प्रकृति का बिगड़ता संतुलन

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0 चैतन्य भट्ट 0

देश के उत्तराखंड इलाके में आई विनाशकारी बारिश ने जो कहर बरपाया है उसमें सैकड़ों लोगों की जानें चली गई और हजारों लोग अब भी वहां फंसे हुये है वहीं दूसरी ओर ‘क्लाईमेट एक्शन ट्रेकर ’’ की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि बर्ष 2100 तक पृथ्वी का तापमान चार डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जायेगा यद्यपि संयुक्त राष्ट संघ की जलवायु परिवर्तन से संबंधित समीति ने तापमान प्रक्रिया वृद्धि को हर शताब्दी में अधिकतम दो डिग्री सेल्सियस रखने का लक्ष्य तय किया है परन्तु वास्तविकता ये है कि मौसम के बदलते मिजाज को समझने में हर कोई अपने आप को असमर्थ महसूस कर रहा है और यदि ये कहा जाये कि मौसम और प्रकृति के इस बिगड़ते संतुलन के समूची मानव जाति ही दोषी है तो न होगा
पिछले कुछ बरसों में मौसम का मिजाज जिस तेजी से बदला है उससे सारा पर्यावरण ही गड़बड़ा गया है कहीं भीषण बारिश है बाढ़ के नजारे है तो कहीं सूखा पड़ रहा है गरमी में बारिश रौद्र रूप दिखा रही है क्या कारण है कि मौसम धरती दोनों का मिजाज साल दर साल बदलता जा रहा है क्यों ग्लेष्यिर पिघलते जा रहे हैं? क्यों समुद्र के जलस्तर में बढोतरी हो रही है क्यों तरह तरह के चक्रवात इंसानों की जान के दुष्मन बनते जा रहे है? क्यों बारिश के मौसम में बारिश नहीं हो रही है इन सबका एक ही उत्तर है ग्वोबल वार्मिग’’
‘‘ग्लोबल वार्मिग’’ का सीधा शाब्दिक अर्थ है सामान्य तापमान का बढ़ना, सामान्य तापमान की शुरूआत बीसवी सदी से आरंभ हुई ‘‘इंटरगवर्नमेन्ट पैनल आफ क्लाईमेट चेन्ज’’ नामक संस्था के मुताबिक समूचे विष्व में इंसानों की बढती गतिविधियों और उद्योग क्रान्ति के चलते ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बहुत तेजी से बढ़ा जिसका परिणाम ये हुआ कि धरती और समुद्र के तापमान में पिछले कुछ सालों मेंकाफी तेजी से बढोतरी हो गई. ‘‘वल्र्ड मेटराजीकल रिसर्च यूनिट’’ ने जो शोध किया उस शोध केआधार पर उसने बताया कि 1988 से लेकर अभी तक का सबसे गर्म माल 2005 रहा इस शोध में यह तथ्य भी सामने आया कि धरती का तापमान समुद्र के तापमान की तुलना में इसलिये ज्यादा तेजी से बढता है क्योंकि समुद्र की गरमी का काफी सारा हिस्सा भाप बनकर उड़ जाता है इसी शोध में यह बात भी सामने आई कि धरती का तापमान 1940 से 1980 के बीच यानी कुल चालीस सालों में जितना बढा उतना ही तापमान 1999 से लेकर 2008 तक यानी कुल जमा नौ सालों में बढ गया है जो एक बेहद चिन्ताजनक तथ्य है.
धरती के तापमान के बढने के पीछे सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका है ‘‘ग्रीन हाउस गैसेस’’ की दरअसल इक्कीसवी सदी की शुरूआत में समूचे विश्व में विशेषकर विकासषील देषों में जिस तरह से ओद्योगीकरण की शुरुआत हुई और विकसित देशों की नकल के चलते वाहनों की संख्या में इजाफा हुआ है उसने धरती के तापमान को बढाने के कोई कसर बाकी नही रखी. उद्योगों के नाम पर वृक्षों का विनाष कर दिया गया बस्तियां बसाने के लिये जंगल के जंगल साफ हो गये रही सही कसर भूमि माफियाओं, राजनेताओं और लकडी के तस्करों ने पूरी कर दी. आज से बीस बरस पहले जितने जंगल केवल मध्यप्रदेष में ही थे उनमेंसे आधे न जाने कहां गायब हो गये इसका पता सिर्फ उनको ही है जिन्होंने अपने स्वार्थ के कारण ये जंगल काट डाले. एक अध्ययन में यह तथ्य भी सामने आया है कि वनों के विनाश से प्रतिबर्ष दो बिलियन टन कार्बन डाईआक्साइड वातावरण में बढ रही है. धरती के बढ रहे तापमान का असर ‘‘हिम ग्लेषियरों’’ पर पड रहा है वे लगातार पिघलते जा रहे हैं और इनके पिघलने के कारण समुद्र कर जल स्तर बढने लगा है जो सुनामी जैसी घटनाओं को खुले आम आमंत्रण दे रहा है एक अध्ययन ये कहता है कि यदि समुद्र का जलस्तर इसी तरह बढता गया तो हिन्द महासागर में स्थित द्वीपीय देषों के अस्तित्व पर पूरी तरह संकट छा सकता है संयुक्त राष्ट्र संघ ने ये भी चेतावनी दी है कि 2021 तक समुद्र के जल स्तर में 18 से 60 सेन्टी मीटर की बढोतरी हो सकती है
भले ही विकसित देश अपनी ओर से धरती के तापमान को कम करने के लिये कोई प्रयास न कर रहे हो पर यदि विष्व के दूसरे देश ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को समझ कर कुछ ऐसे उपाय आरंभ कर दे जो धरती के बढ़ते तापमान को और ज्यादा बढने से रोक दे तो समस्या का काफी कुछ हल निकल सकता है क्योंकि यदि धरती में तपन ज्यादा होगी तो धरती का पानी भाप बनकर उड़ जायेगा धरती की तपन ज्यादा होगी तो पानी का ज्यादा से ज्यादा उपयोग होगा और जब ज्यादा पानी की जरूरत होगी तो उसे धरती के भीतर से ही खींचना होगा जिसके कारण जल स्तर नीचे चला जायेगा जो पानी का विकराल संकट पैदा कर देगा.
धरती के साल दर साल बढ रहे तापमान के खतरों को अब गंभीरता से लेना होगा क्योंकि पर्यावरण वैज्ञानिकों का शोध बार बार इस बात की ओर इंगित कर रहा है कि यदि इसकी ओर से आंखे मूंद ली गई तो इसका परिणाम बेहद भयावह हो सकता है विकास के लिये औद्योगीकरण जरूरी है पर इस औद्योगीकरण के साथ साथ उतने ही स्तर पर वृक्षारोपण किया जाये. विद्युत उत्त्पादन के लिये पावर प्लांटों की बजाय पवनचक्कियों को प्राथमिकता दी जाये ज्यादा से ज्यादा सोलर एनर्जी का प्रयोग किया जाये, निजी वाहनों के उपयोग की बजाय सार्वजनिक वाहनों को प्रयोग किया जाये जैसा चीन ने किया है चीन जैसे देष के लोगों ने वाहनों की बजाय साइकिल का उपयोग शुरू कर सारे विश्व को एक संदेष दिया है कि यदि कार्बन डाईआक्साईड के खतरे से बचना है तो वाहनों का मोह छोडना होगा. पानी को बचाने के लिये ‘‘वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम’’ को पूरे देश में कड़ाई से लागू कराना होगा क्योंकि करोडो गैलन पानी बरसात में बेकार बह जाता है यदि वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के माध्यम से यह पानी वापस धरती के भीतर चला जाये तो पानी के घटते जलस्तर की समस्या आसानी से निपट सकती है उत्तरकाशी में आये विनाशकरी बारिश के पीछे ये कारण बताया जा रहा है कि लोगों ने नदियों के किनारे होटल तान दिये लिससे पानी के बहाब का रास्ता बंदहो गया यही कारण है कि जब बारिश ने अपना रौद्र रूप दिखाया तो बड़ी बड़ी इमारतें तिनकों की तरह धाराशायी हो गईं जरूरत इस बात की है कि यदि इंसान चाहता है कि मौसम अपने हिसाब से चले पारा इतनी तेजी से बढ़े बाढ़ न आये इंसानी जाने न जायें तो उन्हें इन तमाम बातों को अंगीकार करना ही होगा