आम बजट, सत्यनारायण की कथा व एलआईसी का खत्म होता बीमा…

0
166

अजय बोकिल
यूं लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के कुलदीपक पूर्व मंत्री तेजप्रताप यादव को कोई गंभीरता से नहीं लेता, लेकिन कल आम बजट पर तेजप्रताप की प्रतिक्रिया सबसे हटकर थी। तेजप्रताप का कहना था कि इस बजट से ज्यादा अच्छी तो भगवान सत्यनारायण की व्रत कथा है, जिसे सुनकर मन को संतुष्टि और पुण्य प्राप्ति तो होती है। इस बजट में तो कुछ भी हाथ नहीं आया। केन्द्रीय वित्त मंत्री ‍ सीतारमन ने वर्ष 2020-21 का जो आम बजट पेश किया, उसे कैसे, कितना और क्यों समझा जाए, इस पर चर्चाएं अभी जारी हैं। यूं भी सरकार के बजट को समझना सागर में मोती खोजने जैसा है। फिर भी कल के मेराथन बजट से आम हिंदुस्तानी के जो पल्ले पड़ा, वो मुख्य2 रूप से तीन बातें थीं। पहला तो 59 पेज ( बेबसाइट पर अपलोड बजट के मुताबिक) के बजट भाषण को पढ़ने में मंत्री सीतारमन को 2 घंटे 43 मिनट का वक्त लगना और इसके बाद भी पूरा भाषण न पढ़ पाना। दूसरे, इनकम टैक्स छूट की भूलभुलैया और तीसरा, खुद एलआईसी का ‘बीमा’ खत्म होने का ऐलान। यानी एलआईसी की अपनी जिंदगी कितने दिन की है और ‘रिस्क’ होने पर उसका क्या होगा, इस पर भारतीय मजदूर संघ समेत सब को सोचना पड़ रहा है।
हर बजट अमूमन वैसा ही होता है, जिस तरह हाथी के हर अंग को लोग अपनी तरह से छूते और महसूसते हैं। किसी भी बजट पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं तो पहले से तय होती हैं। मसलन सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया अपने हर बजट को महान, क्रांतिकारी, विकासोन्मुखी और सर्वकल्याणकारी बताने की होती है तो विपक्ष हर बजट को दिशाहीन, निराशाजनक और दृष्टिविहीन बताता है। ऐसे में बजट को किस चश्मे से देखा जाए, यह समझना मुश्किल होता है। तीसरा कोण सेंसेक्स का है, अर्थात स्टाॅक मार्केट का ‘सांड’ बजट को सूंघकर फुफकारेगा या मरियल बैल की माफिक ऊंघने लगेगा। चौथा दंगल उन अर्थशास्त्रियों का होता है, जो कभी किसी मुद्दे पर एकमत नहीं होते। अमूमन जिस भाषा और शब्दावली में वो बजट की व्याख्या कर रहे होते हैं, उससे इतना ही सबक मिलता है कि बजट समझने में वक्त जाया करने से बेहतर है कुछ काम-धंधे की बात की जाए। मजे की बात यह है कि बजट जिनके लिए बनाया जाता है, जिसके कल्याण के दावे किए जाते हैं, वही बजट में बजरबट्टू की माफिक हाशिए पर पड़ा होता है। इक्का-दुक्का टीवी चैनल वाले उससे बजट पर तत्काल राय लेने निकल पड़ते हैं, जबकि खुद उन्हें भी ठीक से पता नहीं होता है कि बजट में वास्तव में है क्या ? प्रस्तुत बजट गरीब के गले का हार है या फिर लाचार की पीठ में खंजर ? बजट का एक और मोहक लेकिन अगम्य तत्व होता है, इसके भारी-भरकम आंकड़े। आम आदमी लाभान्वित होना तो दूर, हजार से ज्यादा के आंकड़े ठीक से पढ़ भी नहीं पाता है, जबकि बजट में करोड़ से कम की बात होती ही नहीं है।
इस बार भी आम बजट को लेकर उत्सुकता कम, आशंका ज्यादा थी। फिर भी बजट आया तो लोगों ने सोचा कि इसमें कुछ तो ऐसा होगा, जो उनकी जिदंगी को थोड़ा ‘लिफ्ट’ करा देगा। वित्त मंत्री सीतारमन के मुताबिक बजट में लोगों के लिए बहुत कुछ है। इसको लेकर भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा का यह तर्क गजब का है कि लोग समझना ही नहीं चाहते तो कोई क्या करे? हालांकि खुद संबित को बजट कितना पल्ले पड़ा, कहना मुश्किल है।
यूं हर बजट देश के आर्थिक विकास का आईना और माली प्रगति का रोड मैप होता है। वह सरकार की आर्थिक सोच और देश की बेहतरी के आर्थिक नियोजन का महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। हर सरकार बजट में तमाम के तरह दावे और योजनाअों का ऐलान करती है। इनमें से कुछ सफल और कुछ असफल होती है। कुछ तो महज खानापूर्ति के लिए होती हैं। इनका मकसद अर्थव्यवस्था को दुरूस्त करना पब्लिक को राजनी‍तिक सलाइन चढ़ाना ज्यादा होता है। सीतारमन के बजट में भी घोषणााअोंऔर विभिन्न क्षेत्रों के राशि आवंटन का ऐसा लंबा चिट्ठा था, जिसे सुनने से ज्यादा दिलचस्पी लोगों की इस बात में थी कि यह खत्म कब होगा?
इसमें संदेह नहीं कि वर्तमान केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने आम बजट बनाने और उसे पेश करने के लिए जी-तोड़ मेहनत की। वे समस्याअोंकी गहराई तक जाने की कोशिश करती हैं, लेकिन उसके चक्रव्यूह से बाहर निकलने का कोई शर्तिया मंत्र उनके पास नहीं है। लोग बजट में ठोस और स्पष्ट घोषणाएं चाहते हैं। वो बजट को निजी अथवा सामूहिक लाभ के तराजू पर तौलते हैं।
इस बजट में भी कुछ अहम बातें थीं। मसलन वित्त मंत्री ने देश की आर्थिक वृद्धि के जो तुलनात्मक आंकड़े दिए, उसका आधार 1950 की 4 फीसदी वृद्धि दर को बनाया गया। ये वो साल था जब भारत पहली बार गणतंत्र बना था। यह कुछ वैसा ही था कि पड़पोते की प्रगति की तुलना परदादा से की जाए। सीतारमन ने कहा कि 1950 के मुकाबले आज मोदी सरकार के कार्यकाल में देश की आर्थिक वृद्धि दर 7.4 फीसदी है। लेकिन वो यह बात आसानी से छुपा गई कि अटलजी की सरकार के समय जीडीपी की वृद्धि दर 8.3 प्रतिशत को छू रही थी। सबसे जादुई छूट दफा इनकम टैक्स में दिखी। यानी है भी और नहीं भी है। प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। यानी छूट चाहिए तो निवेश छोड़ो और निवेश करो तो टैक्स भी भरो। कुछ लोगों को यह पहेली शायद अच्छी भी लगे, लेकिन सरकार यह कैसे भूल गई कि बीमा, मेडिक्लेम, बांड, एजुकेशन लोन, हाउसिंग आदि क्षेत्र में एक बड़ा निवेश लोग ज्यादातर टैक्स छूट के लालच में ही करते हैं और यह पैसा भी अंतत: सरकार की जेब में ही जाता है। यह एक तरह का सकारात्मक प्रलोभन है। जो कहीं भी निवेश की स्थिति में नहीं होते, वो टैक्स देते ही नहीं हैं।
लेकिन जनमानस को सबसे बड़ा झटका जीवन बीमा निगम ( एलआईसी) में सरकारी हिस्सेदारी को बेचने का है। मौन संदेश यह है कि ‘जिंदगी के बाद’ तो छोड़ें अब जीते जी भी इसका साथ मिलना मुश्किल है। इस बात से इंकार नहीं कि घाटे में चल रहे व्यावसायिक उपक्रमों को सरकार सफेद हाथियों की तरह क्यों पाले? लेकिन एलआईसी तो भारी मुनाफा कमाने वाली सरकारी कंपनी है। पिछले साल ही एलआईसी ने 15 हजार करोड़ से ‍अधिक का लाभ कमाया। तो क्या सरकार को मुनाफे से भी एलर्जी हो गई है, जो वो अपने सारे जेवर खुद उतार देना चाहती है?
बेशक सरकार तंग हाली में है। बीते वित्तीय वर्ष में केन्द्र सरकार को बतौर राजस्व ढाई लाख करोड़ रूपए कम मिले। परिणामस्वरूप राज्यों का हिस्सा घटा और उनका हाथ और तंग हो गया। इसका एक बड़ा उदाहरण मप्र है, जहां तनख्वा ह देने के लाले हैं।
यह सही है कि देश चलाने के लिए पैसा तो चाहिए। यह कहां से आए? आर्थिक मुश्किलों का एक कारण एक कारण अंतराष्ट्रीय परिस्थितियां भी हैं। उससे निपटने का एक ही तरीका है कि सही नीितयां बनाकर उस पर दमदारी से अागे बढ़ना। लेकिन इस बजट में वैसा कोई जोश या संकल्पबद्धता अभी तक तो नहीं दिखी है, सिवाय वित्त मंत्री का गला सूखने के। उधर बाजार भी बजट के बाद डिप्रेशन में चला गया। हालांकि मंत्री पीयूष गोयल ने इसे बाजार का ‘टेक्नीकल करेक्शन’ बताया।
अब मूल बात पर लौटें। तेजप्रताप ने इस बजट से सत्यनारायण की कथा को बेहतर क्यों बताया, यह तो वही जानें। तेजप्रताप ने सत्यनारायण की कथा भी ठीक से पढ़ी या सुनी है कि नहीं पता नहीं। लेकिन श्रद्धालुअों की अटल मान्यता है की सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने से मनौतियां पूरी होती हैं। बस भगवान पर भरोसा रखो। वैसे बजट भाषण और सत्यनारायण की कथा की आपस में कोई तुलना नहीं है, सिवाय अटल विश्वास के। बस, सरकार की बातों और नीयत पर भरोसा रखिए। ऐसा कुछ न पूछिए कि जिससे विकास व्रत में व्यवधान हो।