उफ् ! डेथ वारंट जारी करवाने के लिए भी नाक रगड़ने की यह लाचारी…

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अजय बोकिल

एक बेटी के साथ निर्मम बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी जाए, बलात्कारियों को फांसी की सजा भी सुना दी जाए लेकिन फांसी को क्रियान्वित करने के लिए बेटी की मां को अदालत में रो-रो कर गुहार करनी पड़े, यह शायद हमारे देश में ही संभव है। अभी भी कोई गारंटी से नहीं कह सकता कि दोषी कब फांसी पर लटकाए जाएंगे। एक बेहद नृशंस मामले में हम इंसाफ के साथ कानूनी खामियों की जो आंख मिचौली देख रहे हैं, वह क्षुब्ध करने वाली है।
निर्भया के साथ इस सभ्य समाज ने जो कुछ किया, उसे दोहराने की जरूरत इसलिए नहीं है, क्योंकि यह सिलसिला अनवरत जारी है। निर्भया के बाद हमने तेलंगाना में एक वेटरनरी डाॅक्टर के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद उसे जिंदा जलाने का वहशी कृत्य देखा। बिल्कुल ताजा और मन को विचलित करने देने वाला मामला महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ, जहां एक वहशी प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को सरे राह जिंदा भून कर मार डाला। वह युवती सिर्फ अपनी आंखों से अपनी मौत के साए को बढ़ते देखती रही। कुल मिलाकर महिलाअों के प्रति पुरूषों की पाशविकता का यह सिलसिला निर्भया केस के सभी आरोपियों को फांसी देने की सजा के बावजूद रत्ती भर भी कम नहीं हुआ है। इससे यह संदेश जा रहा है कि कड़े से कड़े कानून का भी समाज की विकृत मानसिकता पर कोई असर नहीं होता। इंसान के भेस में रह रहे जानवर कभी मनुष्य नहीं हो सकते। हालांकि ऐसे लोगों को सुधारने के भी तर्क हैं, लेकिन उससे कहीं कोई उल्लेखनीय फर्क पड़ा हो, ऐसा नहीं लगता।
निर्भया केस तो इस देश के उन पाशविक कृत्यों में है, जिसने देश का नरेटिव बदलने की कोशिश की। नृशंस बलात्कार जैसे मामलों को स्त्री अस्मिता से जोड़कर देखा गया तथा ऐसे प्रकरणों में सबसे बड़ी सजा यानी मृत्युदंड का प्रावधान किया गया। माना गया कि कम से कम मौत का भय तो शैतानो को बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध करने से रोकेगा। लेकिन वैसा कुछ नहीं होता दिख रहा। उल्टे अपराधियों को अंतिम सांस तक बचाने और कानून को यथा संभव झांसा देने का विचित्र खेल खेला जा रहा है। ऐसा खेल जिसके आगे सुप्रीम कोर्ट भी असहाय दिख रहा है।
संजीदगी से सोचें कि क्या अजब स्थिति है। एक तरफ जल्लाद फांसी का फंदा तैयार कर बेसब्री से इंतजार कर रहा है कि वह इंसाफ को उसकी परिणति तक जल्दी से जल्दी कैसे पहुंचाए। निचली अदालत से डेथ वारंट जारी होने के बाद किसी न किसी कानूनी पेंच के बाद रूक जाता है। निर्भया की मां हर बार सोचती है कि शायद इस बार वह उसकी स्वर्गीय बेटी को आंख में आंख मिलाकर जवाब दे सकेगी कि जिन नराधमो ने तेरे साथ पशुता की, उसे समाज ने सही सजा दे दी है। लेकिन जो हो रहा है, उसे समझना मुश्किल इसलिए है कि मृत्युदंड सुनाने के बाद भी उसकी पालना मृग मरीचिका साबित हो रही है। सुप्रीम कोर्ट फांसी की सजा पर मुहर लगा देती है, क्युरेटिव पिटीशन भी खारिज कर देती है। राष्ट्रपति दया याचिका निरस्त कर देते हैं, फिर भी फांसी होते-होते रूक जाती है, क्योंकि कोई कानूनी लेक्युना फिर कानून के औचित्य पर सवाल खड़े कर देता है। इसके बाद वही एबीसीडी नए सिरे से शुरू होती है। एक सिरे पर जाकर वह खत्म होने ही वाली होती है कि नई गिनती नए अंक के साथ शुरू हो जाती है। राष्ट्रपति, कानून, जज, पुलिस, वकील, जल्लाद व्यवस्था और जनभावना सब चाहते हैं कि दोषियों को फांसी हो लेकिन वही नहीं हो पाती। निर्भया की मां फिर आंचल पसार कर न्याय की भीख मांगने लगती है। तिस पर जज का यह कहना कि कानून ने दोषियों को कुछ अधिकार दे रखे हैं। उन्हें वे अधिकार लेने न दिए जाएं, तो फिर अन्याय होगा। अभी भी एक दोषी के पास दया याचिका का विकल्प बाकी है। यानी फिर नया वकील, नई दलील, नई अपील। इस पर निर्भया की मां का सवाल मार्मिक है कि क्या मेरे कोई अधिकार नहीं हैं?
इस सबका क्या अर्थ लगाया जाए? आखिर कानून किसके लिए है? किसके लिए है? सभ्य समाज के नियमन के लिए है या असभ्यों के संरक्षण के लिए है? यही समझना कठिन हो गया है? बेशक जल्दबाजी में किसी भी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए और मृत्युदंड तो नहीं ही ‍िदया जाना चाहिए, लेकिन जिन के खिलाफ हर पायदान पर आरोप सिद्ध हो चुका, जिनका मृत्युदंड अटल है, वो भी यमराज से आंख मिचौली का खेल पूरी ढिठाई से खेल रहे हैं या खेल पा रहे हैं, इसे आप क्या कहेंगे?
कुछ लोग नैतिक रूप से मृत्युदंड के खिलाफ हैं। मानवता के व्यापक दायरे में यह सोच सही हो सकती है कि सभ्य समाज अपराधी को सुधरने का अवसर दे। लेकिन इसका औचित्य तभी तक है, जब तक निर्भया आपकी बेटी नहीं है। एक नामी महिला वकील ने, जो खुद भी महिला अधिकारों के लिए लड़ती रही हैं, ने निर्भया की मां को निर्भया के बलात्कार करने वालों को माफ करने की जो नेक सलाह दी थी, उस पर यदि बड़े पैमाने पर अमल होने लगा तो इस देश में सिर्फ बलात्कारी अट्टहास करते मिलेंगे। और ऐसे में लोग हैदराबाद बलात्कार कांड के आरोपियों का पुलिस द्वारा एनकाउंटर किए जाने पर क्यों न तालियां बजाते मिलें?
संक्षेप में कहें तो कानून की पालना के लिए हम कानून का ही मजाक बनते देख रहे हैं और कोई कुछ कर नहीं पा रहा। एक आम इंसान के मन में यही सवाल उबाल खा रहा है कि कानून आखिर है किसके लिए? सभ्यों के लिए या अपराधियों के लिए? इंसानियत के संरक्षण के लिए या फिर शैतानियत को बचाने के लिए? जो कुछ हो रहा है, वह कानून के रिंग में हो रहे उस ‘तमाशे’ की तरह है, जिसमे पीडि़त की भूमिका महज तमाशबीन की है। सब को लग रहा है कि जो हो रहा है, वह सही नहीं है, लेकिन सबके हाथ बंधे हैं। उफ् इतनी लाचारी…!
यानी दोषियों के डेथ वारंट जारी करने के लिए एक पीडि़ता की मां को नाक रगड़नी पड़े, अदालत की सीढि़यों को आंसुअों से धोना पड़े और इसके बाद भी सिस्टम सिस्टम का हाथी अपनी चाल चलता मिले तो आप किसे दोषी ठहराएंगे? अपने आप को, समाज को, समाज व्यवस्था को अथवा उस कानून को जो आपकी सुरक्षा और इंसाफ के लिए ही बना है। निर्भया की मां के ये करूण शब्द देश की अदालतों में सदियों तक गूंजते रहेंगे कि आखिर मैं भी एक मां हूं। इंसाफ के लिए सात साल से इंतजार कर रही हूं। एक साल से सिर्फ इसी की कोशिश कर रही हूं कि मेरी बेटी के बलात्कारियों को फांसी पर चढ़ाने की (आखिरी) तारीख तो तय की जाए। मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूं। लेकिन लगता पूरा तंत्र धृतराष्ट्र की सभा में तब्दील हो गया है, ऐसी सभा में उस बेबस मां के आर्तनाद को कोई सुनेगा ?