वासुदेवानंद को ज्योतिष पीठ के शंकराचार्यके रूप में कैसे मान्य किया

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इंदौर। अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र नाम से ट्रस्ट बनाया है। इसमें विवादित संत वासुदेवानंद को ज्योतिष पीठ बद्रीकाश्रम का शंकराचार्य बताकर ट्रस्ट में शामिल किया गया है। वास्तविकता यह है कि वासुदेवानंद ने ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद की गरिमा गिराई है, उन्होंने इस पद को लेकर पहले होई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में दावा किया था कि वे शंकराचार्य हैं, उनके इस दावे को होई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने ही खारिज कर स्वामी स्वरूपानंदजी सरस्वती को ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य के रूप में मान्य किया है। यानी शीर्ष अदालत ने वासुदेवानंद को शंकराचार्य नहीं माना है। इस प्रकार देश के सबसे वरिष्ठ शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंदजी सरस्वती महाराज बद्रीकाश्रम की ज्योतिष पीठ एवं द्वारका की शारदा पीठ दोनों के ही पीठाधीश्वर हैं। मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत वासुदेवानंद को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य कहकर ट्रस्ट में लिया है, यह सुप्रीम कोर्ट की अवमानना है। कम से कम सरकार को तो यह पता होना ही चाहिए कि देश के चार पीठों के शंकराचार्य कौन हैं। आश्चर्य है कि एक विवादित एवं सुप्रीम कोर्ट द्वारा अमान्य व्यक्ति को मोदी सरकार ने शंकराचार्य के रूप में ट्रस्ट में शामिल कर लिया है।
यह बात शंकराचार्य मठ इंदौर के प्रभारी एवं शंकराचार्यजी के प्रतिनिधि डॉ. गिरीशानंदजी ब्रह्मचारी ने कही है। उन्होंने मोदी सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट द्वारा अमान्य व्यक्ति को शंकराचार्य लिखने पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है कि वासुदेवानंद को ट्रस्ट में क्यों शामिल किया, लेकिन इस बात पर कड़ी आपत्ति है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा शंकराचार्य के रूप में अमान्य व्यक्ति को केंद्र सरकार कैसे शंकराचार्य लिख रही है। उन्होंने मोदी सरकार से इस भूल को सुधारने की मांग की है।