अंतरात्मा तक पहुँची सिक्कों की खनक………

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ज़हीर अंसारी
कर्नाटक में जो घटनाक्रम घटित हुआ उसने कई कई सवाल स्वाभाविक रूप में खड़े कर दिए। अवाम के मन यह बात आने लगी कि मुल्क की सियासत कहाँ जा रही है। सत्ता पाने के लिए दलों का अपना कोई नैतिक सिद्धांत न रहा। अब तो हालात यह बन रहे हैं कि सत्ता क़ब्ज़ाने किसी भी हद तक जाया जा सकता है या गिरा जा सकता है।

पहले सुना करते थे यूपी और बिहार में किसी की प्रापर्टी हथियाने के लिए बड़ा गुंडा दम मारता था उसे बचाने के लिए दो-तीन छोटे गुंडे एकजुट हो जाते थे। दोनों का मक़सद सिर्फ़ एक होता था जिसने प्रापर्टी बनाई है उससे चौथ वसूली करना। अब यही फ़ार्मूला सत्ता क़ब्ज़ाने में इस्तेमाल किया जा रहा है। सत्ता के ज़रिए जनता की गाढ़ी कमाई की लूट की जा सके।

बात कांग्रेस या भाजपा का नहीं है, बात इनके राजनैतिक चरित्र का है। कांग्रेस अपने अहम की ख़ातिर क्षेत्रीय दलों की सरकार को अलसेट देती थी या गिरा देती थी। कांग्रेस का यह रवैया जनता को पसंद नहीं आता था और धीरे-धीरे जनता ने कांग्रेस को ठिकाने पर पहुँचा दिया। कांग्रेस की जितनी माटिया पलीत होनी थी, पहले ही हो चुकी। कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्वीकार की गई भाजपा अपने अहंकार के चलते स्वयं अपनी छवि को विवादास्पद बना लिया है। भाजपा के चाल, चरित्र और चेहरा पर सवाल दागे जाने लगे।

गोवा, मणिपुर और मेघालय में सरकार बनाने भाजपा ने जो खेल खुलेआम खेला, उसे अवाम ने गंभीरता से नहीं लिया। बात आई और गई हो गई लेकिन कर्नाटक की उठा-पटक ने पुरानी यादें ताज़ा कर दी। अब यह पूछा जाने लगा कि इन राज्यों में विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त कैसे हुई। विधायक हो, सांसद हो या फिर कोई नेता हो, बिना लोभ-लालच के अपना ज़मीर नहीं बेचता। इनकी फ़ितरत होती है, ये मुफ़्त में अपना बुखार भी किसी को नहीं देते।

कर्नाटक में जिस तरह करोड़ों रुपए के लेन-देन की बात चली वह लोकतंत्र को झझकोरने के लिए काफ़ी है। यह अलग बात है कि सौदेबाज़ी समयाभाव के कारण नहीं हो सकी, लेकिन यह साबित हो गया कि मवेशियों की तर्ज़ पर जनप्रतिनिधियों की भी बोली लगने लगी। इसलिए अब यह जानना लाज़िमी हो गया है कि गोवा, मेघालय और मणिपुर के विधायक समर्थन देने के लिए कितने में बिके। इन राज्यों में ओपन ख़रीद-फ़रोख़्त हुई थी। क्या उसकी जाँच नहीं होनी चाहिए? किस विधायक ने अपनी नैतिकता कितने में बेची, क्या यह मालूम नहीं होना चाहिए?

देश की संवैधानिक संस्थाओं की ज़िम्मेदारी भी बनती है कि विधायकों की नीलामी पर स्वमेव संज्ञान ले। यह पता लगाया जाना ज़रूरी है कि बिकाऊ नेताओं ने कैशलेस लेनदेन किया है या कैश या संपत्तियाँ लेकर।

नेताओं का क्या है अब उनकी अंतरात्मा से नैतिकता की आवाज़ नहीं आती बल्कि अब वे सोने के सिक्कों की खनक पर यक़ीन करते हैं।