ मत रखा करो
बायां झुमका खुद को महफूज नहीं समझता..