मीडिया अपने गरेबां में भी तो झांके

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– चैतन्य भट्ट –

इन दिनों देष में चल रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ मीडिया बेहद चौकस है चाहे अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन हो, अरविंद केजरीवाल की मुहिम हो या फिर बाबा रामदेव की देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने कीे अलख। मीडिया में इन सारी बातों का जबरदस्त कवरेज हो रहा है इन तमाम खबरों और कवरेज के माध्यम से आम दर्शक और पाठक को ये संदेश देने की कोशिश की जा रही हैै कि इस देश का मीडिया भ्रष्टाचार के पूरी तरह से खिलाफ है पर जानने वाले समझते हैं कि ऐसे आन्देालनों को कवरेज देना देना मीडिया की मजबूरी है क्योंकि जिन लोगों के पीछे लाखों लोग बिना किसी स्वार्थ के आ रहे हों उनसे स्वयंस्फूर्त जुड़ रहे हों उसकी अनदेखी करना मीडिया के लिये मुश्किल का काम है। वैसे मीडिया को एक मुददा चाहिये होता है जो उन्हें दिन भर का मसाला दे दे. मीडिया जिस तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ खबरें देता है उससे मीडिया के भ्रष्टाचार मुक्त होंने की तस्वीर बनती है पर क्या यह सचाई है ? यदि मीडिया वाले दिल पर हाथ रखकर सच कहें तो इसका उत्तर न में ही होगा. भ्रष्टाचार क्या सिर्फ किसी से रूपया लेना है? भ्रष्टाचार के तो हजारों रंग हैं आप पत्रकार हैं और किसी बिना लायसेंस में पकड़े गये व्यक्ति को अपने प्रभाव से यातायात पुलिस की गिरफत से छुड़वा देते हैं तो ये भी एक तरह का भ्रष्टाचार ही है। अपने अखबार का भय दिखाकर सरकारों से कौडियों के दाम जमीन ले लेना फिर उसका कमर्शिअल उपयोग कर उससे करोड़ों रूपये बनाना ये भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में ही आता है चनुावों के दौरान पैसे लेकर किसी एक पार्टी या प्रत्याशी के पक्ष में खबरे छापना और मतदाताओं को भरमाना भी भ्रष्टाचार है। अखबारों कीे आड़ में सरकारों को धमकाना और उनसे अपने धधें के लिये सुविधायें लेना ये भी तो भ्रष्टाचार ही है। अपने पत्रकारों को बंधुआ मजदूर बनाकर उन्हें कभी भी सेवा से पृथक कर देना यह भी किसी व्यक्ति के साथ किया गया मानसिक भ्रष्टाचार है विज्ञापन न देने वाले संस्थानों के खिलाफ समाचारों की सीरीज छापना और सौदा तय होंने के बाद उसकी तारीफों के पुल बांधना ये भी भ्रष्टाचार का एक रूप ही तो है
मीडिया देश की जनता को एक दिशा देता है उसका काम ‘‘वाॅच डाग’’ का है कि वह समाज में फैली बुराईयों असमानताओं को उजागर कर मजलूम और पीडि़त व्यक्ति की आवाज को बुलंद करे पर कितने चैनल या अखबार है जो अपने इस पत्रकारीय धर्म को निभा रहे है शायद उंगलियों पर इनकी संख्या गिनी जा सकती है अखबारों कीे आड़ में दूसरे धंधे चलाना यह तो एक परिपाटी बन चुकी है अब पत्रकार, पत्रकार नही होता वह एक नौकर के रूप में अखबारों में काम करता है क्योंकि उसके हाथ में कलम तो होती है पर उसे लिखना क्या है यह अखबार का मलिक तय करता है जो पत्रकार या संपादक मालिकों की इस तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाते है या अपनी मतभिन्नता प्रकट करते हैं वे दूसरे ही दिन अखबार या चैनल के दफतर के बाहर खड़े नजर आतें हैं दूसरों के भ्रष्टाचार को बड़े बड़े हरफों में छापने और दिखाने वाले मीडिया को पहले अपने गरेबां में झांकना होगा कि वे भी उसी थैली के चटटे बटटे है यदि लोकपाल बिल के घेरे में अधिकारी नेता, न्यायपालिका, सांसद, मंत्री सब आ रहे है तो मीडिया को उससे छूट क्यों? होना तो ये चाहिये कि यदि सराकर लोकपाल बिल को बना देती है या फिर अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल को अस्तित्व में ले आती है तो इसके घेरे में मीडिया भी आये क्योंकि अभी मीडिया की शिकायतों के लिये जो भी मंच बने हैं वे बिना नाखूनो वाले बूढ़े शेर है जिकी चिन्ता कोई मीडिया वाला नहीं करता चाहे वो प्रेस काउन्सिल आफ इंडिया हो या फिर कोई दूसरी संस्था. यदि मीडिया वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ है उसे लगता है कि भ्रष्टाचार देश को खोखला कर रहा है तो उसे सबसे पहले अपने घर में ही झाड़ू लगाने की शुरूआत करना होगी और ये दिखाना होगा कि उसकी कथनी और करनी में कोइ फर्क नहीं