राहुल गांधी की आस्था पर प्रश्नचिन्ह क्यों..?

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ज़हीर अंसारी
कांग्रेस के भावी अध्यक्ष राहुल गांधी का भगवान सोमनाथ के मंदिर में जाना और पूजन-अर्चन करना भी राजनैतिक विवाद का कारण बन गया। सवाल उठा कि राहुल हिन्दू हैं या नहीं। अगर हैं तो कैसे? यह सवाल तो बड़ा गूढ़ है। यह तो कोई साबित नहीं कर सकता कि कौन हिन्दू है, कौन मुसलमान है, कौन ईसाई और कौन सिख। जो जिस परिवार में जन्म लेता है, वो वैसा माना जाता है। नाम, आचरण और आराधना पद्धति से मान लिया जाता है कि कौन किस धर्म का अनुयायी है। परमात्मा ने इंसानों के हाथ ऐसा कोई यन्त्र नहीं दिया जिससे वो परमात्मा निर्मित मानव का हिन्दू-मुस्लिम, सिख-ईसाई या किसी अन्य धर्म के धर्मावलम्बियों का प्रमाणीकरण कर सके। वैज्ञानिकों ने अलबत्ता नस्ल जानने की प्रणाली का अविष्कार कर लिया है जिसे डीएनए तकनीक कहा जाता है।

जहाँ तक राहुल गांधी के धर्म मसला है तो इसका प्रमाणीकरण कौन करेगा और कैसे करेगा। हृदय के भाव और आस्था-विश्वास परखने वाला यंत्र कहाँ से आएगा। मोटे तौर पर मान लिया जाना चाहिए कि राहुल भी वरुण गांधी की तरह सनातन धर्म में आस्था रखते हैं। दोनों के पिता सगे भाई थे और दादी ब्राह्मण थीं। यह बात अलह्दा है कि दादा जी पारसी थे। पारसी सूर्यदेव के सबसे बड़े उपासक होते हैं। सनातनी भी सूर्य को भगवान मानते हैं। उनका पूजन अर्चन करते हैं।

चूँकि इंदिरा जी, संजय गांधी और राजीव गांधी तीनों का विवाह और अंतिम संस्कार सनातन रीति-नीति से हुआ था। इसलिए इनकी संताने भी सनातनी ही कहलाएँगी।

यद्यपि राहुल गांधी ने छाती ठोंक कर कहा कि वे ‘भगवान शिव’ के उपासक हैं। तो मान लिया जाना चाहिए। सृष्टि निर्माता ‘भगवान शिव’ जो अर्धनारीश्वर भी हैं, ने नारी और पुरुष ही बनाए हैं इसलिए राहुल को भी ‘शिव’ निर्मित मानव मानने में क्या हर्ज है। अब राहुल जनेऊ अंदर से पहने या कोट के ऊपर से, क्या फ़र्क़ पड़ता है।

इसलिए जब तक आस्था, निष्ठा, ईमानदारी के मापने वाले मापक यंत्र का अविष्कार नहीं हो जाता जब तक किसी को धर्म के नाम पर नहीं छीलना चाहिए। वैसे भी धर्म निजी आस्था का मामला है। धर्म ग्रंथों में बताया गया है धारणा ही धर्म है।