मप्र : कांग्रेस की साख और सरकार की धाक को धक्का

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रविंद्र बाजपेयी

वैसे तो जब से मप्र में कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी है तभी से उसके स्थायित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। भाजपा के नेता लगातार डींग हांकते रहे कि वे जब चाहें सरकार गिरा सकते हैं। हालाँकि उनके बड़बोलेपन का उस समय मजाक बन गया जब उनके अपने दो विधायक ही टूटकर कांग्रेस की गोद में जा बैठे। बावजूद उसके सरकार के गिरने की अटकलें समाप्त नहीं हुईं। लेकिन बीते कुछ दिनों से मप्र के कांग्रेस नेता आपस में जिस तरह से तलवारें भांज रहे हैं उससे लगता है कि 15 साल बाद आई सत्ता को पार्टी के नेता हजम नहीं कर पा रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर शुरू हुई रस्साखींच तो खैर अपनी जगह ठीक थी लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा मंत्रियों को लिखी गई चिठ्ठियों से नया बवाल मच गया। उमंग सिंगार नामक एक युवा मंत्री ने श्री सिंह पर तीखे आरोप लगाते हुए ब्लैकमेल करने और बाहर से सरकार चलाने जैसा आरोप तो लगाया ही उसे अस्थिर करने की तोहमत भी थोप दी। उमंग के इस पैंतरे से सूबे की सियासत उबल पड़ी। सरकार के अंतर्विरोध सामने आने लगे। ये भी साफ नजर आने लगा कि मंत्रियों की निष्ठा मुख्यमंत्री से ज्यादा उनके गुटीय नेता के प्रति अधिक है। उमंग के पुतले जलाने दिग्विजय खेमा मैदान में उतरा तो पीछे से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में उनका समर्थन करते हुए रेत के अवैध खनन पर सरकार को घेर दिया। इसे इशारा मानकर उनके गुट के बाकी विधायक भी दाना-पानी लेकर चढ़ाई करने पर आमादा हो उठे। मंत्रियों पर लिफाफे लेने जैसे आरोप सत्तारूढ़ पार्टी के विधायकों द्वारा लगाये जाने से भाजपा को तो मुखर होने का अवसर मिला ही लेकिन आम जनता में भी प्रदेश सरकार के स्थायित्व को लेकर संदेह और गहराने लगा। सरकार की छवि और साख दोनों उसके अपने ही लोगों द्वारा खराब किया जाना हर किसी को अटपटा लग रहा है। कमलनाथ ने उमंग को बुलाकर समझा दिया तो वे बजाय बोलने के ट्विटर पर अपनी भड़ास निकालने लगे। जिसे देखो वह सरकार के विरोध में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखने की हिमाकत करने लगा है। गत दिवस अचानक जिस तरह से सिंधिया समर्थक विधायकों ने सामने आकर मंत्रियों के विरुद्ध मोर्चा खोला उसके बाद ये कहने में कोई संकोच नहीं रहा कि कांग्रेसी ही अपनी सरकार को कमजोर करने में जुट गये हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि पार्टी का आलाकमान इस गृहकलह को रोकने में असहाय बना हुआ है। इसके पीछे असली कसूरवार कौन है ये सीधे-सीधे कह पाना कठिन है क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष पद पर श्री सिंधिया की ताजपोशी की सम्भावना बनते ही दिग्विजय सिंह ने जिस तरह से चिठ्ठी लिखकर ठहरे हुए पानी को हिलाकर तलहटी में दबी गंदगी को सतह पर लाने की चालाकी दिखाई उसके बाद से मामला दूसरी तरफ घूम गया। उमंग सिंगार का ये कहना गलत नहीं था कि पूर्व मुख्यमंत्री समानांतर शक्ति केंद्र बनकर बाहर से सरकार चलाना चाहते हैं। इस पूरे विवाद में कमलनाथ की खमोशी भी चौंकाती है। दिग्विजय और सिंधिया गुट के बीच हो रही सड़क छाप लड़ाई का बुरा असर उनकी सरकार की प्रतिष्ठा पर भी पड़ रहा है। यहाँ तक कि नौकरशाही भी कांग्रेस की गुटबाजी में उलझकर रह गई है। इस वजह से सरकार का कामकाज प्रभावित होने लगा है। लगातार स्थानान्तरण होने से प्रशासनिक अमला पहले से ही अनिश्चितता में जी रहा है। भाजपा को कांग्रेस की इस अंतर्कलह में अपने लिए दोहरा लाभ नजर आने लगा है। उसका मानना है कि देर सवेर ज्योतिरादित्य बगावत कर उसके साथ आ जायेंगे। वैसे भी भाजपा इस फिराक में है कि गोवा और कर्नाटक में अपनाई गई रणनीति को दोहराते हुए मप्र में भी कांग्रेस को झटका दे लेकिन अभी तक श्री सिंधिया की तरफ से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला जिससे वह आश्वस्त हो सके। लेकिन भोपाल में चल रही चर्चाओं के अनुसार 12 से 15 विधायक कभी भी बगावत की राह पकड़ सकते हैं। अनेक भाजपा नेता ये स्वीकार कर रहे हैं कि महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के विधानसभा चुनाव खत्म होते ही अमित शाह मिशन मप्र शुरू करेंगे। खैर, भाजपा तो जब करेगी तब करेगी लेकिन कांग्रेस के अपने दिग्गज नेता ही एक दूसरे को नीचा दिखाने और पटकनी देने पर आमादा हों तब भाजपा को अकेले जिम्मेदार नहीं कहा जा सकता। कमलनाथ की समझाइश और श्रीमती गांधी की फटकार के बाद भी मप्र के कांग्रेसी नेता और कतिपय विधायक अपनी तलवारें वापिस म्यान में रखने त्तैयार नहीं दिख रहे। जिसे डांट पड़ती है वह भले चुप हो जाए लेकिन उसका स्थान भरने दूसरे टपक पड़ते हैं। कभी-कभी तो ये भी लगता है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ ही परदे के पीछे कठपुतलियाँ नचाने का खेल कर रहे हैं। फिलहाल उनके पास पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का पद भी है। ऐसे में अनुशासन तार-तार होने के बावजूद उनके द्वारा किसी पर कोई भी कार्रवाई नहीं होना साबित करता है कि या तो वे सोचकर बैठे हैं कि जब तक गद्दी है उसका सुख लेते रहो या फिर वे ही दोनों तरफ के लोगों की पीठ पर हाथ रखकर मुर्गे लड़वा रहे हैं। असलियत जो भी हो लेकिन इस पगड़ी उछाल प्रतियोगिता में कांग्रेस की छवि और ताकत दोनों गिर रही हैं। प्रदेश भर में फैले उसके कार्यकर्ता हतप्रभ हैं। पिछले चुनाव में उसे मत देने वाले भी ठगा सा महसूस करने लगे हैं। पार्टी संगठन में झगड़े तो इस पार्टी के लिए नई बात नहीं लेकिन सरकार में बैठे मंत्री और सत्तारूढ़ दल के अपने विधायक ही जब मंत्रियों की रूचि लिफाफों में होने जैसी बातें करने लगें तब विपक्ष या अन्य किसी के कहने के लिए कुछ बचता ही नहीं है। क्या होगा क्या नहीं ये तो आने वाले दिन ही बताएँगे लेकिन प्रदेश कांग्रेस में हो रही कुत्ताघसीटी के कारण पार्टी की साख और सरकार की धाक दोनों को जबर्दस्त धक्का लग रहा है।