इकलौता बचा है चूहे और सांप पकड़ने में माहिर यह शख्स

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बेंगलुरु = चूहे और सांप पकड़ने की कला में दक्ष दक्षिण भारत की इरुला जनजाति पिछले सप्ताह काफी चर्चा में आ गई थी जब इस जनजाति के दो लोगों को अमेरिका के फ्लोरिडा में बर्मी अजगरों को पकड़ने के लिए बुलाया गया। फ्लोरिडा के जंगलों में इन अजगरों ने छोटे स्तनधारी प्राणियों को अपना निवाला बनाकर कुछ प्रजातियों को विलुप्त होने के कगार पर पहुंचा दिया था। जब स्थानीय सांपों को पकड़ने में असफल रहे तो तमिलनाडु के इरुला जनजाति के दो लोगों को मदद के लिए बुलाया गया। वॉशिंगटन पोस्ट की खबर के मुताबिक, दो सप्ताह से कम समय के भीतर उन्होंने 13 सांप पकड़ लिए हैं।
इरुला लोग तमिलनाडु के देनाकनिकोट्टई के नजदीक जंगली इलाकों में रहते हैं लेकिन वे कन्नड़ भी अच्छे से बोलना जानते हैं। इन रैट कैचर्स के बारे बेंगलुरु मिरर ने विस्तृत जानकारी जुटाई। कामगिरि में जब वे इनकी तलाश में पहुंचे तो पता चला कि वहां पहले कई रैट-कैचर्स थे लेकिन अब वे नौकरी की तलाश में बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों की तरफ कूच कर चुके हैं।
कामगिरि में एक बुजुर्ग व्यक्ति ने बताया कि वह एक चूहे पकड़ने वाले बचे इकलौते शख्स को जानता है लेकिन वह इरुला नहीं है। रैट-कैचर एरेना ने बेंगलुरु मिरर को बताया कि वह चूहे पकड़ने की कला विलुप्त होने से दुखी हैं। एरेना ने बताया, ‘मैंने अपने पिता और दादा से चूहे पकड़ना सीखा था। चूहे का बिल देखकर ही मैं चूहे की प्रजाति पहचान जाता था। अगर सफेद चूहा होता था तो मैं अपने साथ कुछ लोगों को ले जाता था और एक को छोड़कर बाकी सबको बिल के पास खड़ा कर देता था। मेरे पास एक ऐसा बर्तन होता था जिसके ऊपरी हिस्से पर छोटे-छोटे छेद होते थे। हम कोकोनट शेल्स को जलाकर बिल के पास रख देते थे। इसमें करीब 10-15 चूहे मर जाते थे। मैं उन चूहों को घर ले आता था और मेरी पत्नी स्वादिष्ट डिश तैयार करती थी।’
60 साल के एरेना हालांकि एक चेतावनी भी देते हैं, ‘सभी चूहों का मांस खाने लायक नहीं होता है। कुछ बड़े चूहे इतने जहरीले होते हैं कि उन्हें खाने से मौत हो सकती है। कुछ चूहे मैदानी इलाकों में पाए जाते हैं। मुझे किसानों फसल बर्बाद करने वाले चूहों से निजात दिलाने के लिए बुलाते हैं। मैं उनके खेतों में जाता हूं और चूहे पकड़ता हूं। इस काम से न केवल किसानों के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ जाती है बल्कि मुझे भी इन चूहों के स्वाद से मजा आता है।’
एरेना कभी स्कूल नहीं गए। वह अपनी जिंदगी में हजारों चूहें पकड़ चुके हैं। आस-पास के सौ गांवों में वह अकेले रैट-कैचर बचे हैं। उन्हें पता है कि उनके जाने के बाद यह कला भी लुप्त हो जाएगी लेकिन वह नई पीढ़ी को इसे सिखाना नहीं चाहते हैं। उनके पांचों बच्चे बेंगलुरु में काम करते हैं।इन्हें टोडा इडियुरु भी पुकारा जाता है। टोडा चूहे की एक प्रजाति होती है। लंबी नाक वाले मूग ली चूहे की प्रजाति भी काफी पाई जाती है। टोडा चूहे बिलों में अनाज इकठ्ठा करके रखते हैं और 20-30 के झुंड में पाए जाते हैं। चूहे पकड़ने की कला में माहिर रैट-कैचर्स को इन चूहों को पकड़ने में बड़ा मजा आता है।
एरेना से जब पूछा गया कि क्या वह शहरों में अपनी इस कला से पैसे कमाना चाहेंगे तो इस पर एरेना ने जवाब दिया कि वह पैसों के लिए काम नहीं करते हैं। जबकि उन्हें अच्छे से पता है कि शहरों में फसल-बर्बादी रोकने के लिए उनकी कला बहुत काम की है।
choohaएरेना कहते हैं कि अब तकनीक के इस जमाने में इस कला के लिए शायद ही कोई स्थान बचा हो।