शिर्डी बनाम पाथरी: साईं बाबा के मानवतावाद पर आंच न आए…

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अजय बोकिल

इसे इंसानी फितरत कहें या सियासत की मजबूरी कि ‘मालिक’ को भी एक नहीं रहने देती। जिस फकीर साईं बाबा ने ताजिंदगी दुनिया को ‘सब का मालिक एक’ का संदेश दिया, उसी ‘मालिक’ की जन्मभूमि और कर्मभूमि को लेकर अग्निरेखा खींची जा रही है। साईं बाबा शिर्डी के हैं या पाथरी के, इसको लेकर महाराष्ट्र में धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक बवाल मचा है। श्रद्धालु समझ नहीं पा रहे कि जो हो रहा है, उसके पीछे असल मंशा क्या है? महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने पाथरी में जाकर साई मंदिर निर्माण के लिए सीधे 100 करोड़ रू. देने का ऐलान क्या सोच कर किया? क्या इसके पीछे बाबा की प्रति अटूट श्रद्धा है या फिर शिर्डी संस्थान के मुकाबले वो पाथरी में एक नया धार्मिक संस्थान खड़ा करना चाहते हैं? यह श्रद्धा के सौ-सौ फूल उगाना है या फिर आस्था की विभाजन रेखा को गहरा करना है? इससे भी बड़ा सवाल ये कि क्या अब भक्तिभाव भी राजनीतिक प्रतिबद्धताअोंसे प्रेरित होगा? उधर शिर्डीवासियों ने इस मुद्दे को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है तो पाथरीवासियों का दावा है कि उनके पास पक्का पुरावा है कि साईं बाबा पाथरी में ही जन्मे थे और बाद में शिर्डी चले गए, वही उनकी कर्मभूमि भी बनी। बात कुछ-कुछ वैसी ही है कि लीला पुरूषोत्तम कृष्ण का जन्म तो मथुरा में हुआ, लेकिन बचपन उनका गोकुल में बीता। मामला संगीन होता देख मुख्यमंत्री ठाकरे बैठक बुलाई है, लेकिन शिर्डीवासी झुकने को तैयार नहीं है, क्योंकि उनका मानना है कि बाबा को शिर्डी से अलग करना शरीर को आत्मा से जुदा करने जैसा है।
इसे पेचीदा मसले का क्या हल होगा, यह देखने की बात है, लेकिन राजनीतिक फुलके सिंकने शुरू हो गए हैं। भाजपा सांसद सुजय विखे पाटिल ने शिर्डी के हक में कानूनी लड़ने की चेतावनी दी है तो कांग्रेस नेता अशोक चह्वाण और एनसीपी नेता दुर्रानी अब्दुल्लाह ने पाथरी के दावे को सही ठहराया है। दुर्रानी का तो सीधा आरोप है कि शिर्डीवासी अपने व्यावसाियक हितों के चलते पाथरी का ‍िवरोध कर रहे हैं।
शिर्डी के साईं बाबा हिंदुअों के आधुनिक देवताअोंमें एक प्रमुख नाम है। बाबा को भक्त भगवान दत्तात्रय का अवतार भी मानते हैं। बाबा कौन थे, कहां से आए थे, किस धर्म और जाति के थे, यह उन्होंने जीते जी कभी किसी को नहीं बताया, लेकिन भक्तों ने उनके परलोकगमन के बाद कई बातें ‘खोज’ निकालीं। भक्तों का मानना है कि बाबा स्वयं निष्कामी हों, लेकिन उनमे चमत्कार की शक्ति थी। यह ‘चमत्कार’ भी उन्होंने समाज कल्याण के लिए किए। बाबा की प्रामाणिक जीवनी ‘श्री साईं सच्चरित्र’ नामक ग्रंथ माना जाता है, जिसका प्रका‍शन 1930 में हुआ। इसे बाबा के निकट संपर्क में रहे गो.र.दाभोलकर उर्फ हेमाडपंत ने लिखा है। दाभोलकर 1910 में बाबा के संपर्क में आए थे। कहते हैं कि दाभोलकर को बाबा की चमत्कार शक्ति पर तब भरोसा हुआ, जब बाबा ने उस समय व्यापक पैमाने पर फैले हैजा से शिर्डी को बचाने के लिए गेहूं के दाने पत्थर पर पीसे और गांव की सरहद पर बिखेर दिए, जो हैजे के लिए लक्ष्मण रेखा बन गई। गांव एक महामारी से बच गया। साईं चरित्र में ऐसे कई प्रसंगों का उल्लेख है। दाभोलकर के इस ग्रंथ की प्रामाणिकता का आधार यह है कि इस जीवनी को लिखने लिए उन्होंने बाबा से एक वकील माधवराव देशपांडे के मार्फत बाकायदा अनुमति मांगी थी और बाबा ने इसके लिए सहमति दी थी। कहते हैं कि इस ग्रंथ में भी बाबा की शिर्डी में सम्पन्न लीलाअों का ही वर्णन है। श्री साईं सच्चरित्र अब 12 भाषाअोंमें उपलब्ध है और इसके कई संस्करण निकल चुके हैं। लेकिन बाबा शिर्डी में कहां से आए इसको लेकर बाबा के ही एक समकालीन संत दासगणू महाराज ने अपने ग्रंथ ‘श्री भक्ति सारामृत’ में कहा है कि साईं बाबा पाथरी ( जिसे ग्रंथ में पाथरडी कहा गया है) से शिर्डी आए थे। यह ग्रंथ 1925 में प्रकाशित हुआ था।
आजादी के दो दशक बाद देश में धार्मिक पुनर्जागरण के समांतर शिरडी के साईं बाबा की ख्याति बढ़ती जा रही थी। वहां भक्तों की तादाद बढ़ने लगी। बहुत से लोगों का मानना है कि साई बाबा यहां मानी गई मन्नत को पूरा करते हैं। इस मन्नत में धन दौलत से लेकर आत्मिक शांति तक शामिल हैं। आज शिर्डी में साईं बाबा का भव्य मंदिर है, जिसमें दर्शन के लिए हर साल लाखों भक्त पहुंचते हैं। मंदिर की देखरेख श्री साईं ट्रस्ट के हाथों में हैं, जिसका करोड़ों का बजट है। शिर्डी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर के धार्मिक पर्यटन स्थल में तब्दील हो चुका है। बाबा के भक्तों में सभी धर्मो और सम्प्रदायों के लोग होते हैं। पारसी संत मेहरबाबा भी साईं बाबा से प्रभावित थे।
अब सवाल यह कि जब शिर्डी को अधिकांश लोगों ने साईं की लीला स्थली मान लिया है तो उनकी जन्म स्थली को अचानक अहमियत देने का क्या मकसद है? मुख्य मंत्री उद्धव ठाकरे ने पाथरी के विकास के लिए आनन फानन में सौ करोड़ रू. देने का ऐलान भी किस बिना पर किया ? ऐसा करके वो क्या सिद्ध करना चाहते हैं? यहां उल्लेखनीय है कि बाबा के जन्म स्थान को लेकर विश्वास खेर नामक भक्त ने काफी अनुसंधान किया था। उन्होंने ही बाबा के निकट रहे लोगों के हवाले से दावा किया कि बाबा की जन्मस्थली पाथरी थी। इसी संदर्भ में 1974 में प्रकाशित श्री साईं सच्चरित्र के अंग्रेजी संस्करण में दावा किया गया कि बाबा का जन्म पाथरी में हुआ। यह भी कहा गया कि बाबा जन्म से ब्राह्मण थे और उनका जन्म भुसारी घराने में हुआ था। संभवत: इसी आधार पर भुसारी घराने के अंतिम वंशज रघुनाथ भुसारी ने पाथरी में बाबा के पुराने घर की जमीन खरीद कर वहां साईं मंदिर बनवाया। बताया जाता है कि श्री साईं सच्चरित्र के जिस आठवें संस्करण में बाबा की जन्मस्थली पाथरी होने का जिक्र है, वह प्रति संस्थान के संग्रहालय से गायब है और श्री साईं संस्थान के अध्यक्ष सुरेश हावरे ने इस पूरे मामले की जांच की मांग की है। गौरतलब है कि शिर्डी और पाथरी के बीच 277 किमी की दूरी है और दोनो अलग-अलग जिलों में आते हैं। उधर शिर्डी में सरकार के निर्णय के खिलाफ पूरी तरह बंद है।
यहां मुद्दा यह है कि‍ शिर्डीवासी सरकार के फैसले का विरोध क्यो कर रहे हैं और क्या ठाकरे पाथरी में एक समांतर शिर्डी बनाना चाहते हैं या फिर इसके पीछे हिंदू आस्था को बांटने का कोई मकसद है? ऐसे विवाद तो और भी कई जगह खड़े किए जा सकते हैं, तब क्या होगा? शिर्डीवासियों का कहना है ‍कि उन्हें पाथरी के विकास से परहेज नहीं है, लेकिन यह आस्था और प्रतिष्ठा का सवाल है, पाथरी, शिर्डी नहीं हो सकता। इन दावों- प्रतिदावों में कौन कितना सही है, यह तो इतिहासकार ही बता सकते हैं लेकिन आस्था प्रमाणों पर ही निर्भर रहे, यह जरूरी नहीं है। इस आस्था के बंटवारे में भी कोई सियासी खेल खेला जा रहा है तो उसके दुष्परिणाम भविष्य में दिखेंगे। अफसोस की बात यह है कि यह सब उन बाबा के नाम पर हो रहा है, जिन्होंने ताजिंदगी न अपनी असली पहचान न बताई, न जताई। न ऐसा करना जरूरी समझा। इसका सीधा अर्थ यह है कि बाबा चमत्कारी हों न हों, वो मानवतावादी और मानवीय एकात्मता के पैरोकार जरूर थे। उनका भरोसा एकमेव और ऐसे ईश्वर में था, जो धर्म-पंथ से परे मनुष्यमात्र के कल्याण ही सोचता था। बाबा ने खुद भगवान होने का दावा नहीं किया, लेकिन भक्तों ने उन्हें भगवान का दर्जा दिया।
दरअसल आजकल इकतरफा फैसले लेकर उस पर अमल करते जाने की जो राजनीतिक परंपरा चल रही है, शिर्डी बनाम पाथरी विवाद को उसी की नई कड़ी समझना चाहिए। क्योंकि ठाकरे सरकार यदि पाथरी का धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में ही विकास करना चाहती है तो उसे शिर्डी को भरोसे में लेने में क्या‍‍‍ दिक्कत थी? यह कदम उठाते वक्त उद्धव ठाकरे ने शायद साईं बाबा के उस सूत्र वाक्य ‘श्रद्धा और सबूरी’ को भी दरकिनार कर ‍िदया। संभव है कि इस बवाल की बुनियाद में लोगों के कारोबारी हित और मंदिरों की आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा भी हो, लेकिन आस्था के साथ कोई भी सियासी खिलवाड़ महंगा पड़ सकता है। बाबा के मानवतावाद पर आंच न आए, यह ध्यान रखना जरूरी है।