क्या शिवराज सिंह भी भयभीत हो गये हैं

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– चैतन्य भट्ट –
किसी सेना का सेनापति जिसके बल पर उसकी सेना युद्ध जीतने के समने देख रही हो जब वो ही दुश्मनो से भयभीत होकर पलायन करने का मन बना ले या उसे अपनी जीत के प्रति संदेह होने लगे तब उस सेना का क्या होगा? लगभग ऐसा ही कुछ मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों में शिवराज सिंह के विदिशा से भी चुनाव लड़ने की घोषणा से सामने आ रहा है। एक नेता दो विधानसभाओं से इसलिये चुनाव लड़ता है क्योंकि उसके मन में इस बात की शंका रहती है कि कहीं ऐसा न हो वो चुनाव हार जाये पर दो विधानसभाओं से चुनाव लड़ने से उसे इस बात का भरोसा रहता है कि किसी एक क्षेत्र से तो उसे विजयश्री मिल ही जायेगी तो क्या यह मान लिया जाये कि जैसे जैसे चुनाव के मतदान की तारीखें पास आ रहीे है शिवराज सिंह का आत्मविष्वास भी कमजोर पड़ता जा रहा है।
आज ही अखबारों के माध्यम से ये जानकारी सामने आई है कि अब प्रदेश के मुख्यमंत्री सिवराज सिंह बुदनी के अलावा विदिशा से भी चुनाव लड़ेंगे पार्टी द्वारा इसके पीछे से तर्क दिया जा रहा है कि चूंकि वहां राधजी कांड को लेकर विवाद की स्थिति है इसलिये इस विवाद का निबटारा करने के लिये शिवराज सिंह को विदिषा से भी चुनाव के मैदान में उतारा जा रहा है ये बात गले से नीचे नहीं उतरती क्योंकि यदि शिवराज सिंह दोनो ही जगहों से चुनाव जीत जाते हैं तो जाहिर है कि उन्हें एक सीट खाली करनी होगी और वो विदिशा ही होगी उस वक्त एक बार फिर टिकट को लेकर विवाद की स्थिति बनेगी तब क्या होगा? इसका जबाब किसी नेता के पास नहीं है दरअसल जब से कांगेंस ने सुरेश पचैरी को भोजपुर विधानसभा क्षेत्र से अपना उम्मीदवार बनाया है तब से ही भाजपा के माथे पर बल पड़ गये थे क्योंकि उसे इस बात की कतई उम्मीद नहीें थीे कि कांग्रेस सुरेश पचैरी जैसे नेता कोे विधानसभा चुनाव में उतार देगी सुरेश पचोरी की कांग्रेस में काफी अहमियत है और वे प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं ऐसे में भाजपा को लगा कि कहीं ऐसा न हो कि कांग्रेस शिवराज सिंह के खिलाफ बुदनी से किसी बडे नेता को चुनाव मैदान में ऐन वक्त पर उतार दे ऐसी स्थिति मे मुकाबला कौन सी करवट ले ले ये कहना मुष्किल हो सकता है। यद्यपि ये एक कयास है पर इससे बचने के लिये ही पार्टी ने एक दूसरी चाल चलने का निर्णय लेकर शिवराज सिंह को एक और विधानसभा क्षेत्र विदिशा से मैदान में उतारने का निर्णय ले लिया ताकि उनकी जीत सुनिष्चित की जा सके पर सवाल ये है कि जिस महारथी के दम पर पूरी भाजपा मध्यप्रदेश में चुनाव लड़ रही है क्या उसे अपने आप पर इतना भी भरोसा नहीं है कि वो जहां से भी लडेगा वहीं से जीतेगा। आज से तीन या चार महीने पहले तक पार्टी के भीतर और शिवराज सिंह में जो आत्म विश्वास दिखाई दे रहा था वह चुनाव पास आते आते क्यों कम होता जा रहा है विभिन्न सर्वे भी प्रदेश में भाजपा की सीटें कम करते जा रहे है यह बात तो लगभग निष्चित है कि प्रदेश में फिर भाजपा ही सरकार बनायेगी पर जिसके बल पर सरकार बनने वाली हो यदि वो ही अपनी जीत के प्रति सशंकित होकर दो दो विधानसभाओं से चुनाव लडे़ तो बाकियों का क्या होगा ये मतदाता और पार्टी दोनों के लिये ही सोचने वाली बात है।