शायद इसलिए महात्मा गांधी ने नहीं संभाली थी देश की बागडोर……..

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जहीर अंसारी

ओशो ने अस्सी के दशक में एक ऐसा प्रवचन दिया था जिसके मायने अब मुझे समझ आ रहे हैं। मैंने कोई एक दशक पहले ‘भारत के जलते प्रश्न’ नामक पुस्तक में ओशो की अमृतवाणी पढ़ी थी तब से लेकर अब तक जब भी राजनीति की उच्च स्तरीय चर्चा होती है तो उनकी रेखांकित की गई बातें स्वमेव मेरे कानों में गूँजने लगती है। ओशो ने अपने उस प्रवचन में बहुतेरे प्रश्न उठाए और उसके उत्तर भी दिए। उन्होंने कहा था महात्मा गांधी आज़ादी के बाद देश की बागडोर न संभाल उचित नहीं किया। जवाहरलाल नेहरू को स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री बनाकर अविस्मरणीय भूल कर दी। ओशो का यह कहने का आशय था कि नेहरु पश्चिमवादी ख़यालात के हैं उनमें धर्म और अध्यात्म का अभाव है। जिस व्यक्ति में धर्म और अध्यात्म का अभाव होगा वह राजधर्म नहीं निभा सकता। गाँधी जी में इन दोनों चीज़ों की प्रचुरता थी। गाँधी जी धर्म, अध्यात्म, मानवता, सेवा, देशभक्ति, समानता भाव से ओतप्रोत थे, लिहाज़ा गांधी जी को आज़ाद भारत का पहला प्रधानमंत्री होना चाहिए था। ओशो के इस तर्क से मैं अब तक सहमत था। मैं भी यही सोचता था कि धार्मिक व्यक्ति में समभाव, राष्ट्रनिष्ठा, ईमानदारी कूट-कूट कर भरी होती है। ऐसा व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म का हो, धर्म में बताए गए तौर-तरीक़ों के आधार पर शासन करता है।

लेकिन मेरी यह धारणा यूपी की गद्दी पर गोरखनाथ पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी के बाद बदल गई। सत्ता-सुंदरी के जिस मिज़ाज को गांधी जी अस्सी बरस पहले भाँप गए थे उस मिज़ाज को पकड़ने में योगी चूक गए। गांधी जी ने कभी मोक्ष के लिए धर्म का रास्ता इख़्तियार नहीं किया था। वो तो सूट-बूट वाले बैरिस्टर थे। दक्षिण अफ़्रीका की एक घटना ने उनके अंदर का सोया हुआ इंसान जगा दिया। भारत लौट जो उन्होंने किया उसे दोहराने की ज़रूरत नहीं है। जैसे-जैसे देश स्वतंत्रा की ओर अग्रसर होता रहा वैसे गांधी जी मोह-माया, अपने-पराए, लाभ-हानि के गणित से आज़ाद होते गए। वे संतत्व को प्राप्त हो गए थे, तभी तो उन्होंने भारत जैसे विशाल राष्ट्र का प्रधानमंत्री बनने का भाव तक नहीं लाए। गांधी जी अगर प्रधानमंत्री बनना चाहते तो किसी की मजाल थी जो उन्हें रोक सकता। शायद गांधी जी को सत्ता रूपी सुंदरी के चरित्र को बख़ूबी समझते थे, लेकिन यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सत्ता सुंदरी के मोहफांस में फँस गए। महंत परंपरा की जनक गोरखनाथ पीठ के प्रमुख महंत, महंत अवैद्यनाथ के परम शिष्य अजय सिंह विस्ट को उन्होंने महंत योगी आदित्यनाथ का नाम दिया और मठ का मुखिया बनाया। सत्य निष्ठा, ईमानदारी के साथ सनातन धर्म की रक्षा का संकल्प दिया। सनातन धर्म के मार्ग पर चलकर मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सुझाया। पर योगी ने ये क्या किया, एक झटके में बचपन से लेकर अब तक पढ़े धर्म के सारे पाठ बिसार दिए। चुनाव के पहले योगी ने यूपी की 22 करोड़ जनता के सामने संकल्प लिया था कि यूपी में एक भी बूचडखाने नहीं चलने देंगे। सत्ता के सिंहासन पर बैठते ही मठ व धर्मग्रंथो से प्राप्त शिक्षा विस्मृत कर दी। अब बूचडखाना चलाने वालों से समझौते करने लगे। अब बचड़खाने वैध और अवैध हो गए, क़त्ल तो क़त्ल होता। सिर्फ़ राज्य के राजस्व व संतुलन की राजनीति के लिए संकल्प से फिरना अनैतिक ही माना जाएगा। ऐसा आचरण किसी महंत को शोभा नहीं देता। सनातन परंपरा के अनुसार शंकराचार्य, पिठाधीश्वर, महंत और साधु-संत में ईश्वर का वास माना जाता है। इसलिए महंत का यह रवैया आमजन के गले नहीं उतर रहा है।
ऐसा ही आचरण साध्वी उमा भारती का भी रहा था। मध्य प्रदेश की जनता को साध्वी ने भी सन 2003 में सब्ज़बाग़ दिखाया था कि मध्यप्रदेश में पशु वध पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाएगा। तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को घोटालों के आरोप में जेल भेजा जाएगा। लेकिन राजगद्दी पर विराजमान होने के उपरांत साध्वी अपना संकल्प पूरा न कर सकी। अलबत्ता गौ वंश हत्या पर कड़ा क़ानून ज़रूर बना गईं।
कहने का आशय यह है कि शायद गांधी जी की अंतरात्मा ने उन्हें भावी परिणामों के बारे में सचेत कर दिया था। यदि वे भारत के पीएम बन जाते तो वे भी महंत और साध्वी की श्रेणी में आ जाते। संतत्व के प्रति जो आस्था जनमानस की होती है वह राजनेता के लिए कदापि नहीं होती है।
जयहिंद
पत्रकार जहीर अंसारी की फेसबुक वाल से साभार