एनबीटी में फौजी: लेखक बिरादरी पर पाठकों की जीत का परचम…!

0
83

अजय बोकिल

देश की सबसे बड़ी सरकारी पुस्तक प्रकाशन संस्था नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) जिसका हिंदी नाम राष्ट्रीय पुस्तक न्यास है, में अहम पदों पर नियुक्तियां वैचारिक आग्रह-दुराग्रहों के कारण तो चर्चा में रही हैं, लेकिन यह पहली बार है जब इस संस्था में निदेशक पद पर किसी फौजी अधिकारी की प्रति नियुक्ति की गई है। विचारधारा से परे लगभग पूरी लेखक व पुस्तक प्रेमी बिरादरी में इस फैसले को लेकर हैरानी यह सोचकर झलकी कि इस सांस्कृतिक संस्था का संचालन किसी प्रशिक्षित सैनिक के हाथ में देने के पीछे सरकार का क्या नेक उद्देश्य रहा होगा ? क्या देश में वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध लेखकों का टोटा पड़ गया है या फिर लिखने पढ़ने वालों से सम्बन्धित इस संस्था को ‘ठीक’ करने की जरूरत शीर्ष स्तर पर समझी गई। वैसे भारतीय फौजियों का प्रशिक्षण इतना कठिन और वैविध्यपूर्ण होता है कि वो हर जिम्मेदारी निभाने में सक्षम होते हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट में भी बुनियादी तौर पर मैनेजमेंट का ही काम है, इसीलिए केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने थल सेना के लेफ्टि नेंट कर्नल युवराज मलिक को एनबीटी के निेदेशक पद की कमान सौंपने का अभूतपूर्व निर्णय लिया होगा। लेकिन इस फैसले का रेखांकित करने वाला पहलू यह है कि एनबीटी के 63 साल के इतिहास में संभवत: पहली बार किसी लेखकीय पृष्ठभूमि के बजाए पाठकीय योग्यता रखने वाले व्यक्ति को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास का निदेशक बनाया गया है। चूंकि लेखक और पाठक एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, इस मायने में यह लेखकों की (बेचारी) बिरादरी पर पाठक वर्ग की ‘धमाकेदार जीत’ है।
नेशनल बुक ट्रस्ट के नाम से मेरे जैसे कई लोग अपने बचपन से ही परिचित हैं। एनबीटी द्वारा प्रकाशित अनेक रोचक और ज्ञानवर्द्धक किताबें पढ़कर सयाने हुए हैं। एनबीटी की स्थापना पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की पहल पर 1957 में केन्द्रीय शिक्षा ( अब मानव संसाधन) मं‍त्रालय के तहत हुई थी। यह एक स्वायत्त संस्था है। इसके पीछे मकसद यही था कि नौकरशाही से मुक्त यह संस्था आम लोगों के ज्ञान वर्द्धन के लिए के लिए सस्ती दरों किताबें प्रकाशित कर बेचेगी। एनबीटी केवल पुस्तकें प्रकाशित ही नहीं करती, साथ में किताबों और किताबें पढ़ने की वृत्ति को प्रोत्साहित करने, भारतीय किताबों का विदेशो में प्रमोशन, पुस्तक मेलों का आयोजन, लेखकों और प्रकाशकों की मदद, नव लेखकों तथा बाल साहित्य को बढ़ावा देने का काम भी करती है। खासकर एनबीटी द्वारा प्रकाशित सचित्र पुस्तकें तो अत्यंत लोकप्रिय रही हैं। एनबीटी की वर्ष 2017-18 की वार्षिक रिपोर्ट बताती है कि संस्था ने इस अवधि में विभिन्न भारतीय भाषाअोंमें 1165 टाइटल प्रकाशित किए। साढ़े 12 करोड़ की किताबें बेचीं। संस्था महिला लेखकों को भी प्रोत्साहन देती है। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेलों का आयोजन भी करती है। संक्षेप में कहें तो आजादी के बाद पुस्तकों के माध्यम से लोक प्रबोधन में एनबीटी की एक अहम भूमिका रही है।
इसकी मुख्यभ वजह इस पुस्तक संस्था की कमान अमूमन नामी लेखकों के हाथ में रहना है। एनबीटी में अध्य क्ष और निदेशक दो महत्वपूर्ण पद होते हैं। इन पर जाने-माने साहित्यकार लेखकों की नियुक्तियां होती रही हैं। केन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद पूर्व चेयरमैन और जाने-माने मलयाली लेखक सेतु माधवन को बीच कार्यकाल में इस्तीफा देना पड़ा था। उनके स्थान पर आरएसएस की पृष्ठभूमि वाले बलदेव शर्मा अध्यक्ष बनाए गए। लेकिन बलदेव शर्मा भी संघ मुखपत्र पांचजन्य के संपादक रहे थे और पत्रकारिता से उनका पुराना नाता था। उसी दौरान संस्था के निदेशक पद पर असमी लेखिका रीता चौधुरी की नियुक्ति हुई। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा जा चुका था। संस्था में निदेशक का पद अनुबंध के आधार पर अथवा केन्द्र के कर्मचारी की प्रतिनियुक्ति से भरा जाता है। इसी पद पर थल सेना से प्रतिनियुक्ति पर आए ले.कर्नल युवराज मलिक की तैनाती हुई है।
वैसे लेखकों की संस्था में किसी प्रतिष्ठित लेखक फौजी की नियुक्ति हो तो उस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि कई सेनाधिकारी अच्छे लेखक भी रहे हैं। लेखक तो कोई भी हो सकता है और सेना और सैनिक का सम्मान तो जीवन के हर क्षेत्र में होना चाहिए। जब ले. कर्नल युवराज मलिक का नाम मीडिया में आया तब भी यही समझा गया कि सरकार ने उन्हें उनकी लेखकीय योग्यता के मद्देनजर इस प्रतिेष्ठित संस्था में जिम्मेदारी का पद सौंपा होगा। लेकिन केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने मलिक की तारीफ में जो प्रोफाइल जारी किया, वह काबिले गौर है। मसलन मलिक पहले पहले रक्षा मंत्रालय, केन्द्रीय गृह मंत्रालय, जम्मू-कश्मीर में राजभवन, अफ्रीका में संयुक्त राष्ट्र के मिशन और जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, पंजाब तथा राजस्थान में कई प्रशासनिक तथा अभियानों से जुड़े मिशन पर रह चुके हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण ‘योग्यता’ यह बताई गई कि वह ‘बहुत अच्छे पाठक’ हैं और किताबों की दुनिया को लेकर बहुत उत्साहित रहते हैं। विभिन्न सरकारी एजेंसियों में वह 15 साल तक प्रशासनिक कार्य कर चुके हैं। इस सरकारी प्रेस नोट के अंग्रेजी वर्जन में मलिक को ‘व्होरेशियस रीडर’ बताया गया है। इसका‍ हिंदी में अर्थ ‘पेटू पाठक’ होता है। भावार्थ यह कि उनमें पढ़ने की अदम्य इच्छा रही है और आशय यह कि इसी काबिलियत पर उन्हें एनबीटी की कमान दी जा रही है। वैसे एनबीटी के वर्तमान चेयरमैन प्रो. गोविंद प्रसाद शर्मा हैं। मप्र के लिए गौरव की बात यह है कि प्रो. शर्मा मप्र से हैं और उनके लेखकीय अवदान का मुख्य आधार यह है ‍कि वे मप्र हिंदी ग्रंथ अकादेमी के निदेशक रहे हैं।
यकीनन लेखकीय बिरादरी, चाहे वह वामपंथी, दक्षिण पंथी या तृतीय पंथी हो, राष्ट्रवादी हो या साम्यवादी हो, उदारवादी हो अथवा अनुदारवादी हो, लोकशाही समर्थक हो या ठोकशाही समर्थक हो, प्रगति वादी हो या यथास्थिति वादी हो, किसी भी खेमे के हों या फिर किसी भी खेमे के न हों, जुगाडू हों अथवा उपेक्षित हों, सरकारी हों या गैर सरकारी हों, सभी के लिए यह निराशा का कारण हो सकता है कि एक पुस्तक प्रकाशन संस्था पर एक ‘समृद्ध पाठक’ का वर्चस्व स्थापित हो गया है। यह लेखकों के वर्गीय अहंकार पर भी तगड़ी चोट है। इसलिए कि लेखक अमूमन अपने आप को सर्वेसर्वा मानते रहे हैं और पाठकों को अपना अनुचर। यानी लेखक जो चाहे, जैसा चाहे लिखेंगे और पाठकों को पढ़ना पढ़ेगा, क्योंकि यही उनकी नियति है। हालांकि लेखक खुद भी एक पाठक होता है, लेकिन वह अपने आपको वीआईपी किस्म का सिलेक्टिव पाठक मानकर चलता है। इसी अहं भाव की बुनियाद पर वह एनबीटी जैसी संस्थाअों के संचालन की जिम्मेदारी वह अपने हाथ में रखने का दुराग्रह पालता आया है। मोदी सरकार के ताजा कदम ने जहां लेखकों को उनकी हैसियत दिखा दी है वहीं पाठकों का परचम सृजन शिखर पर लहरा दिया है। इससे बड़ा फायदा यह होगा कि लेखकों की औकात पाठकों की नजर से तय हो सकेगी। उनमें क्या, कैसा और कितना लिखने की कूवत है, इसे भी पाठक के पैमाने पर आंका जाएगा। यूं भी लेखकों की दुकान पाठकों के भरोसे ही चलती है। पाठक से ही बाजार भी तय होता है। पाठक अगर किताबें न खरीदें तो लेखक क्या कर लेगा? पाठक ही न होंगे तो लेखकों की स्थिति कला फिल्में बनाने वाले डायरेक्टर से ज्यादा की न होगी। गहराई से देखें तो यह नियुक्ति एनबीटी में एक नीतिगत बदलाव है और इसे कौतुक भाव से देखना चाहिए। नतीजे सकारात्मक रहे तो कल को चेयरमैन पद पर भी किसी जनरल की तैनाती का राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण रास्ता खुल सकेगा।