मंदिरों से क्यों गायब हो रहा हिंदू स्थापत्य का अनोखापन ?

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अजय बोकिल

अयोध्या में ‘श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ बनने के बाद यह बहस भी शुरू हो गई है कि क्या वहां बनने वाला राम मंदिर विहिप के माॅडल के हिसाब से बनेगा या नई डिजाइन तैयार होगी? कहा जा रहा है कि राम मंदिर ‘भव्य’ होगा। इस भव्यता के निश्चित मायने क्या हैं, यह सामान्य हिंदू तो दूर इस मंदिर के वास्तुकार चंद्रकांत सोमपुरा भी समझ नहीं पा रहे हैं। शायद इसीलिए उन्हें कहना पड़ा कि राम मंदिर के मूल वास्तुशिल्प में बदलाव ठीक नहीं होगा। क्योंकि इसमें यथोचित भव्यता के साथ-साथ मंदिरों के भारतीय वास्तुशिल्प का समावेश है। यह मंदिर भी हमारी परंपरा के मुताबिक तराशे हुए पत्थरों से बनेगा। बकौल सोमपुरा पत्थर शिल्प की उम्र डेढ़ हजार साल तो होती ही है। इसी बहस में एक तार्किक सवाल उभर रहा है और वो ये कि आजादी के बाद हमने ऐसे कितने मंदिर बनाए हैं, जो श्रद्धास्थान के अलावा वास्तुशिल्प के भी अनूठे उदाहरण हों। आपको पांच नाम भी मुश्किल से याद आएंगे। दरअसल मंदिरों के अनुपम, हिंदू संस्कृति को प्रतिबिम्बित करने वाले और टिकाऊ वास्तुशिल्प के लिए हम आज भी पुराने स्थापत्य के भरोसे ही हैं। बीती आधी सदी में धार्मिकता के उबाल में मंदिर बनाने, जीर्णोद्धार करने अथवा उन्हें पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की होड़-सी मची है, लेकिन किसी को इस बात की चिंता नहीं है कि जो मंदिर बन रहे हैं, उनके शिल्प को हमारी भावी पीढ़ी क्यों और किस रूप में याद रखना चाहेगी?
भारत में सदियों से हिंदू (और अन्य धर्मों का भी) मंदिरों का अनोखा और ‍मिश्रित वास्तुशिल्प रहा है। यह वास्तुशिल्प ‘भगवान के घर’ को एक अलग तरह की गरिमा और विश्वास प्रदान करता है। देश में मंदिर निर्माण की उत्तर भारत में नागरी और दक्षिण भारत में द्रविड शैलियां रही हैं। ये शैलियां मंदिरों को केवल आराधना स्थल तक सीमित न रखते हुए हिंदू संस्कृति को भी प्रतिबिम्बित करती हैं। उनमें भव्यता के साथ-साथ विस्मयकारी अलंकरण, नक्काशी और हिंदू दर्शन को देखा और समझा जा सकता है। अपने उत्तुंग शिखरों, खूबसूरत नक्काशीदार स्तम्भों, मंडपों, गर्भ गृह, प्रदक्षिणा पथ और प्रवेश द्वारों की वजह से ये मंदिर हिंदू संस्कृति और धर्म की विराटता, उदात्तता और गहनता के परिचायक और धरोहर बन गए हैं। भारतीय वास्तु की विशेषता यहाँ की दीवारों के उत्कृष्ट और प्रचुर अलंकरण में है। भित्तिचित्रों और मूर्तियों की योजना, जिसमें अलंकरण के साथ सम्बन्धित विषय के गंभीर भाव भी व्यक्त होते हैं। इनमें वास्तु का जीवन से संबंध भी प्रकट होता है। ये सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन में अंतर को प्रतिबिम्बित करते हैं। वे आत्मिक ऊर्जा का केन्द्र भी रहे हैं। उनमें एक तरह की काव्यात्मकता भी है।
दरअसल धर्म को संकुचित करने की जैसी कोशिश आज की जा रही है, वैसी पहले कभी भी नहीं रही। विचारों की सहिष्णुता के साथ स्थापत्य की उदारता और शिल्प संवाद हमारे मंदिरों की पहचान रही है। हिंदू स्थापत्य कला के कुछ मूल तत्वों के साथ बीते दो हजार साल में मंदिर स्थापत्य कला में समय-समय पर मोहक बदलाव होते रहे हैं। लेकिन 21 वीं सदी आते-आते मंदिरों का यह अनोखापन धीरे-धीरे गुम सा हो गया है। सीमेंट कांक्रीट से जो मंदिर बन रहे हैं, वो मंदिर तो हैं, लेकिन उनका मन मंदिरों सा विशाल और उदात्त नहीं लगता।
यह कटु सत्य है कि आज मंदिर निर्माण और उसका संचालन एक बड़े कारोबार में तब्दील हो गया है। वो श्रद्धा स्थली से ज्यादा धनार्जन का जरिया बनते जा रहे हैं। कहने को हर शहर, गांव में दिन दूने मंदिर खड़े हो रहे हैं, लेकिन इनमें से शायद ही कोई मंदिर आपको इसलिए याद रहे कि वह स्थापत्य की दृष्टि से भी दर्शनीय और स्मरणीय है। बेशक कुछ मंदिरों में सुंदर देव प्रतिमाएं है, उनका निर्माण क्षेत्र भी एकड़ो में फैला है, लेकिन हमे उनमें वैसी विराटता, कला और सौंदर्य दृष्टि का साक्षात्कार नहीं होता। वो एक ‘स्ट्रक्चर’ ज्यादा लगते हैं। ऐसे मंदिरों को शिल्प शास्त्र के इतिहास में वैसी जगह कभी मिलेगी, कहना मुश्किल है, जो जगह खजुराहो के मंदिरों की है, जो जगह प्राचीन मंदिरों की है, जो जगह द्रविड शैली के मंदिरों की है, जो जगह मराठा अथवा राजपूत शैली के मंदिरों की है। हां, एक सकारात्मक बदलाव जरूर आया है। पहले मंदिरों की रचना कुछ रहस्यमयी-सी हुआ करती थी। जबकि आज के मंदिर बहुत खुले और सीधे-सपाट भाव वाले होते हैं।
भारत में आज कुल कितने मंदिर हैं, हर दिन कितने नए बन रहे हैं, इसका कोई प्रामाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। क्योंकि इसके लिए कोई निश्चित नियम नहीं है। कोई कहीं भी एक देव प्रतिमा रखकर अपना काम चालू कर देता है। भोले श्रद्धाालु वहां भी चढ़ावा चढ़ाने लगते हैं, ‍ यह जाने-बूझे कि उस मंदिर में विधिवत प्राणप्रतिष्ठा हुई भी है या नहीं। उसमें देवत्व का अवतरण हुआ भी है या नहीं। मंदिर संचालकों की निगाह अमूमन चढ़ावे पर होती है। चित्रकूट में सती अनुसुइया के नाम पर बने एक विशाल मंदिर में तो आतंरिक प्रद क्षिणा पथ इस तरह बनाया गया है कि हर दस कदम पर आपको किसी समाधि अथवा प्रतिमा पर चढ़ावा चढ़ाना ही है। हर बिंदु पर एक व्यक्ति इस बात की निगरानी करता है कि आप कुछ दान-दक्षिणा दे रहे हैं या नहीं। दुर्भाग्य से आज ज्यादातर हिंदू मंदिरों की यही स्थिति है। वो किसी धर्म जागरण से ज्यादा धन संग्रहण और लोगों की श्रद्धा का शोषण का केन्द्र ज्यादा बन गए हैं। आलम यह है कि प्रामाणिक- अप्रामाणिक पौराणिक प्रसंगों, किंवदंतियों को खोज-खोजकर नए मंदिर ‍खड़े किए जा रहे हैं। ऐसे मंदिर उंगलियों पर ‍ लायक भी नहीं हैं, जिनमें उनका प्रामाणिक अथवा पौराणिक इतिहास भी ठीक प्रदर्शित किया गया हो। हमारी श्रद्धा शायद इतनी मासूम है कि वह किसी भी तरह की प्रामाणिकता को भी अश्रद्धा का पर्याय मानती है।
अगर 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार माने तो देश में लगभग 20 लाख से ज्यादा मंदिर हैं। इन पर करीब 1 करोड़ ( पंडे-पुजारी व अन्य) लोगों की आजीविका टिकी है। अगर इनके साथ हार फूल, प्रसाद व अन्य पूजन सामग्री बनाने-बेचने वालों और परिवहन कर्ताअों को भी जोड़ लें तो यह संख्या 5 करोड़ तक हो सकती है। इसके बावजूद हमारे लिए मंदिर केवल श्रद्धास्थल और कामधेनु ही हैं।
अयोध्यास में बनने वाले राम मंदिर के शिल्पकार सोमपुरा के मन में उठ रही आशंकाअों की गंभीरता को समझना इसलिए जरूरी है, क्योंकि राम मंदिर का ‍ भी कहीं सियासत का शिकार न हो जाए। कथित रूप से ‘भव्य’ बनाने के चक्कर में उसकी मूल संकल्पना और उद्देश्य ही भ्रष्ट न हो जाए। वैसे भी हम स्वतंत्र भारत में कोई नया मंदिर स्थापत्य और वास्तु शिल्प विकसित नहीं कर सके हैं ( ऐसा कुछ हो तो कृपया बताएं) । बीते सत्तर सालों में देखें तो केवल सोमनाथ, अधरधाम और दिल्ली का लोटस टेम्पल ही ऐसे मंदिर हैं, जिन्हें समकालीन मंदिर स्थापत्य का प्रा‍तिनिधिक उदाहरण माना जा सकता है। हालां‍‍कि ‘लोटस टेम्पल’ भी हिंदू अर्थों में मंदिर नहीं है। इनके अलावा कुछ बिरला मंदिरों को अच्छे वास्तु‍शिल्पों में रखा जा सकता है। बाकी मंदिरों में प्रतिमा, भक्तों की भीड़ और श्रद्धा के आर्थिक शोषण के अलाावा शायद ही ऐसा कुछ हो, जिसे हमारे पूर्वज हमे अपनी परंपरा में मान्य करने के बारे में सोचें।
सवाल है कि ऐसा क्यों? क्यों मंदिरों से उनका अनोखा स्थापत्य गायब होता जा रहा है? क्यों दान दक्षिणा और पूजन अभियषेक और मत्था टेककर मोक्ष की गारंटी महसूसने वाला‍ हिंदू मन मंदिरों के सौंदर्य को लेकर भी उतना भावुक नहीं है? यह हमारी अक्षमता है, दृष्टिविहीनता अथवा मंदिरों को केवल कमाई का जरिया मानने की संकुचित मानसिकता है? कहते हैं कि आज वास्तु शिल्प की भाषा वैश्विक हो गई है। इसीलिए उसमें स्थानीय स्थापत्य की सुंगध गायब सी हो गई । मंदिर तो क्या सारे आधुनिक शहर भी एक जैसे दिखते हैं। दूसरे शब्दों में समकालीन स्थापत्य कला एक निराकार और निर्जीव सी नागरी वास्तु कला है, जो केवल छोटी होती दुिनया में मनुष्य की आवश्यकता से उपजी है। इसे सही मानें तो लगता है कि इसका सबसे ज्यादा असर हिंदू मंदिर स्थापत्य पर ही पड़ा है। जबकि अन्य धर्मों के धर्म स्थलों में उनकी मौलिक‍ शिल्प जतन करने का आग्रह साफ दिखाई पड़ता है। कम से कम राम मंदिर के मामले में तो हम इसे शिद्दत से याद रखें।