मध्यप्रदेश में दांव पर कमल की काबलियत…

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राघवेंद्र सिंह

मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार नौकरशाही में आईएएस और आईपीएस अर्थात देवरानी,जेठानी के झगड़ों में उलझ जग हंसाई करा रही है।अभी बात डीजीपी को बदलने की हो रही है कल को हो सकता है सरकार के मुखिया बदलने की बात भी होने लगे। डीजीपी वी.के.सिंह से नाराजगी का मसला शांत नहीं हुआ तो कमलनाथ की काबिलियत भी दांव पर लग सकती है। आईएएस और आईपीएस के झगड़े में हनी ट्रैप से लेकर पुलिस कमिश्नर प्रणाली और राजगढ़ कलेक्टर का तमाचा कांड सरकार के लिए सिरदर्द बन गया है। डीजीपी हटे तो पुलिस पीड़ित हो जाएगी और कलेक्टर पर केस दर्ज हुआ तो मानो आईएएस की नाक नीची हो जाएगी। देवरानी – जेठानी का यह झगड़ा बुजुर्ग ससुर जैसे कमलनाथ के लिए बोर्ड की दसवीं-बारहवीं परीक्षा से कम कठिन नहीं होगा।
हालात नहीं सुधरे तो आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के रिश्तों में झूठी ही सही दरार देखने को मिल सकती है। दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की जुगलबंदी के चलते कांग्रेस सरकार में आई और मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ की ताजपोशी हुई। जीवनभर केन्द्र की राजनीति करने वाले कमलनाथ के लिए सूबे की सियासत बहुत मुश्किल काम था। मगर दिग्विजय सिंह के सहयोग से यह आसान हुआ। सत्ता में आने पर नेताओं के बीच जो भी दुरभि संधियां हुई होंगी उसका हम इस मौके पर जिक्र नहीं करना चाहते लेकिन यह तय है कि राज्य की राजनीति में नौसिखिए भले ही न हों कमलनाथ नए नए तो जरूर हों। ऐसे में सत्ता की शुरूआत में उन्होंने सारे सूत्र छोटे भाई कहे जाने वाले दिग्विजय सिंह को सौंप दिए थे। मंत्रिमंडल गठन से लेकर नौकरशाही में नियुक्ति तक सारे निर्णय राजा साहब की सलाह के बिना नहीं हो रहे थे। इसमें सिंधिया महाराज की अनदेखी की भी बातें हैं क्योंकि चुनाव जीतने की रसमलाई में चंबल क्षेत्र से एक लोटा दूध देने का योगदान तो उनका भी था। लेकिन सत्ता की खीर में उनकी भागीदारी समर्थकों के मंत्री बनने तक सिमट कर रह गई। बहरहाल भूमिका लंबी हो रही है इसलिए हम मुद्दे पर आते हैं। प्रदेश के सत्ता साकेत में हनी में उलझाने वाली विषकन्याएं, मंथरा और कुटिलाएं घूम रही हैं। ये सब सरकार के स्वर्णाभ कंगूरों और शिखरों को स्याह करने में लगी हुई हैं। झगड़ों में उलझे अफसरों के लिए ये सत्ता, सत्ता न होकर मानो रावण की लंका हो गई हो। साथ ही कई वर्षों के संबंधों में खटास पैदा कर रही हैं। ऐसा लगता है हनी ट्रैप के हाईप्रोफाईल मामले को ईमानदारी से डील करने की डीजीपी वीके सिंह की कोशिश उन्हें भारी पड़ रही है। प्रदेश का हनी ट्रैप पांच राज्यों से जुड़ा होने के कारण रेयरेस्ट केस है। इसमें दर्जनों आईएएस आईपीएस मंत्री विधायक सांसद रियलस्टेट के कारोबारी और कुछ मीडियाकर्मियों का खतरनाक गठजोड़ है। वीके सिंह ने इसे जड़ से उखाड़ने के लिए संजीव शमी जैसे दमदार अफसर को एसआईटी गठित कर जांच का जिम्मा सौंपा था। यहीं से कुछ हनीप्रेमी आईएएस अफसरों की नींद उड़ गई। कानोंकान चर्चा हुई और खतरे को भांपते हुए रातों रात संजीव शमी की जगह एसआईटी राजेन्द्र कुमार के हवाले कर दी गई। इस दौरान इंदौर के एक मीडिया चलाने वाले एक माफिया ने दुस्साहस कर हनीप्रेमी आईएएस अफसरों की कलई खोलना शुरू की। बदले में खबर छापने वाले मीडिया हाऊस को तबाह कर दिया गया। संदेश दिया गया जो हमसे टकराएगा मिट्टी में मिल जाएगा। मगर जब टकराने वालों में डीजीपी और उनकी टीम हो तो फिर भला क्या होगा। जाहिर है डीजीपी को हटाया जाएगा। इसी के लिए सत्ता के संसार में दिनरात विचरण कर रहीं मंथरा और कुटिलाएं सक्रिय हो गईं। बहाना बन रहा है राजगढ़ की तेजतर्रार आक्रामक और बहुत हद तक मारक कलेक्टर निधि निवेदिता के खिलाफ एएसआई की पिटाई का मामला। निवेदिता की निधि ही है आक्रामकता। उन्होंने प्रदर्शन कर रहे भाजपा नेता की पिटाई की इसके साथ ही पटवारी और एएसआई पर भी हाथ साफ कर दिया। राजनीति के मामले में तो कांग्रेस कलेक्टर के साथ खड़ी दिखी मगर पुलिस की पिटाई और उस पर जांच में दोषी पाए जाने पर सरकार खामोश रही। अब यह मामला नेता और पुलिस की पिटाई से ऊपर उठ गया था। पुलिस कमिश्नर प्रणाली के मुद्दे पर आईपीएस की पिटाई तो आईएएस तो करते ही आए हैं। 26 जनवरी को ऐसे संकेत थे कि मुख्यमंत्री कमलनाथ भोपाल इंदौर में से किसी एक शहर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू कर सकते हैं। जाहिर है इस प्रणाली के लिए सीएम का मन बनाने में डीजीपी सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी। इसका मतलब मन मैला करने में मंथराओं के कान भरने के बावजूद इंदौर भोपाल में पुलिस कमिश्नर प्रणाली के रूप में आईपीएस का राजतिलक होने वाला था। लेकिन प्रशासन की कैकयी ने दशरथ को कोई वचन याद दिलाया और पुलिस कमिश्नर प्रणाली टल गई। अब राजगढ़ कांड के बाद पुलिस के राम अर्थात डीजीपी के वनवास पर कई सारी कैकयी अड़ गई हैं। सत्ता की इस रामायण में जल्द ही तय हो जाएगा कि अब भी वनवास के लिए विषकन्याओं को लेकर मंथरा कुटिला और कैकयी की ही चलेगी।
पूरे विवाद में सरकार के दोनों पहिए आईएएस और आईपीएस एक दूसरे की हवा निकालने में लगे हैं। तमाचा मारने वाली कलेक्टर के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने का तीर डीजीपी के हाथ से निकल चुका है। झगड़ा इस पर है कि जांच किस स्तर के अधिकारी से कराई गई। जबकि यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। आईएएस आसमान से उतरे देवदूत नहीं होते हैं कि उनके गुनाह की जांच डीएसपी की बजाए किसी आईएएस से कराई जाए। ऐसा कहीं किसी नियम में लिखा भी नहीं है और न ही कोई परंपरा है। सबको याद होगा एक आरोप में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ एक डीएसपी ने जांच की थी। अब पूरे विवाद ने डीजीपी बदलने का रूप ले लिया है। इसके चलते सोशल मीडिया पर भी डीजीपी बनाए जाने की आग्रहनुमा खबरें आने लगी हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। डीजीपी कोई भी रहे और बने, यह सरकार का फैसला है मगर पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा जिल्लत और जलालत डीजीपी वीकेसिंह को झेलनी पड़ रही है। वे अभी हटाए नहीं गए हैं मगर उनके हटाने की जो चर्चाएं चल रही हैं उसमें सरकार की खामोशी डीजीपी के पद को अपमानित कर रही है। ऐसा भी पहले कभी नहीं हुआ। यह भी सरकार और नौकरशाही की प्रतिष्ठा के पराभव का ऐसा दौर है जो इसमें शामिल खिलाड़ियों के अनाड़ीपन को दर्शाता है। हम तो यही दुआ करेंगे विवाद का पटाक्षेप शालीनता और समन्वय के साथ हो।
पुलिस को “कसाब” की तरह होना चाहिए..!
हनीट्रैप से लेकर कलेक्टर राजगढ़ के तमाचे तक जांच में दूध का दूध पानी का पानी हो। हनीट्रैप एसआईटी चीफ राजेन्द्र कुमार को डीजीपी बनाया गया तो इस बात की चर्चा जरूर होगी कि उन्हें मामले को ठंडा करने का पुरस्कार दिया गया है। राजेन्द्र कुमार बतौर डीआईजी पुलिस को मुम्बई बमकांड के आरोपी आतंकी कसाब की तरह होना चाहिए जैसे जुमले के लिए चर्चित हुए थे। बाद में उन्हें इस कारण डीआईजी के पद से भोपाल मुख्यालय भेज दिया गया था।