दीपिका की इस ‘छपाक्’ में आखिर किसका प्रमोशन है ?

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अजय बोकिल

जेएनयू ( जवाहरलाल नेहरू विवि, नई दिल्ली ) में हुई भारी हिंसा और उसके बाद हो रहे वार-प्रतिवार की वैचारिक तथा राजनीतिक लामबंदियों से हटकर कुछ नए ट्रेंड भी इस अभूतपूर्व घटना से नमूदार हो रहे हैं। पहला तो यह कि इस पूरे घटनाक्रम के केन्द्र में चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक, ‍स्त्री शक्ति को केन्द्र में ला दिया है। दूसरे, फिल्मी पर्दे के सितारे अब खुलकर अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताअों का इजहार करने लगे हैं, चाहे इसके लिए उन्हें कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। तीसरे, किसी राजनीतिक आंदोलन की जमीन भी किसी फिल्म प्रमोशन के लिए बड़ी सफाई के साथ इस्तेमाल की जा सकती है।
इस एंगल से जेएनयू प्रकरण दो परस्पर विरोधी वैचारिक प्रतिबद्धताअो वाले छात्रों के हिंसक गुटीय संघर्ष तथा बोलने की आजादी के अधिकार की रक्षा के आग्रह की परिसीमा से निकलकर और विस्तृत हो गया है। खास बात यह है कि एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में जो कुछ घटा या रचा गया, उसके सभी कोणों पर स्त्री स्वर की मुखरता और नारी शक्ति की जिद दिखाई पड़ती है। जेएनयू छात्र संघ की जिस अध्यक्ष को बुरी तरह पीटा गया वह आइशी घोष और पुलिस की जिस आला आईपीएस अफसर को पूरे मामले की जांच सौंपी गई है, वह शालिनी सिंह भी महिला है। जिस महक ‍मिर्जा प्रभु ने दिल्ली की कराह को मुबंई में अभिव्यक्त किया, वो भी महिला है। जिस सुपर स्टार ‍अभिनेत्री दीपिका पदुकोण ने जेएनयू में कुछ देर के लिए ही सही आंदोलनकारी छात्रों के साथ एकजुटता दिखाई, वह भी महिला ही है। इसका सीधा अर्थ यह है कि महिलाएं अब केवल ‘फालोअर’ नहीं रहीं, वह हर एंगल से लीड कर रही हैं और अमूमन अपने-अपने स्टैंड पर कायम हैं। वे दबावों के आगे सरेंडर नहीं कर रहीं। हालां‍कि इसके पीछे कारण अलग अलग हो सकते हैं।
जेएनयू आंदोलन के स्क्रीन शाॅट में शीर्ष अभिनेत्री दीपिका का आना, इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उनका किसी राजनीतिक आंदोलन से कोई पूर्व रिश्ता नहीं रहा है। वह स्वरा भास्कर जैसी स्पष्ट विचारधारा रखने वाली अभिनेत्री भी नहीं है। वैसे भी फिल्मी कलाकार इस तरह के राजनीतिक विवादों में हिस्सेदारी से बचते रहे हैं। क्योंकि फिल्म उद्योग एक व्यवसाय है, जिसमें करोड़ों रूपए दांव पर लगे रहते हैं। दो साल पहले जब फिल्म ‘पद्मावत’ पर भारी विवाद हुआ था, तब भी दीपिका ने फिल्म में हिरोइन की भूमिका में होते हुए भी सड़क पर आकर इस तरह फिल्म के विरोध की आलोचना नहीं की थी। यह बात अलग है ‍िक पद्मावत तमाम बवाल के बाद लागत से दोगुनी कमाई कर गई।
इस बार मामले की पृष्ठभूमि में 10 जनवरी को रिलीज हो रही फिल्म ‘छपाक्’ का है। फिल्म का विषय बेहद मार्मिक है। एसिड अटैक का ‍शिकार हुई दिल्ली की एक युवती लक्ष्मी अग्रवाल के असली जीवन संघर्ष पर यह फिल्म दीपिका पदुकोण और गुलजार की बेटी मेघना गुलजार ने बनाई है। इसमें लक्ष्मी की भूमिका खुद दीपिका ने की है। यद्यपि रिलीज से पहले ही फिल्म कुछ विवादों में घिर गई है, मसलन घटना की वास्तविक भुक्तभोगी लक्ष्मी का नाम फिल्म में बदल कर मालती कर दिया गया है। साथ ही इस एसिड अटैक के मुख्यग आरोपी नदीम खान का नाम भी बदलकर राजेश किया गया है। कुछ लोग इसमें भी ‘एंटी हिंदू’ साजिश देख रहे हैं। सवाल उठाया जा रहा है कि फिल्म में मूल अपराधी का धर्म भी बदलने का मतलब है? बताया जाता है कि पूरी‍ फिल्म करीब 35 करोड़ रू. में बनी है।
फिल्म प्रमोशन की प्रसव पीड़ा के इस मौके पर दीपिका का अचानक बवालग्रस्त जेएनयू पहुंचना चौंकाने वाला था। क्योंकि इस कद की कोई सेलेब्रिटी अभिने‍त्री किसी छात्र आंदोलन के साथ इस तरह खड़ी नहीं हुई। लेकिन दीपिका ने हिम्मत दिखाई। इसके बाद सोशल मीडिया में दीपिका के समर्थन और विरोध में मुहिम चल पड़ी। यूं दीपिका जेएनयू में बमुदश्किल सात मिनट रहीं। वो हमले में घायल छात्र नेता आइशी से मिलीं। मगर कुछ बोली नहीं। उतना भी नहीं कि जितनी छपाक् की आवाज होती है। अलबत्ता टीवी चैनल पर अपने फिल्म प्रमोशन इंटरव्यू में दीपिका ने चिंतित भाव से इतना जरूर कहा कि (जेएनयू में जो कुछ भी हुआ) इससे डर लगता है, दुख भी होता है। यह तो हमारे देश का फाउंडेशन नहीं था। यहां जिज्ञासा की बात यह है ‍कि दीपिका को जेएनयू जाने की सलाह किसने दी? क्या वो स्वप्रेरणा से और अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा के लिए वहां गई थी या यह भी एक ‘क्रिएटेड सीन’ था? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में ‍मिलेंगे। दीपिका के जेएनयू जाने की गूंज केवल भारत में ही नहीं पाकिस्तान में भी हुई है। पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता आसिफ गफूर ने ट्वीट कर जेएनयू में दीपिका की ‘युवाअोंऔर सच के साथ खड़े होने के लिए सराहना की। हालांकि कुछ समय बाद ही गफूर ने यह ट्वीट डिलीट कर दिया। इस हरकत पर पाकिस्तान की ही एक पत्रकार नायला इनायत ने तंज कसा ‘शाबाश दीपिका, अब मुझे डिलीट करने दो और बता दो ‍और सरेंडर कर बता दो कि जेएनयू में ‍िहंसा के बाद दीपिका छात्रों के साथ खड़ी थी।
बहरहाल एक बात साफ है कि देश में वैचारिक संघर्ष ने अब नई दिशा पकड़ ली है। दीपिका के नैतिक समर्थन से जेएनयू आंदोलन को कितनी ताकत मिली या नहीं मिली, यह तो बाद में पता चलेगा। लेकिन इस पूरे प्रकरण में ‘दूध का धुला’ तो शायद कोई भी नहीं है। नजर और नजरिए के हर चश्मे पर एक फिल्टर लगा हुआ है। घटना को अंजाम देने वाले कौन लोग थे, यह सब को पता है, लेकिन दिल्ली पुलिस के माइक्रोस्कोप में वो लोग कहीं नजर नहीं आ रहे। पुलिस को कब और किसकी सुविधा से एक्शन लेना चाहिए और कब नहीं, इसका भी अलग-अलग नरे‍टिव बन रहा है। अगर दीपिका जेएनयू में जाकर कोई स्टैंड ले रही हैं तो यह यकीनन महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि दीपिका का वहां जाना किसी इनोवेटिव मार्केटिंग स्ट्रेटेजी का हिस्सा है तो यह वाकई ‍िवचारणीय प्रयोग है। इसके पहले आमिर खान ने अपनी फिल्मो के प्रमोशन के लिए कुछ ‘आॅफ बीट’ टोटके किए थे। लेकिन एक दूसरे आंदोलन की जमीन पर सामाजिक त्रासदी और स्त्री के दर्द के अंकुर उगाना नया और नितांत साहसिक प्रयोग है। इसलिए भी कि इस मामले में दीपिका को ट्रोल करने के साथ साथ कई संगठनों ने दीपिका की फिल्म ‘छपाक्’ के बहिष्कार की मुहिम भी शुरू कर दी है।
इस मामले में केन्द्र और कई राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा अंतर्द्वंद्व में फंसी दिखती है। उसके कुछ नेताअों जैसे मप्र में विधायक रामेश्वर शर्मा ने जहां दीपिका पर देश को जलाने वालों का साथ देने का आरोप लगाया है, वहीं पार्टी के एक बड़े नेता और केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने संतुलित प्रतिकक्रिया देते हुए कहा है कि सिर्फ कलाकार ही क्यों, कोई भी आम आदमी अपना विचार प्रकट करने के लिए कहीं भी जा सकता है। इससे पहले केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नक़वी ने भी कटाक्ष के भाव से कहा था कि कौन कहां जाता है, इससे कोई किसी को रोक नहीं सकता। यह एक लोकतांत्रिक देश है और हमें इस पर कोई आपत्ति नहीं है। कोई फिल्म के प्रमोशन के लिए जाता है और कोई इसके लिए इवेंट तैयार करता है। यह भी सही है ‍कि चंद नेताअों अथवा संगठनों के आव्हान से किसी फिल्म की कमाई और लोकप्रियता पर कोई खास असर नहीं होता। यह सुर्खियां हथियाने का खेल ज्यादा है। हिंदी में छपाक् का अर्थ होता है जल धारा के किसी चट्टान से टकराने के बाद उत्पन्न होने वाली ध्वनि है। देखना है ‍कि दीपिका के इस ‘छपाक्’ की गूंज कहां तलक और किस रूप में सुनाई देगी?