कोरोना वायरस: इंसानी जिंदगी में मौत के मुकुट की नई दस्तक…

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अजय बोकिल

विडंबना ही है कि दुनिया जितनी करीब आती जा रही है, नई-नई और पहले से ज्यादा खतरनाक बीमारियों के लिए भी गुंजाइश भी बढ़ती जा रही है। मनुष्य और जानवरों के बीच बीमारियों के डरावने पुल बनते जा रहे हैं। बीसवीं सदी ने जाते-जाते हमे एचआईवी/ एड्स जैसी वायरल बीमारी दी तो इक्कीसवीं सदी की पहली चौथाई में इस लिस्ट में कई और खतरनाक रोग और वायरस जुड़ गए हैं, जुड़ते जा रहे हैं। पूरी मानवता पर ताजा हमला कोरोना वायरस का है। चीन में इस रोग से अब तक 107 लोग मर चुके हैं और यह सिलसिला थमा नहीं है। इस बीच कोरोना से मुकाबले के लिए तरह तरह की सलाहें और परामर्श दिए जा रहे हैं। तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा ने कोरोना वायरस से बचाव के लिए डोलमा मंत्र (तारा मंत्र) का जाप करने और मन को चिंता मुक्त रखने की सलाह दी है तो दूसरी तरफ इस वायरस को काबू करने के लिए वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक और चिकित्सक काम कर रहे हैं।
इस बीच कोरोना की कराह भारत और मध्यप्रदेश तक आ चुकी है, हालांकि हमारे यहां यह रोग अभी शुरूआती दौर में है। लेकिन इस रोग से प्रभावित लोगों पर कड़ी चिकित्सकीय नजर रखी जा रही है। दुनिया जिन जानलेवा गंभीर विषाणु रोगों से पहले से जूझ रही है, वो हैं इबोला, मारबर्ग, हेंता वायरस, ह्यूमन मंकी पाॅक्स, एवियन एनफ्ल्यूएंजा ( बर्ड फ्लू), स्वाइन फ्लू ( सूअर बुखार) आदि। ये ऐसी बीमारियां हैं, जिनकी तासीर का हमे बहुत ज्यादा अंदाजा नहीं है। लिहाजा ये रोग अभी हमारे मुहावरों से भी कोसों दूर हैं, रोग कितना ही खतरनाक क्यों न हो, आम फहम होने लगता है तो उसकी एक सांस्कृतिक पहचान भी बनने लगती है। इनमे भी कोरोना वायरस इसलिए खास है कि यह अपेक्षाकृत नया और जानलेवा होने के बाद भी इसका नाम बेहद खूबसूरत है। क्योंकि कोरोना का मतलब होता है मुकुट। इसका नाम वैज्ञानिकों ने कोरोना शायद इसलिए रखा कि यह दिखने में किसी मुकुट की माफिक दिखाई देता है। दूसरे, यह आतंकी वायरस समूह में हमला करता है। इसके शिकार की पहली बुरी खबर चीन के वुहान शहर से आई, जहां सी फूड मार्केट में काम करने वाले अथवा खरीदार इस वायरस से पीडि़त पाए गए। कफ, बुखार और सांस लेने में तकलीफ इसके शुरुआती लक्षण हैं। फिर निमोनिया हो जाता है, जो जानलेवा भी हो सकता है। चीनी हेल्थ कमीशन के मुताबिक देश के हुबेई प्रांत में सबसे ज्यादा 100 लोगों की जाने गई है। दुनियाभर में अब तक कोरोनावायरस से संक्रमण के 4515 मामलों की पुष्टि हुई है, जिनमें से 4409 सिर्फ चीन में हैं।
चीनी अधिकारियों और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कोरोना वायरस की कई किस्मे हैं, लेकिन इनमें से 6 को ही संक्रामक माना जाता था। अब जो सातवीं किस्म खोजी गई है, वह और खतरनाक है। इसे साॅर्स नाम से भी जाना जाता है। नॉटिंघम यूनिवर्सिटी के वायरोलॉजिस्ट प्रोफेसर जोनाथन बॉल के मुताबिक यह बिल्कुल ही नई तरह का कोरोना वायरस है। संभव है कि यह पशुओं से ही इंसानों तक पहुंचा हो। इसका मूल स्रोत क्या है, यह अभी तक साफ नहीं है। इसी संदर्भ में चीन में पेकिंग यूनिवर्सिटी हेल्थ साइंस सेंटर की वेइ जी व अन्य शोधकर्ताअों का अनुमान है कि कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज थोक बाजार में वन्यजीवों के संपर्क में आए होंगे जहां सीफूड, मुर्गियां, सांप, चमगादड़ और पालतू मवेशी बिकते हैं। आम बोलचाल में लोग इसे सांप बुखार कहने लगे हैं। डब्ल्यूएचओ ने इस वायरस को 2019-एनकोवी नाम दिया है।
हमारी चिंता यह है कि कोरोना वायरस ने भारत में भी दस्तक दे दी है। दिल्ली, मोहाली, हैदराबाद, बिहार के बाद अब मप्र में भी कोरोना वायरस के संदिग्ध मरीज मिले हैं। उज्जैन में इस वायरस के संक्रमण के दो संदिग्ध मरीज मिलने के लोक स्वास्थ्य मंत्री तुलसीराम सिलावट ने विभागीय अमले को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। ये वो लोग हैं, जो चीन से लौटे हैं। इनके रक्त नमूनों को जांच के लिए पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी भेजा गया है।इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन असमंजस में है कि कोरोना वायरस को अंतराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपदा घोषित किया जाए या नहीं। लेकिन संगठन यह मान रहा है कि मामला गंभीर है। एक तरफ कोरोना से बचाने की यह इंसानी जद्दोजहद तो दूसरी तरफ आतंकवादी संगठन इसका अपने ढंग से घृणित दुरूपयोग भी कर रहे हैं। बताया जाता है कि कट्टर आतंकी संगठन आइसिस ने आॅन लाइन दुष्प्रचार शुरू कर दिया है कि ऐसी प्राकृतिक आपदाएं इस बात का सबूत है कि भगवान है और वो इस्लाम के दुश्मनों को इसी तरह सजा देता है। उसका इशारा कम्युनिस्ट चीन की अोर है, जहां उइगुर मुसलमानों का बेशरमी से दमन किया जा रहा है।
चूंकि कोरोना वायरस वैश्विक स्तर पर फैल रहा है, इसलिए इससे खतरा किसी एक देश, समूह या विचारधारा को नहीं, पूरी दुनिया को है। इसका सटीक इलाज भी अभी सामने नहीं आया है। ऐसे में एहतियात ही फिलहाल उपाय है। यहां विचारणीय यह है कि जहां तरफ दुनिया विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर सवार होकर करीब से करीबतर आती जा रही है, मनुष्य के जीते रहने के नए-नए तरीके खोजे और आजमाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मनुष्य से मनुष्य का यही सघन होता अंतर्सम्बन्ध मौत के नए-नए सामान भी पैदा कर रहा है। एक वायरस के जानलेवा पंजे से बचने का हम कोई साधन या बहाना ठीक से ढूंढ भी नहीं पाते कि मृत्यु का कोई अदृश्य नया हाथ फिर लहराने लगता है। एक बीमारी का इलाज जैसे-तैसे हाथ आता है तो दसियों नई बीमारियां मुंह फाड़े हमे ग्रसने के लिए तैयार दीखती हैं। आजकल तो बीमारियों के भी काॅकटेल होने लगे हैं। रोगों की इस सतत मार का परिणाम है कि डाॅक्टर भी अब खुद के अनुभव और लक्षणों के आधार पर इलाज के बजाए जांचों और मशीनो की भाषा पर ज्यादा भरोसा करने लगे हैं। यह भी एक बड़ा और बुनियादी बदलाव है।
यह भी हकीकत है कि इस पूरी कायनात में अगर इंसान सबसे चतुर प्राणी है तो सबसे लाचार भी शायद वही है। क्योंकि वह जितनी समस्याएं सुलझाता है, उससे कई गुना ज्यादा अपने लिए पैदा करता है। और उसी में जाल में खुद को तलाशता रहता है। हर नई बीमारी समूची मानव सभ्यता के लिए आतंक के रूप में सामने आती है और फिर स्थायी घर बनाकर बैठ जाती है। मसलन डायबिटीज, कैंसर और एड्स ऐसे ही रोग हैं, जिनसे लड़ते रहना ही हमारी नियति है। सच कहें तो लड़ते जाना ही मनुष्य का प्रारब्ध है, क्योंकि वह भी अपने आप में एक ‘वायरस’ ही है, ऐसा वायरस जो अपने मूल्य भी खुद तय करता है और अपने ही मूल्यों को खुद ही ध्वस्त भी करता है। वह जितना ईमानदार है, उतना ही बेईमान भी है। जितना संवेदनशील है, उससे कहीं ज्यादा संवेदनहीन और निर्मम है। अभी तो इक्कीसवीं सदी का चौथाई हिस्सा ही पूरा हुआ है, आने वाले वक्त में किस किस्म के ‘कोरोना’ इं‍सानियत के सिर पर बीमारियों का ताज रखेंगे, कहना मुश्किल है। फिलहाल दुआ करें कि यह वायरस भारत से दूर ही रहे तो अच्छा है, क्योंकि यहां कई राजनीतिक- सामाजिक- सांस्कृतिक वायरस पहले से मौजूद हैं।