जावेद भाई : पत्रकारिता शायरी नहीं, जिम्मेदारी है

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-राकेश दुबे

जी, जावेद भाई से मेरा मतलब अब मुम्बई निवासी शायर जावेद अख्तर से ही है, वे भोपाल में पढ़े हैं और भोपाल मेरा घर है इस नाते मेरा यह सम्बोधन उन्ही को है | इन दिनों जावेद भाई ने एक नया मसला खड़ा किया है वे पत्रकारिता पर फतवे देने लगे हैं | टेलीविजन बहस में वे एंकरों के साथ अब पत्रकारिता पर भी हमलावर हो रहे हैं | पूरे अदब के साथ यह गुजारिश है – “जावेद भाई पत्रकारिता शायरी नहीं, जिम्मेदारी है |” यह कहना देश कि पत्रकारिता को क्या हो गया है ? यहाँ तक तो ठीक है, सम्पूर्ण समाज में आई गिरावट के छींटे इस पवित्र मिशन की काया पर यदाकदा दिखते हैं, परन्तु इसकी आत्मा पवित्र और आज भी उतनी ही मिशनरी है जितनी एक शताब्दी पूर्व थी| जब भारत में आजादी की लड़ाई चल्र रही थी | आज भी इसकी आत्मा “श्रमजीवी पत्रकार” हैं | जिनका काया और कलेवर पर कोई अधिकार नहीं है, जिस काया और कलेवर को लेकर जावेद भाई और उन जैसे कई और भ्रम में आ जाते हैं उस पर मीडिया प्रबन्धन का अधिकार होता है और यह प्रबन्धन समाचारों के साथ वैसा ही व्यवहार करता है,जैसे “सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ता हमारा” लिखने वाले के साथ बाद में हुआ | वो नज्म थी, बदल गई, लिखी हुई खबर आज भी नहीं बदलती, छपते-छपते छापेखाने में या स्टूडियों में रिकार्डिंग के बाद उसके हश्र के लिए कोई श्रमजीवी पत्रकार इसलिए जिम्मेवार नहीं होता क्योंकि उसका रूप प्रबन्धन बदल देता है ऐसा अनेक बार हुआ है | या तो सत्य छपता ही नहीं है और छपता है तो अमिट होता है | ऐसी पत्रकारिता की मिसाल स्वनाम धन्य भारतेंदु हरिश्चन्द्र,माधव राव जी सप्रे, पराड़कर जी, शेख अली ,दादा माखनलाल चतुर्वेदी,दुर्गादास, गणेश शंकर विद्यार्थी ने कायम की | उस मशाल को लेकर अगली पीढ़ी चली जिसमे राजेन्द्र माथुर प्रभाष जोशी जैसे हस्ताक्षर शामिल है, पत्रकारिता का वंश अभी जीवित है और सारे संकटों के बाद भी डटा रहेगा |
जावेद भाई, शायर हैं| अपने कलाम के साथ दूसरों को भी पढ़ते सुनते होंगे इस बात का भरोसा है | शायरी जैसी रूमानियत खबर में नहीं होती और न ही किसी खबर में उतनी कटुता | एक मिसाल इस दिनों सोशल मीडिया पर है जिसमे एक कवि चीख चीख कर सांसद ओवैसी को “गद्दार” कहता है | कोई भी पत्रकार कभी ऐसा नहीं लिखता वो जिस दिन भी किसी को गद्दार लिखता है तो प्रमाण सहित लिखता है | यह पत्रकारिता का अकीदा है | शायरी कल्पना है, पत्रकारिता हकीकत है | शायरी “कागज की कश्ती और बारिश का पानी” जैसी मासूम हो सकती है या नौ रसों में से वीर रस पैदा कर उन्मादी बना सकती है | खबर तो हकीकत होती है, आईने के माफिक अक्स बताती है और निर्णय आप पर छोडती है |
जावेद भाई इस अंतर को वैसे तो जानते ही होंगे पर इसे चित्रकला के उदहारण से साफ़- साफ़ समझा जा सकता है चित्रकला के दो प्रकार है एक वास्तविक चित्रण दूसरा कोलाज बनाना | पहले कोलाज़ किसी भी वस्तु को कही भी जोड़कर तैयार आकृति कोलाज होती है शायरी की तरह| कोलाजनुमा शायरी का फार्मेट गजल, नज्म, गीत,व्यंग,सानेट कुछ भी सकता है | खबर वास्तविक चित्रांकन होती है मिरर इमेज की तरह | यह बात अलहदा है कि प्रबन्धन उसे सोने के फ्रेम में जड़कर दिखाता है या एकदम नग्न सत्य |
पता नहीं गाँधी जी से जावेद भाई और उनसे सहमत लोगों, की कितनी आस्था है ? मेरी और मेरे से पिछली और अगली पीढ़ी की जरुर है | गाँधी जी की आत्मकथा के पृष्ठ २४८ परवर्णित दृश्य इन दिनों मीडिया का है | हम सबकी की कोशिश इसमें निरंतर शुधार की होना चाहिए | गांधीजी लिखते हैं – “ समाचार पत्र एक जबर्दस्त शक्ति है इसे सेवभाव से चलाना चहिये | विचारधारा सत्य हो,इस कसौटी पर समाचार पत्र खरे उतरें, कुछ निक्कमे हो सकते हैं,उन्हें कौन बंद करे|” आम तौर पर सारे खबरनवीस समाचार और विचार को अलग-अलग व्यक्त करते हैं | समाचार गजल का मिसरा नहीं होता आईना होता है | पत्रकारिता जिम्मेदारी होती है, शायरी नहीं |