जनता और कार्यकर्ताओं को बॉक्सिंग बैग मान लिया है..!

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राघवेंद्र सिंह

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के त्रिशंकु नतीजे आने के बाद कांग्रेस गठबंधन की सरकार का संभवतः कमलनाथ के नेतृत्व में गठन होगा। पन्द्रह साल बाद भी कांग्रेस भाजपा और शिवराज सरकार के सरकार विरोधी माहौल का इतना लाभ नहीं ले पाई कि अपने दम पर बहुमत हासिल कर ले। दूसरी तरफ जिस भाजपा सरकार ने जन्म से लेकर मृत्यु तक जनता के लिए योजना बनाई हो वह 109 विधायकों के साथ बहुमत से सात कदम दूर रुक गई। कांग्रेस ने जरूर ताकत दिखाते हुए बहुमत का आंकड़ा 116 के पास 114 पर आकर ठिठक गई। अब सवाल है कि भाजपा विरोधी रुख के बाद कांग्रेस को बहुमत क्यों नहीं मिला और जनकल्याण के लिए समर्पित भाजपा चौथी बार सिंहासन पर क्यों नहीं बैठी ?
इस बार जनता और कार्यकर्ता ने किसी भी दल को बहुमत के मुकाम तक क्यों नहीं पहुंचाया ये करोड़ रुपए का सवाल है। इसके पीछे वजह बताने के लिए न तो वादों की फेहरिस्त सुनने वाली जनता आएगी और न आश्वासन पाने वाले कार्यकर्ता का समूह मन की बात कहने वालों को दिल की बात सुनाएगा। इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के एक बात याद आती है। वे अक्सर अपने विरोधियों से कहा करते थे मैं तो बाक्सिंग (पंचिंग) बैग हूं। आप जितना जोर से घूंसा मारेंगे उससे ज्यादा तेजी से पलटकर मैं आऊंगा। अर्थात अगर आप आक्रमण करेंगे तो मेरा जवाब ज्यादा तगड़ा होगा। वे एक बात और कहते हैं कि मैं तो दूबा की तरह हूं आप कितना भी मुझे काटेंगे खत्म होने वाला नहीं हूं। अब यही तासीर जनता और कार्यकर्ता की होती है। कार्यकर्ताओं की दल और नेता उपेक्षा के पंच मारते हैं तो वह बाक्सिंग बैग की तरह पहले तो दूर जाता है और जरूरत के वक्त याने चुनाव के मौके पर उससे ज्यादा ताकत के साथ जवाब भी देने लगा है। 2018 के ये विधानसभा चुनाव तो यही संकेत दे रहे हैं। अब जिस लीडर और कार्यकर्ताओं के राडार में ये संकेत समझने के यंत्र लगे हैं वे कार्यकर्ताओं को संभाल सकते हैं। नहीं तो आज की सफलता और असफलता कल भी बरकरार रहेगी इसकी गारंटी कम है।
मतदाता के मामले में भी कार्यकर्ताओं वाला फंडा लागू होता है। अगर आप उसे आश्वासन देकर वोट लेते हैं और वादे पूरे करने के बजाए मूर्ख बनाते हैं तो आज की जनता बाक्सिंग बैग की तरह व्यवहार करेगी। यह बात आज भाजपा और उनके नेताओं से बेहतर कोई नहीं समझता। अगर यह समझ भाजपा और कांग्रेस दोनों में से जो ज्यादा संजीदगी से मन वचन और कर्म में उतारेगा तो लोकसभा में सकारात्मक नतीजे आएंगे। विधानसभा में किसी भी दल को बहुमत नहीं देकर मतदाताओं ने एक तरह से चेतावनी दी है कि ये जो नया वोटर है न वो आपके बहलावे फुसलावे और समझाने में नहीं फंसने वाला। कुलमिलाकर वो रिजल्ट ओरिएंटेड है। इधर वादा कर रहे हैं तो उधर उसकी समय सीमा में पूर्ति करिए। पुराने वोटर की तरह और पुराने कार्यकर्ता की तरह वो भावुक नहीं है। दल और नेता उसे बार बार ठग लेंगे ये भी संभव नहीं लगता। कह सकते हैं जो एक कहावत है कांठ की हांडी बार – बार नहीं चढ़ती। अब जनता और कार्यकर्ता इस कहावत को अमल में लाता हुआ दिख रहा है।