ज्वालामुखी के सक्रिय होने का संकेत …..

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-रवीन्द्र वाजपेयी

हैदराबाद पुलिस ने कल सुबह उन चारों को मार गिराया जिन्हें बीते सप्ताह एक महिला पशु चिकित्सक के साथ दुष्कर्म करने के बाद जलाकर मारने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। बकौल पुलिस गत दिवस प्रात:काल वह चारों आरोपियों को जाँच के सिलसिले में दुष्कर्म की जगह लेकर गयी थी। वह समय इसलिए चुना गया जिससे कि वहां भीड़ एकत्र न हो जाये। जाँच के दौरान उन चारों ने भागने की कोशिश की। पुलिस से हथियार छीने और फिर हमला कर दिया, ईंट और पत्थर भी उठाकर फेंकने शुरू कर दिए जिससे दो पुलिस कर्मी घायल भी हो गए। आत्मरक्षार्थ पुलिस ने गोलियां चलाईं और चारों आरोपी ढेर हो गए। एन्काउटर की खबर देश भर में फैल गयी। घटनास्थल पर जनता की भीड़ आ गई। पुलिस जिंदाबाद के नारे लगने लगे, पुष्पवर्षा हुई। पुलिसवालों को जनता ने कन्धों पर उठा लिया। पूरे देश में हैदराबाद पुलिस की प्रशंसा के पहाड़ खड़े किये जाने लगे। चंद अपवाद छोड़कर सभी ने माना कि बलात्कारियों को इसी तरह दंडित किया जाना चाहिए। रात में घर लौट रही उक्त महिला चिकित्सक के साथ हुए अमानवीय हादसे के बाद से देश भर में आक्रोश था। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर जबर्दस्त बहस चल पड़ी। सड़क से संसद तक गुस्सा दिख रहा था। राज्यसभा में जया बच्चन ने दुष्कर्मियों को जनता के हवाले करने जैसा सुझाव तक दे डाला। बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों के साथ उन्हें रोकने के विभिन उपायों पर भी विमर्श चल पड़ा। निर्भया कांड के दोषियों को अब तक फांसी नहीं लगने को लेकर व्यवस्था पर पर सवाल कड़े किये जाने लगे। न्यायपालिका की सुस्ती को कठघरे में खड़ा किया गया। अदालत द्वारा फांसी सुनाये जाने के बाद भी दया याचिका के नाम पर दोषियों को जीवित रखे जाने की आलोचना होने लगी। कोई इस्लामी कानून के अनुसार दण्डित करने की सलाह देने लगा तो किसी ने उन्हें नपुंसक बनाने जैसा सुझाव दे डाला। जिसके मन में जो आया उसने वह कहा। हालाँकि हैदराबाद पुलिस ने 24 घंटों के भीतर ही चारों आरोपियों को पकड़ लिया था लेकिन उसके बाद भी देश भर से आती रही बलात्कार की खबरों ने जनता के गुस्से को और बढ़ा दिया। विशेष रूप से लड़कियां जिस तरह से मुखर होकर सामने आईं वह समाज में दुष्कर्म को लेकर व्याप्त असंतोष का परिचायक माना गया। ये सब चल ही रहा था कि उप्र के उन्नाव में एक और दर्दनाक काण्ड हो गया। एक वर्ष पहले एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म के आरोप में जेल में बंद आरोपियों ने जमानत पर छूटकर आने के बाद उस युवती को चाकू से घायल किया और फिर तेल डालकर आग लगा दी। जलती हुई अवस्था में वह युवती लगभग एक किलोमीटर दौड़ती हुई अपने घर के पास आकर गिर गई। बाद में उसे दिल्ली इलाज के लिए भेजा गया लेकिन 90 फीसदी जली होने के कारण गत रात्रि उसका देहांत हो गया। उक्त घटना के बाद हैदराबाद काण्ड से उपजा गुस्सा चरम पर जा पहुंचा। ऐसे में जब हैदराबाद पुलिस द्वारा चारों आरोपियों को मार गिराने की खबर आई तो उसके समर्थन में जो सकारात्मक प्रतिक्रियाएं सुनने मिलीं उनसे लगा कि जनता का गुस्सा कुछ कम हुआ। जो पुलिस खलनायक थी वही अचानक महानायक बन गयी। लेकिन ज्यों ज्यों दिन आगे बढ़ा त्यों-त्यों एन्काउन्टर की सत्यता और औचित्य पर सवाल भी खड़े किये जाने लगे। असदुद्दीन ओवैसी के अलावा, सीताराम येचुरी, अरविन्द केजरीवाल और भाजपा की मेनका गांधी ने पुलिस की कार्रवाई को न्याय व्यवस्था का उल्लंघन बताया। यहाँ तक कहा गया कि यदि इस तरह से चलेगा तो फिर न्यायालयों की जरूरत ही क्या रह जायेगी? अतीत में हुए अनेक फर्जी एन्काउटरों के हवाले से पुलिस द्वारा बताई कहानी की विश्वसनीयता को भी संदेह के घेरे में रखा जाने लगा। हालाँकि मारे गये आरोपियों के प्रति किसी ने हमदर्दी दिखाने की जुर्रत तो नहीं की किन्तु ये पूछने वाले भी सामने आ गये कि पुलिस ने जिन चारों को आरोपी बनाकर पकड़ा वे वास्तविक अपराधी थे या जनता के गुस्से से बचने के लिए चार निरपराधों को बलि का बकरा बना दिया गया ये भी कहा गया कि किसी को बचाने के लिए किसी और के गले में फंदा डाल दिया गया। राजनीतिक पार्टियों के भीतर भी मतभिन्नता दिखी। रामगोपाल यादव और जया बच्चन अलग जुबान में बोले तो अरविंद केजरीवाल और उनके राज्यसभा सदस्य संजय सिंह की प्रतिक्रिया भिन्न थी। मायावती ने तो उप्र की पुलिस को भी हैदराबाद पुलिस का अनुसरण करने की समझाइश दे डाली। दूसरी तरफ इस बात पर चिंता भी जताई गयी कि एन्काउंटर की सत्यता जाने बिना चार लोगों की मौत पर जश्न मनाना उन्माद और अपरिपक्वता का परिचायक है जिसके दूरगामी नतीजे खतरनाक होंगे। समूची प्रतिक्रियाओं का लब्बोलुआब ये रहा कि बलात्कार के दोषियों को जल्द से जल्द कड़े से कड़ा दंड मिलना चाहिए। इसके लिए न्याय प्रक्रिया को तदनुसार ढालने की जरूरत पर भी बल दिया गया। हैदराबाद पुलिस के कृत्य की जांच उच्च न्यायालय ने आदेशित कर दी है। मावाधिकार आयोग का दौरा कार्यक्रम बन गया है। मृतकों के पोस्ट मार्टम की वीडियो बनाने कह दिया गया है। दो चार दिनों में मामला ठंडा होने के बाद भी आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी रहेगा। राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती रहेंगी। और तब तक उन्नाव की तरह दूसरा कोई जघन्य कांड हो जाएगा। सवाल ये है कि समाज में व्याप्त गुस्से को शांत करने का तरीका क्या है? उन्माद किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होता। भीड़ की विवेकशून्यता भी प्रमाणित सत्य है। लेकिन आम जनमानस इस हद तक उत्तेजित क्यों और कैसे हो गया ये सोचने की जरूरत कोई नहीं समझ रहा। हैदराबाद पुलिस ने जनता के गुस्से पर पानी डालने के लिए वह कदम उठाया। यदि ये मान लिया जाए तब भी इस सवाल का जवाब तो ढूंढना ही पड़ेगा कि आखिर जनता इतने गुस्से में क्यों आई? पुलिस को कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। लेकिन कल जिस तरह की उग्र प्रतिक्रियाएँ सुनने मिलीं उनमें बिना कुछ कहे भी न्यायपालिका निशाने पर आ गयी। ये कहना गलत नहीं होगा कि दुष्कर्मियों को न्याय प्रणाली से बाहर निकलकर उनके किये की सजा देने जैसी भावना का प्रगटीकरण सोये हुए ज्वालामुखी के सक्रिय होने का संकेत है। इसे ठीक तरह से नहीं समझा गया तो उससे निकलने वाला लावा कितना नुक्सान पहुंचाएगा ये कह पाना कठिन है। संसद और सरकार तो जब करेंगे तब करेंगे लेकिन समाज को भी तो अपनी जिम्मेदारी और भूमिका तय करनी होगी क्योंकि अंतिम परिणाम तो उसे ही भोगने पड़ते हैं।