विपक्ष के सियासी चक्रव्यूह में घिरती जा रही हैं ममता ?

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अजय बोकिल

लगता है पश्चिम बंगाल की राजनीति में प्रदेश की मुख्यहमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बैनर्जी की स्थिति महाभारत के अभिमन्यु जैसी होती जा रही है। वो वोटों की छीना झपटी के चक्रव्यूह में लगातार धंसती जा रही हैं। अपने राजनीतिक वजूद को बचाए रखने उन्होंने अब राज्य में सीएए और एनआरसी लागू न करने को मुद्दा बनाया हुआ है, लेकिन मुद्दे की इस खिचड़ी में भी कई दावेदार हैं। लोकसभा चुनाव के पहले तक ममता ने साॅफ्टड हिंदुत्व का दांव चला, लेकिन वह नाकाम रहा। अब वे अपने हिंदू वोट के साथ साथ मु्स्लिम वोट एकजुट रखने के लिए हर संभव कोशिश कर रही हैं। ऐसे में वो कभी विपक्ष के साथ दिखती हैं तो कभी ‘एकला चलो रे’ की राह पर बढ़ती दिखाई देती हैं। एकतरफ वो मोदी का हर दम विरोध करती नजर आती हैं तो पीएम के नाते मोदी से एक बार मिलकर लेफ्ट और कांग्रेस की आलोचना का निशाना बनती है। वो मुखर विपक्ष की भूमिका निभाने के साथ-साथ विपक्षी एकता से अलग भी रहना चाहती हैं। यानी वो गुड़ भी खाना चाहती हैं और गुलगुलों से परहेज भी जताना चाहती हैं। ममता की यह सारी भाग- दौड़ और हैरानी-परेशानी राज्य में दो माह बाद होने वाले विधानसभा में तीसरी बार अपनी सत्ता टिकाने के इरादे से है। लिहाजा वो तय नहीं कर पा रही हैं, किसे पकड़ें, किसे छोड़ें। दाएं जाएं या बाएं या फिर मध्यमार्गी रहें?
ममता यूं तो भक्त मंडली के निशाने पर तो पहले से रही हैं, क्योंकि ममता अटल शैली की राजनीति की प्रशंसक हैं। लेकिन भाजपा के मोदी-शाह युग में उनके सामने भी विकल्प सीमित हैं। कारण साफ है। पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में हिंदुत्व का परचम लहराने वाली भाजपा ने राज्य में 40.23 प्रतिशत वोट और 18 सीटें लेकर ममता दी के राजनीतिक महल की नींव को हिला दिया था। इसके पहले ममता की राजनीति मुख्य रूप से मुस्लिम और उदारवादी हिंदू वोटों के दम पर सत्ता में बने रहने की थी। गौर तलब है कि पश्चिम बंगाल के कुल वोटरों में 70.54 प्रतिशत हिंदू तथा 27.01 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। बीजेपी की उग्र हिंदुत्व की राजनीति के चलते हिंदू वोटर तेजी से भाजपा की अोर खिसक रहे हैं, जबकि ममता ने बड़ी मेहनत से लेफ्टि का तगड़ा वोट बैंक रहे मुस्लिम वोट का अधिकांश अपने पाले में खींच कर 2011 में राज्य में सत्ता हासिल की थी। उसके बाद यह अल्पसंख्यक वोट बैंक मोटे तौर पर ममता के साथ ही रहा है। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के बाद राज्य में सत्तारूढ़ टीएमसी और विरोधी भाजपा के वोट शेयर में महज 3 फीसदी का अंतर है, जिसको पाटने के लिए भाजपा ने सीएए और एनआरसी को हथियार बना लिया है तो इसी को ढाल बनाकर ममता अपना अल्पसंख्यक वोट बचाने का जी तोड़ प्रयास कर रही है।
दरअसल बंगाल में भाजपा को छोड़ शेष सभी दलों में इसी 27 फीसदी वोट बैंक में सेंध लगाने अथवा उसे अपने पाले में करने का घमासान छिड़ा है। इसीलिए ममता सहित सभी गैर भाजपाई दल एनआरसी को जीवन-मरण का प्रश्न बनाए हुए हैं। मुसलमानों को समझाया जा रहा है ‍कि सीएए और एनआरसी उन्हें कहीं का नहीं छोड़ेगा। लेकिन इस कानून को वस्तुनिष्ठ ढंग से कोई नहीं बता रहा कि यह कानून वास्तव में है क्या और भारतीय मुसलमानों को कितना प्रभावित करेगा, करेगा भी या नहीं। भाजपा भी अपने जन अभियान में केवल इतना बता रही है कि यह कानून नागरिकता देने वाला है। क्योंकि इस विवादित कानून पर किसी किस्म की साफगोई सियासी जमावट को बिगाड़ सकती है।
ध्यान रहे कि बंगाल में 2009 के लोकसभा चुनाव से अल्पसंख्यक वोटों का रूझान ममता की अोर होना शुरू हुआ। उन्होने इसे लेफ्ट और भगवा भाजपा के विकल्प के रूप में देखा। परिणाम स्वरूप जहां राज्य में तीन दशकों से सत्तासीन रहे लेफ्ट के वोट बैंक मे रिसन शुरू हुई, वहीं ममता का सिंहासन और सुरक्षित होता गया। इसी दौरान राज्य में भाजपा के उभार को शुरू में वाम दलों ने ममता को कमजोर करने वाले फैक्टर के रूप में देखा, लेकिन उसी भाजपा ने लेफ्टव की राजनीतिक जमीन और पोली करनी शुरू कर दी। ऐसे में पिछले लोकसभा चुनाव में लेफ्टे का वोट बैंक घटकर महज 6.28 फीसदी रह गया। अगर इसमें कांग्रेस का वोट ‍िमला दें तो भी यह कुल 12 परसेंट ही होता है।
ममता के लिए एक नई चुनौती और मुसीबत राज्य में मुसलमानों की पार्टी होने का दावा करने वाले एआईएमआईएम की घुसपैठ है। लोकसभा चुनाव में बंगाल से लगी बिहार की मुस्लिम बहुल किशनगंज सीट पर दूसरे स्थान पर रहने के बाद एमआईएआईएम नेता असदुद्दीन अोवैसी के हौसले बुलंद हैं। वो पूरे जोर शोर से आगामी विधानसभा चुनाव में उतरने के मूड में हैं। इस नए खतरे से परेशान ममता ने एमआईएआईएम नेताअों को ‘मुस्लिम अतिवादी’ तक कह डाला। लेकिन इससे राज्य में कट्टर मुसलमानों के अोवैसी खेमे में लामबंद होने की संभावना और बढ़ गई है। यानी राज्य में अब मुस्लिम वोटों की दावेदार चार पार्टियां हो गई हैं। जबकि भाजपा केवल बहुसंख्यक वोटों को एकजुट रखने पर ध्यान केन्द्रित‍ किए हुए है। अगर वह इसमें कामयाब रही तो विधानसभा चुनावों के नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं।
वैसे भी राज्य के मुसलमान ममता से पूरी तरह खुश हैं, ऐसा भी नहीं है। बताया जाता है कि ममता ने राज्य में 1 हजार मदरसों को सरकारी मान्यता देने का वादा अभी तक पूरा नहीं ‍िकया है। दूसरे, मुसलमानों को प्रदेश में पिछड़े वर्ग के तहत 10 फीसदी आरक्षण देने का पूर्ववर्ती लेफ्टे सरकार का फैसला कानून में नहीं बदल सका है। उल्टे पिछले साल ममता सरकार ने राज्य के मुस्लिम बहुल सरकारी स्कूलों में धर्म के आधार पर अलग भोजन कक्ष बनाने का आदेश देकर नया बवाल खड़ा कर दिया था। ऐसे में मुसलमानों के एक तबके को लग रहा है कि ममता का अल्पसंख्यक प्रेम सतही है और केवल भाजपा से डराने के लिए है।
कुल मिलाकर ममता की परेशानी यह है ‍कि वह किससे राजनीतिक ममता दिखाएं और किससे पंगा लें। ऐसे में उनकी सियासी उम्मीद अब केवल एनआरसी पर टिकी हुई है। उन्होंने इसे राज्य में लागू नहीं करने की घोषणा भी कर दी है। लेकिन राज्य में इसी कानून का ‍विरोध लेफ्टस,कांग्रेस और एमआईएआईएम भी ऊंचे सुरों में कर रहे हैं। ऐसे में विस चुनाव में किसकी मुनादी मुस्लिम वोटों को अपने पाले में खींचने में ज्यादा कामयाब होगी, अंदाजा लगाना मुश्किल है। ममता की कोशिश यही है कि उनका हिंदू वोट बचा रहे और मुस्लिम वोटों का न्यूनतम बंटवारा हो।
इसी वोट चिंतन में ममता ने पीएम मोदी के साथ संवैधानिक प्रोटोकाॅल को भी दरकिनार किया। उधर लेफ्टा और कांग्रेस एनआरसी के बहाने अपनी राजनीतिक जमीन फिर से हासिल करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। ममता उनसे आंखे ‍िमला भी रही हैं और आंखे चुरा भी रही हैं। उधर एमआईएआईएम अलग झपट्टा मारने पर आमादा है। ऐसे में ममता क्या करे? साॅफ्टा हिंदुत्व को पकड़े या कट्टर इस्लाम को कोसे? किस-किस को जमीन सुंघाए और किस-किस से अपना सियासी दामन बचाए? राजनीतिक दृष्टि से बंगाल में यह बेहद दिलचस्प स्थिति है। ममता की सत्ता बचे रहने का केवल एक ही आधार हो सकता है, और वह है राज्य में नेता के रूप में उनका विकल्पहीन होना। क्योंकि किसी भी विपक्षी पार्टी के पास कोई दमदार चेहरा नहीं है। सूबेदार सबके पास हैं, सर सेनापति किसी के पास नहीं है। यही गली है, जो ममता को ‍राजनीतिक चक्रव्यूह से तीसरी बार भी सुरक्षित निकाल दे। क्या ऐसा होगा?