आर्थिक मंदी में भी बढ़ रहा भ्रष्टाचार उद्योग

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रवीन्द्र वाजपेयी

केन्द्रीय बजट आने के एक पखवाड़े पहले खुदरा महंगाई के जो आंकड़े आये हैं उनकी वजह से मोदी सरकार का मानसिक बोझ बढ़ गया है। आर्थिक मंदी में आम तौर पर मांग कम होने से दाम गिरते हैं। लेकिन बीते कुछ महीनों में रोजमर्रे की चीजों के मूल्यों में वृद्धि के कारण महंगाई बढ़ गई। हालाँकि इसका कारण अधिक वर्षा से खराब हुई सब्जियां एवं अन्य फसलें भी हैं। प्याज तो खैर, हर साल ही हड़कंप मचाता है लेकिन इस साल मानसून लंबा खिंच गया। महाराष्ट्र में इस वजह से गन्ने की पैदावार कम हुई है जिससे आने वाले समय में चीनी के दाम बढऩा तय है। रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती के बावजूद यदि महंगाई बीते पांच साल के उच्चतम स्तर तक आ गयी तब सरकार के लिए चिन्तन और चिंता दोनों की परिस्थितियाँ बन गई हैं। यद्यपि प्याज के अलावा बाकी हरी सब्जियों के दाम बीते कुछ दिनों में लगातार नीचे आने से हो सकता है बजट पेश होने तक तक महंगाई के आंकड़े कुछ नीचे आ जाएं लेकिन गन्ना और दलहन के साथ ही धान की फसल को अतिवृष्टि से हुए नुकसान से आने वाले दिनों में एक बार फिर खुदरा महंगाई सिरदर्द बन सकती है। सबसे बड़ी बात ये है कि रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती की संभावनाएं जहां घट रही हैं वहीं नगदी की कमी दूर करने के बारे में उसका लचीला रवैया भी कड़ाई में बदल सकता है। अर्थशास्त्री भी इस बात को लेकर भौचक हैं कि बाजार में नगदी की किल्लत के बावजूद महंगाई बढऩे की स्थिति कैसे बनी। अर्थशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार बाजार में मुद्रास्फीति (नगदी के अतिरिक्त चलन) की वजह से मांग बढ़ती है जो महंगाई का कारण बन जाती है। लेकिन भारतीय बाजार बीते दो-तीन साल से मुद्रा संकुचन की समस्या से जूझते आ रहे हैं। नोटबंदी को इसका सबसे प्रमुख कारण माना जाता रहा है। उससे उद्योग व्यापार जगत उबर पाता उसके पहले ही जीएसटी लागू हो जाने से समस्या और जटिल हो गई। वैसे उक्त दोनों कदमों का प्रारम्भिक तौर पर तो स्वागत हुआ लेकिन उनके अमल में जो अनिश्चितता और अव्यवस्था हुई उसकी वजह से परिणाम प्रतिकूल हो गए। वैसे इसका दूसरा पहलू ये भी है कि उक्त दोनों कदमों से काले धन से होने वाला कारोबार ठंडा पड़ गया जिसकी वजह से समानांतर अर्थव्यवस्था सिमटने को आ गई। लेकिन इससे बाजार में मांग घटी जिसका दुष्प्रभाव अंतत: उत्पादन और उसके साथ ही रोजगार गिरने के रूप में सामने आया। केंद्र सरकार की समूची राजनीतिक कामयाबी आर्थिक मोर्चे पर आकर सवालों के घेरे में इसलिए फंसकर रह जाती है क्योंकि इस स्थिति से निकलने की अवधि और तरकीब को लेकर सत्ता पक्ष पूरी तरह खामोश बना हुआ है। प्रधानमंत्री ने बीते दिनों उद्योगपतियों सहित कुछ जानकारों से प्रत्यक्ष बातचीत करते हुए सुझाव मांगे लेकिन वे सब बजट की दिशा तय करने के लिये थे जो अमूमन हर साल होता है। सवाल ये है कि इस स्थिति से देश निकलेगा कैसे? कुछ लोगों का ये भी कहना है कि मोदी सरकार ने बीते पांच वर्षों में रक्षा सौदों में जो बड़ी धनराशि खर्च कर दी उससे भी अर्थव्यवस्था में ठहराव आ गया लेकिन वह ऐसी जरूरत थी जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ी बात जो समझ में आती है वह है आर्थिक मोर्चे पर दीर्घकालीन नीतियों के अभाव की। हमारे देश में करों को लेकर कोई ये नहीं बता सकता कि आज जो दरें हैं वे कब तक जारी रहेंगी? पिछले बजट में सोने के आयात पर शुल्क बढ़ाया गया था। इसका मकसद सोने की खरीदी पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा है। बीते कुछ महीनों में स्वर्ण आयात घटने की खबरें भी आईं लेकिन दूसरी तरफ स्वर्ण आभूषणों का निर्यात घटने से इस व्यवसाय को जमकर घाटा हुआ। अब खबर है कि आगामी बजट में सोने के आयात पर शुल्क फिर से कम किया जा रहा है। इसी तरह से आयकर की दरों को लेकर भी अनिश्चितता बनी रहती है। आगामी बजट के पहले की परिस्थितियों में सरकार बेहद दबाव में है लेकिन उसे ऐसे फैसले लेने चाहिए जो ठोस हों और नीतिगत अनिश्चितता से मुक्त रहें। चंद उद्योगपतियों से मिली सलाह के आधार पर बजट बनाने की बजाय आम जनता को ध्यान में रखते हुए यदि आर्थिक नियोजन किया जावे तो उसके परिणाम कहीं बेहतर होंगे। देश में आलीशान कारों की बजाय छोटे दोपहिया वाहनों को सस्ता किया जाना कहीं जरूरी है। रही बात बेरोजगारी की तो सरकार को श्रम कानूनों में सुधार करना चाहिए जिनकी वजह से नौकरियों पर संकट है। न्यूनतम मजदूरी तय करने से श्रमिकों का शोषण रोकने के प्रयास का नकारात्मक प्रभाव भी हुआ। बेहतर हो इस बारे में मांग और पूर्ति के सिद्धान्त्त को भी ध्यान में रखा जावे। ऊंचे वेतनमान के कारण ही अंतत: सरकार भी नई नौकरी निकालने की बजाय संविदा नियुक्तियों और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों से काम चला रही है। लेकिन निजी क्षेत्र के नियोक्ताओं पर दर्जनों श्रम कानूनों का बोझ लाद दिया गया है। खुदरा मंहगाई की दरों में वृद्धि का हल्ला तो कमजोर पड़ सकता है किन्तु बेरोजगारी दूर करने के लिए सरकार को श्रम कानूनों और सेवा शत्र्तों में लचीलापन लाना होगा। आर्थिक सुधारों के लिहाज से भी ये बेहद जरूरी हैं। रही बात बजट की तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पास सीमित विकल्प हैं। राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने के लिए सरकारी खर्च कम करना होगा और वैसा करने से विकास कार्य प्रभावित होते हैं। अच्छा तो यही होगा सरकार आर्थिक क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार पर लगाम लगाए और इसके लिए आयकर की समाप्ति जैसे किसी क्रांतिकारी कदम की जरूरत है। सरकार माने या न माने लेकिन नोटबंदी इसी दिशा में बढ़ाया गया कदम था। बजट में करों की कमी से ज्यादा जरूरत सरकारी अमले के भ्रष्टाचार को रोकने की है। प्रधानमंत्री भले ही न खाउंगा के अपने दावे को सही साबित करते रहे हों लेकिन न खाने दूंगा वाली बात को वे लागू नहीं करवा पाए। भ्रष्टाचार रूपी दीमक समूची व्यवस्था को चाट रहा है। आगामी बजट में यदि सरकार आर्थिक नीतियों को भ्रष्टाचार से मुक्त करवाने का पुख्ता इंतजाम कर सके तभी निराशा का वर्तमान माहौल दूर हो सकेगा। सत्ता के शीर्ष पर विराजमान महानुभावों को ये बात अच्छी तरह से जान लेनी चाहिए कि आर्थिक मंदी के बाद भी सरकारी अमले के भ्रष्टाचार का कारोबार जमकर फल फूल रहा है।