वर्दीधारियों पर भारी सफेदपोश साहब

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रवीन्द्र वाजपेयी

मप्र में आईपीएस और आईएएस लॉबी के बीच चल रही रस्साखींच में एक बार फिर बाजी आईएएस के हाथ जाती दिख रही है। बीते दिनों राजगढ़ जिले की महिला कलेक्टर ने एक पुलिस कर्मी को चांटा रसीद कर दिया था। जिसकी डीएसपी स्तर के अधिकारी ने जांच की और कलेक्टर को दोषी ठहरा दिया। आईएएस लॉबी को खाकी वर्दी वालों का ये रवैया पसंद नहीं आया और उन्होंने अपनी चिर परिचित शैली में जाल बट्टा फैलाया जिसका नतीजा प्रदेश के डीजीपी वीके सिंह को हटाये जाने जाने की खबर के रूप में सामने आ गया। इस सम्बन्ध में अंतिम निर्णय आज कल में हो जाएगा। जिन राजेन्द्र कुमार का नाम श्री सिंह के उत्तराधिकारी के तौर पर चल रहा है वे इंदौर के चर्चित हनी ट्रैप मामले के लिए गठित एसआईटी के प्रमुख हैं। इसलिए उन्हें डीजीपी बनाने से पहले उच्च न्यायालय से अनापत्ति लेनी पड़ेगी। कलेक्टर द्वारा एक पुलिसकर्मी को सरे आम थप्पड़ मारे जाने पर कमलनाथ सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री तक ने ऐतराज जताया था। आईएएस लॉबी को इस बात की खुन्नस है कि कलेक्टर की जांच डीएसपी ने की और उसकी रिपोर्ट डीजीपी ने मंजूर करते हुए कलेक्टर के विरुद्द्ध कार्रवाई हेतु पत्र लिख दिया। आईएएस लॉबी चूंकि सरकार के ज्यादा मुंह लगी होती है इसलिए बताया जाता है मुख्यमंत्री भी डीजीपी से खुन्नस खा गए। श्री सिंह द्वारा बिना मुख्य सचिव से चर्चा किये कलेक्टर के विरुद्ध कार्रवाई किये जाने वाले पत्र को आईएएस बिरादरी ने अपनी शान में गुस्ताखी माना और अंतत: सफेदपोश नौकरशाही एक बार फिर वर्दीधारियों पर भारी साबित होती दिख रही है। प्रशासनिक ढांचे के भीतर चल रहे इस शीतयुद्ध से कमलनाथ सरकार की प्रशासनिक कमजोरी उजागर हो गई है। एक साल की सत्ता में दूसरी बार डीजीपी का बदला जाना ये दर्शाता है कि मुख्यमंत्री का अपने अमले पर या तो सही नियंत्रण नहीं है या फिर वे आईएएस और आईपीएस के बीच समन्वय स्थापित नहीं कर पा रहे। प्रशासन के इन दो धड़ों के बीच अहं की जंग नई नहीं है। पुलिस विभाग में कमिश्नर प्रणाली लागू होने की मांग पुरानी है। इसके लागू होने पर पुलिस विभाग काफी हद तक आईएएस के प्रभुत्व से मुक्त हो जाता है। किन्तु आईएएस तबका इसमें अड़ंगा लगाया करता है। जिस भी पुलिस अधिकारी ने सफेदपोश नौकरशाहों की सर्वोच्चता को चुनौती देने की हिमाकत की उसकी हालत वीके सिंह जैसी कर दी गयी। संदर्भित प्रकरण में गलती किस तबके की है ये कह पाना कठिन है लेकिन बीते कुछ समय से पुलिस विभाग में तबादले एवं महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को लेकर जिस तरह से चूहा बिल्ली का खेल चल रहा है उससे पुलिस विभाग खुद को अपमानित महसूस करने लगा है। हनी ट्रैप काण्ड के जाँच में भी जिस प्रकार ताबड़तोड़ तरीके से अधिकारी बदले गये उससे भी प्रशासन से जुड़ी दोनों लॉबियों के बीच की टकराहट उजागर हो गयी थी। ताजा प्रकरण से एक बार फिर ये बात सामने आ गयी है कि कमलनाथ भी आईएएस के चक्रव्यूह में फंसकर रह गये हैं। वीके सिंह या पुलिस महकमे के अन्य अधिकारियों को पूरी तरह सक्षम या ईमानदार होने का प्रमाणपत्र देना तो अतिशयोक्ति होगी लेकिन ये भी सही है कि आईएएस लॉबी में अभी भी अंग्रेजों के जमाने में नजर आने वाली गोरी चमड़ी वाली नस्लीय श्रेष्ठता का अहंकार है जिसके आगे वे बाकी सभी को तुच्छ और हेय समझते हैं। वैसे दूध के धुले तो वर्दीधारी पुलिस वाले भी कतई नहीं हैं और जनता को खून के आंसू रुलाने में इन दोनों में से किसी को भी कम नहीं कहा जा सकता लेकिन सरकार में बैठे चुने हुए नेताओं में प्रशासनिक क्षमता यदि हो तो फिर आईएएस और आईपीएस दोनों की बीच समन्वय कायम रखते हुए सरकार का सुचारू संचालन संभव होता है। बीते एक साल की समीक्षा की जावे तो कमलनाथ अपने प्रशासनिक ढांचे में चूंकि स्थायित्व नहीं ला सके इसलिए उसमें कसावट का पूरी तरह अभाव है। नई सरकार आने के बाद सरकारी अमले का स्थानान्तरण तो साधारण प्रक्रिया है लेकिन इसका निरंतर जारी रहना ये दर्शाता है कि सरकार अपनी दिशा ही तय नहीं कर पा रही। मप्र में आईएएस और आईपीएस लॉबी के बीच ताजा जंग में कौन विजेता बनकर निकलेगा ये उतना मायने नहीं रखता जितना ये कि प्रशासन के दोनों पहियों के बीच का तालमेल बिगडऩे से प्रदेश की कानून और प्रशासनिक व्यवस्था चौपट हो सकती है जो पहले से ही बेहद खस्ता स्थिति में है।