भगवान राम के मुकाबिल हनुमान को खड़ा करने का सियासी एंगल.

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अजय बोकिल
दिल्ली राज्य के चुनाव नतीजों का यह नया और धार्मिक एंगल है। दिल्ली के मुख्ययमंत्री अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा चुनाव में अपनी आम आदमी पार्टी की लगातार दूसरी बार बंपर जीत का श्रेय दिल्ली की जनता के साथ रामभक्त हनुमान को भी दिया। जीत के बाद अपने संबोधन में केजरीवाल ने मुस्कुराते कहा कि आज मंगलवार यानी कि बजरंग बली का वार है। इसी दिन मिला जीत का शुभ समाचार है। इसी बहाने केजरीवाल ने जता दिया कि वे हनुमान भक्त हैं। इसके पहले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ भी खुले तौर पर कह चुके हैं कि वे भी पक्के हनुमान भक्त हैं। कमलनाथ ने तो अपने निर्वाचन क्षेत्र छिंदवाड़ा हनुमानजी की विशाल प्रतिमा स्थापित की है और बड़ा मंदिर बनवाया है। इसे गहराई से समझे तो आज राजनीति ने एकरूप ‘राम दरबार’ को भी विभाजित कर दिया है। पहले भाजपा ने राम पर अपना एकाधिकार जता दिया था। ऐसे में दूसरे राजनीतिक दलों और नेताअोंके पास यही विकल्प था कि वे राम न सही रामभक्त हनुमान की भक्ति को भावनात्मक और राजनीतिक रूप से शेयर करें। न सिर्फ शेयर करें बल्कि इसका सार्वजनिक इजहार भी करें। दूसरे शब्दों में भाजपा और हिंदुत्ववादी शक्तियों के लिए यह नई चुनौती है। क्योंकि राम मंदिर बनने की वैधानिक प्रक्रिया शुरू होने के साथ उस मुद्दे के राजनीतिक दोहन की संभावना भी समाप्त हो चुकी है। इसका विकल्प पार्टी सीएए-एनआरसी जैसे मुद्दों में ढूंढ रही है, लेकिन बात वैसी बन नहीं पा रही है। इस बीच यह नई दिक्कत उभर रही है कि गैर भाजपाई हिंदू नेता हनुमान भक्ति के बहाने अपनी राजनीतिक ताकत और स्वीकार्यता का विस्तार करने में लगे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने सवाल है कि इसकी ठोस काट वह क्या ढूंढे ? क्योंकि पूरे राम ‍चरित में राम और सीता के बाद सर्वाधिक वंदनीय देवता हनुमान ही हैं।
भाजपा इसे अपनी सफलता मान सकती है कि लोकतांत्रिक संस्कारों में भी उसने हिंदू-देवी देवताअोंके महत्व और सनातन मान्यताअो की अनिवार्यता को प्रतिष्ठापित कर दिया है। इसे खत्म करना किसी के लिए भी नामुमकिन है। भाजपा ने इसके लिए दशकों मेहनत की है और उस विचार को काफी हद तक बेदखल किया है कि धर्म निरपेक्षता और धार्मिक आस्था में छत्तीस का आंकड़ा है। तीन दशक पहले तक देश की राजनीति में सीमित भूमिका निभाने वाली भाजपा ने मर्यादा पुरूषोत्तम राम और उनके असुर संहारक स्वरूप और शौर्य का पूरे हिंदू समाज में सुनियोजित से प्रचार किया। नतीजा यह हुआ ‍कि राम, बुद्धि देवता गणेश के बाद सर्वाधिक स्वीकार्य देवता होते गए। राम के रूप में हिंदू समाज ने इस सनातन राष्ट्र में अपने वर्चस्व का स्वप्न साकार होते महसूस किया। इसी एहसास का भाजपा ने बड़ी सफाई से राजनीतिक अनुवाद किया और वह ‍ के ( राष्ट्रीय) तख्त पर काबिज हो गई और आज कम से कम इस मामले में वह अजेय दिखती है। इससे पार्टी को यह मुगालता होने लगा कि उसे कहीं कोई चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। राम पर तो उसका एकाधिकार है ही, राम भक्तों की भी वह इकलौती पसंद है।
कायदे से यह चक्रवर्तित्व की स्थिति है। लेकिन उत्थान में ही पतन के और संयोजन में ही विभाजन के बीच छुपे होते हैं। इनका पता तब चलता है कि जब बीज अंकुर में बदलने लगता है। भगवान राम की राजनीतिक धार्मिक-प्रतिष्ठापना के बीच भाजपा शायद भूल गई कि राम के परम भक्त हनुमान पर भी दूसरी सियासी पार्टियों का ध्यान जा सकता है। क्योंकि राम दरबार में हनुमान सदा स्वामीभक्त की तरह प्रभु राम के चरणों में विनतभाव से विराजमान रहते हैं। उन्होने अपना कोई स्वतंत्र दरबार कभी नहीं बनाया। भक्तों ने उन्हें निर्भीक और रक्षक देवता के रूप में पूजा, लेकिन हनुमान ने पावर शेयर करने के बारे में सोचा भी नहीं।
लेकिन अब देश की राजनीति बदल रही है, इसी के साथ आराध्य भी शिफ्ट हो रहे हैं। पहले बहुसंख्य क समाज के नेताअों में धार्मिक आस्थाअों को संवैधानिक कर्म कांड से दूर रखने की प्रवृत्ति ज्यादा थी। इसके पीछे कुछ तो संकोच था, कुछ अधार्मिक दिखने का आग्रह था तो कुछ अपनी धार्मिक और संवैधा‍िनक आस्थाअों के बीच लक्ष्मण रेखा बरकरार रखने की मान्यता भी थी। लेकिन राम मंदिर आंदोलन की निर्णायक सफलता ने सभी दलों के नेताअों को अपनी राजनीति बदलने को प्रेरित किया है। जब राम पर भाजपा का एकाधिकार हो गया तो बाकी के पास विकल्प के रूप में हनुमान ही बचे। क्योंकि वे भी दुष्टों का दमन करने वाले हैं। यह संयोग नहीं कि जैसे-जैसे राम मंदिर आंदोलन अपने अंतिम चरण में आता गया, राजनीतिक दृष्टि से हनुमान का महत्व भी बढ़ता गया। इसकी शुरूआत दो साल पहले उत्तर प्रदेश के मुख्य।मंत्री योगी आदित्यनाथ के बयानों से हुई। योगी ने राजस्थान में विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान एक रैली में हनुमान को दलित जाति का बताया। फिर उन्होंने हनुमान को लोक देवता और वनवासी बताया। इसका काउंटर मोदी सरकार के एक पूर्व मंत्री सत्यपालसिंह ने हनुमान को आर्य ( सवर्ण) बताकर किया। योगी सरकार के एक मंत्री चौधरी लक्ष्मी नारायण ने कहा कि हनुमानजी तो जाट थे, क्योंकि जाट किसी भी समस्या को हल करने बीच में कूद जाते हैं। फिर एक और भाजपा नेता नंदकुमार साय का बयान आया कि हनुमान तो आदिवासी थे। मानो इतना काफी नहीं था। भाजपा के एक मुस्लिम नेता बुक्कल नवाब ने दावा किया कि भगवान हनुमान तो मुसलमान थे।
इस तमाम बेतुकी बयानबाजी करने वालों पर हनुमानजी की कृपा ( या अवकृपा) कितनी हुई, यह तो पता नहीं, लेकिन कई विपक्षी नेताअोंको इतना समझ तो आ ही गया कि राम के मुकाबिल किसी रामभक्त देवता को ही खड़ा किया जा सकता है तो वह मारूतिनंदन हनुमान ही हो सकते हैं। ऐसे में राम के समांतर हनुमान भक्ति का राजनीतिक कोण साफ-साफ मुखरित होने लगा। इससे सियासी संदेश यह जा रहा है कि भगवान राम ही नहीं, राम भक्त हनुमान भी उतना ही राजनीतिक प्रसाद दे सकने में समर्थ हैं।
नेताअों की यह हनुमान भक्ति राजनीतिक रूप से फलती भी दिख रही है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस की 15 साल बाद सत्ता में वापसी हुई और महावीर हनुमान भक्त कमलनाथ, कमल को दरकिनार कर खुद मुख्यकमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुए। सत्तासीन होने के बाद भी इस हनुमत कृपा को उन्होंने याद रखा और भोपाल में पिछले माह हनुमान चालीसा के सवा करोड़ जप कराए। कांग्रेस की इस हनुमान भक्ति से विचलित प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह ने कहा कि हनुमान बुद्धि ( अभी तक यह दर्जा गणेशजी के लिए आरक्षित समझा जाता था) के देवता हैं। हमे उम्मीद है ‍ कमलनाथ प्रदेश में सांप्रदायिक माहौल खराब करने के बजाए राज्य में नागरिकता संशोधन कानून लागू करने के बारे में सोचेंगे।
इस तंज में यह स्वीकारोक्ति भी छिपी है ‍कि हनुमान किसी राष्ट्रीय कार्य में भी राजनीतिक रूप से मददगार होते हैं। वैसे भी हनुमान को संकटमोचक कहा जाता है। यह संकटमोचन पूरी मानवता के लिए है, जिसमें राजनेता भी शामिल हैं। हनुमान भक्ति का यह ज्वार और बढ़ा तो भाजपा के लिए कठिनाई बढ़नी ही है।
एक बात और। पुराणों में भगवान राम के अंत को लेकर कई कथाएं हैं। कहते हैं सीता की सती प्रामाणिकता सिद्ध होने के बाद सीता माता अपने दोनो बेटों लव और कुश को पति राम की गोद में सौंपकर स्वयं भूगर्भ में समा गईं। सीता के चले जाने से व्यथित राजा राम ने सरयू नदी के गुप्तार घाट पर जलसमाधि ले ली और वैकुंठ लोक चले गए। लेकिन इन्ही राम ने एक प्रसंग में क्रोधित होकर अपने भक्त हनुमान को मृत्युदंड दे दिया। लेकिन राम-नाम का अखंड जाप करने वाले हनुमान का मृत्यु भी कुछ न बिगाड़ पाई। इस पर भगवान ने स्वयं हनुमान को अमरता का वरदान दे दिया। यानी काल कोई भी हो, हनुमान अमर हैं। भाजपा को डर है कि कहीं यह ‘राजनीतिक अमरता’ में तब्दील न हो जाए?