एे हेलो… संभलकर चलने का वक्त आ रहा है….

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राघवेंद्र सिंह

सूबे और मुल्क के हालात को देखते हुए राजकपूर की मशहूर फिल्म “मेरा नाम जोकर” के गाने की लाईनें याद आ रही है एे भाई जरा देख के चलो… प्रदेश में भारी बारिश से फसलें बरबाद हो गई हैं। कंगाल हो रहे किसानों को अंतरिम राहत की आवश्यकता है। बदहाल सड़कों को सुधारने के लिए युद्ध स्तर पर मरम्मत अभियान की जरूरत है। स्कूलों में पाठ्यक्रम पूरा कराने और डिप्रेशन से बचाने के लिए बच्चों को दिन-रात पढ़ने-पढ़ाने की जरूरत है। मंदी को दौर में गुल्लकों में पैसे बचाने की जरूरत है। बीमारी के दौर में बुखारों से बचने के लिए सफाई मुहिम के साथ सरकारी अस्पतालों में स्टाफ के साथ डाक्टरों से अच्छे इलाज और दवाइयों की जरूरत है। इन सबके साथ जो दो महत्वपूर्ण बातें हैं वे यह है कि राम मंदिर का फैसला भले ही अगले महीने आने वाला हो लेकिन सबके लिए समझदार होने के साथ सतर्क रहने की जरूरत है। इसकी गंभीरता एेसे भी समझ सकते हैं कि सीमा पर पाकिस्तान के साथ अब गोलीबारी नहीं बल्कि हमारी फौज को बार-बार सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत पड़ रही है इसलिए देश में पाक एजेंटों पर निगाह रखने में सबको संभल कर रहने की जरूरत है।
एे भाई देख के चलो के साथ ऊपर भी नहीं, नीचे भी देखने की जरूरत है। राम मंदिर के मुद्दे पर जो भी फैसला आये उस पर प्रतिक्रिया देने के बजाय कानून को मानने और उसका राज कायम करने की जरूरत है। इस मसले पर सोशल मीडिया के जो योद्धा हैं जिन्हें सियासी दल कुछ एनजीओ के साथ शहर और कस्बों में कथित ज्ञानियों के समूह संचालित करते हैं उन्हें भी सतर्क रहने की जरूरत है। होता यह है कि फैसले के पूर्व और उसके बाद बहुत से लोग निर्णय पर अदालत को बधाई देते हैं या उसकी आलोचना करते-करते पता ही नहीं चलता कब न्याय की अवमानना तक चले जाते हैं। एेसे में कंटेम्प्ट आफ कोर्ट का मामला बनता है लेकिन इसे लेकर जब तक कार्रवाई हो तब तक काफी देर हो जाती है इसलिए मसला अदालत का ही रहे और उसे सांप्रदायिक रंग देने से बचने की भी जरूरत होगी।
कश्मीर में धारा 370 को हटाये जाने के बाद पाकिस्तान की चालों को दुनिया भर में जिस तरह अनदेखा किया जा रहा है उससे खिसियाहट में वह भारत में कुछ गड़बड़ी करा सकता है। इसी की कोशिश में सीमा पर घुसपैठ, गोलीबारी की वह लगातार हरकतें कर रहा है। भारतीय सेना की रविवार की सुबह आतंकी लांच पेड पर जवाबी कार्रवाई से सीमा पर हम मजबूत हंै मगर देश के भीतर आतंकी एजेंटों पर सबको सतर्क रहने की जरूरत है। दरअसल आतंकियों के स्लीपिंग सेल कब और कहां एक्टिव होकर कौन सी वारदात करेंगे किसी को नहीं पता। उनके मंसूबों को ध्वस्त करने के लिए नागरिकों को देखने और मिलने वाली सूचना भरोसेमंद सुरक्षा एजेंसियों से साझा करनी चाहिए। असल में यह सब बातें इसीलिए की जा रही हैं क्योंकि हमारे खुफिया तंत्र को जितनी ज्यादा सूचनाएं मिलेगी देश उतना सुरक्षित रहेगा। हिंसा की साजिश और युद्ध के दौरान आंतरिक सुरक्षा सबसे अहम कड़ी होती है। पाकिस्तान यह समझ चुका है कि वह भारत से युद्ध में नहीं जीत सकता इसलिए उसने आतंक के जरिए शेडो वार शुरू कर रखी है। मध्यप्रदेश के बारे में यह इसलिए भी ज्यादा अहम है क्योंिक अक्सर देश की बड़ी आतंकी घटनाओं के तार सूबे के कुछ हिस्सों से जुड़े हुए मिल जाते हैं। पिछले महीनों विन्ध्य क्षेत्र से एक एेसे ही गिरोह का पर्दाफाश हुआ था जो आईएसआई से जुड़कर टेरर फंडिंग करने के साथ सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहे थे। अक्सर ये आरोप अल्पसंख्यक वर्ग पर लगते हैं। मगर विन्ध्य से पकड़े गये गिरोह में बहुसंख्यक वर्ग के लोग शामिल पाये गये थे इसलिए पूरे मसले में हिन्दू-मुसलमान के नजरिये से देखने की गलती नहीं करना चाहिए। देश को नुकसान पहुंचाने वाले एेसे कई लोग दोनों वर्गों में हैं। मेरे अनेक मित्र अल्पसंख्यक वर्ग से आते हैं फिर भी उनमें देशभक्ति की भावना किसी भी कीमत पर दूसरों से कम नहीं है। वे जानते हैं अगर देश संकट में आयेगा तो फिर हम सब असुरक्षित हो जाएंगे। 1992 में हुई देशव्यापी हिंसा के दौरान पुराने भोपाल में गोस अहमद सिद्दीकी परिवार के बीच एक नव विवाहित हिन्दू किराये से रहता था। हिंसा के बाद कर्फ्यू लगा और पति एक होटल में नौकरी करने के कारण घर नहीं आ सका। तब सिद्दीकी परिवार की सबसे बुजुर्ग महिला सलमा सुल्तान ने फोन कर उस युवक को बताया कि आपकी बीबी हमारे घर में बेटी की तरह महफूज है इसलिए किसी तरह की चिंता की जरूरत नहीं है। एक हफ्ते बाद कर्फ्यू हटता है और पति के लौटने पर उसको बेटे की तरह रखा जाता है। एेसे कई किस्से हैं जो दोनो वर्ग के लोगों ने आगे आकर ये साबित किया है कि कुछ सिरफिरों को छोड़ सारे हिन्दुस्तानी मुल्क के लिए जीते हैं।
झाबुआ विधानसभा का उपचुनाव कल 21 अक्टूबर को मतदान के साथ संपन्न हो जाएगा। नतीजे जो भी आएं मगर इस चुनाव में भारी बारिश में बरबाद हुए किसानों की फिक्र किसी भी पार्टी ने छाती ठोककर नहीं की है। उद्योगों के लिए जरूर रेड कारपेट बिछाया गया है। उन्हें कई तरह की छूट दी जा रही है। कितने उद्योग आएंगे और कितने लोगों को रोजगार मिलेगा ये तो समय बताएगा मगर 15 साल की भाजपा सरकार को देखा जाये तो उद्योग लगने और रोजगार मिलने को लेकर तजुर्बा अच्छा नहीं है। लाखों-करोड़ों के एमओयू साइन हो रहे हैं लेकिन जमीन पर कितने सपने सच होते हैं इस मुद्दे पर कमलनाथ और उनकी सरकार कसौटी पर है। शिवराज सिंह से तुलना करें तो वे एक किसान परिवार से आये एेसे जननेता हैं जो लोगों को भाषण देकर दिल जीतने में माहिर हैं। उनकी तुलना में कमलनाथ कारपोरेट सेक्टर के लीडर हैं और उन्हें पता है कि उद्योगपति क्या चाहते हैं और उनसे कैसे उद्योगों की स्थापना करानी है। टीम कमलनाथ पर मेग्नीफिसेंट म.प्र.का स्लोगन सच करने का दवाब है। इस मामले में मुख्य सचिव एस.आर. मोहंती की प्रशासनिक दक्षता भी एक तरह से दाव पर है। उम्मीद की जानी चाहिए नतीजे वैसे ही आएंगे जैसा कहा जा रहा है।
जुलाई में सरकार चलाती है “स्कूल चलाे अभियान” लेकिन अब जरूरत है स्कूल में पढ़ाई करों अभियान की। असल में नवंबर से दिसंबर के बीच यदि पाठयक्रम पुरा नही किया गया तो बच्चों में पढ़ाई को लेकर तनाव पैदा होगा खासतौर से बोर्ड की परिक्षाओं में ऐसा देखा जाता है। पूरे साल मास्साब बेचारे मध्यान्ह भोजन और संकुल से लेकर मुख्यालय तक कागजी खाना पूर्ति में लगे रहते हैं। इस बीच सरकार के भी बहुत सारे सर्वे के काम भी जुटे पड़े रहते हैं। हालत खराब है और प्रदेश की शिक्षा का स्तर अब भूजल स्तर में गिरावट की भांति पाताल में जा रहा है। कुलमिलाकर शिक्षा के स्तर में सूखे के हालात है। ऐसे ही बीमारों के लिए सरकारी अस्पताल भी बदहाल है। बीमार पड़े तो मर्ज से तो बच जाएंगे मगर हो सकता अस्पताल का बिल देखकर मर जाएं। गरीब की मरण है इसलिए सबको संभलकर रहने की जरूरत है।