बढ़ती महंगाई में सस्ता होता इंसान

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रवीन्द्र वाजपेयी

वैसे तो देश और दुनिया के इतने विषय हैं जिन पर लम्बे आलेख लिखे जा सकते हैं लेकिन राजस्थान के कोटा शहर में बीते एक महीने में सौ से अधिक बच्चों की मौत को लेकर जो ठंडा रवैया अख्तियार किया जा रहा है वह इस बात का इशारा करता है कि हमारी संवेदनाएं किस हद तक मर चुकी हैं। सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति नहीं होने से ही अधिकतर मौतें होना बताया जा रहा है। इसी तरह अस्पताल में लगी सभी वैन्टीलेटर मशीनों में कुछ ही काम कर रही थीं। लगातार हो रही मौतों के बाद भी राज्य के चिकित्सा मंत्री कल अस्पताल पहुंचे और 15 जनवरी तक समूची व्यवस्था को सुधारने का आश्वासन देकर लौट गए। इसी बीच मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ये कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि सर्दी में तो बच्चे मरते ही हैं। गत दिवस उन्हें ये कहते सुना गया कि बीते एक साल में केवल 900 बच्चों की मृत्यु हुई जबकि उसके पहले के सालों में 1000 मरा करते थे। ऐसी घटनाओं पर राजनीति न हो ये नामुमकिन है। सो, विपक्ष अपना कर्तव्य निभा रहा है। चिकित्सा मंत्री और मुख्यमंत्री से त्यागपत्र मांगते हुए धरना प्रदर्शन आदि जारी है। समाचार माध्यमों में आलोचना हो रही है जिससे बचने के लिए सत्तारूढ़ लोग उप्र के गोरखपुर जिले में हुईं बच्चों की मौतों का उल्लेख करना नहीं भूलते। कोटा लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला का निर्वाचन क्षेत्र होने से केंद्र से भी विशेषज्ञों का दल पहुंचने की जानकारी आई। 130 करोड़ के इस देश में महंगाई की दर चाहे कितनी भी बढ़ जाए लेकिन इंसानी जि़न्दगी दिन ब दिन सस्ती होती चली जा रही है। कोटा हो या गोरखपुर सभी जगह इस तरह की थोक मौतों का शिकार गरीब परिवार ही होते हैं। इसकी मुख्य वजह वे परिस्थितियां हैं जिनमें उन्हें रहना पड़ रहा है। गोरखपुर से मिली जानकारी के अनुसार सुअरों की वजह से फैलने वाली एन्सीफ्लाइटिस नामक बीमारी के कारण प्रतिवर्ष वहां बड़े पैमाने पर मौतें होती हैं। ये सिलसिलाया बरस दर बरस चला आ रहा है। जब बात ज्यादा बाढ़ जाती है तब कुछ समय के लिए होहल्ला मचता है और फिर बात आई गई हो जाती है। प्रभावित परिवारों को मुआवजा बांटकर सरकार अपना पल्ला झाड़ लेती है और जाँच वगैरह बिठाकर लोगों का गुस्सा ठंडा करते हुए दो चार को निलम्बित कर प्रशासनिक दृढ़ता दिखाई जाती है। इस दौरान कोई बड़ी घटना होने के बाद लोगों का ध्यान उस तरफ घूम जाता है। कोटा के हादसे के बाद भी यही होगा। और सरकार अगले साल मौतों के आंकड़ें में कमी का ढिंढोरा पीटकर अपनी पीठ ठोंकने में जुटी रहेगी। आजादी के सात दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी देश के किसी न किसी हिस्से में इस तरह थोक के भाव लोगों का मर जाना शर्मनाक भी है और दुखदायी भी। एक तरफ तो देश में चिकित्सा पर्यटन (मेडीकल टूरिज्म) के विकास की बात होती है जिसके अंतर्गत विदेशियों को इलाज के लिए आकर्षित करने का प्रचार करते हुए देश में चिकित्सा सुविधाओं के विश्वस्तरीय होने का दावा भी किया जाता है लेकिन दूसरी तरफ कभी गोरखपुर तो कभी कोटा में इलाज के अभाव में सैकड़ों बच्चे मौत के मुंह में चले जाते हैं। बीती गर्मियों में बिहार में चमकी बुखार से हुई मौतों ने बवाल मचाया था। सफाई में कहा गया कि लीची खाने से प्रतिवर्ष ऐसा होता है। नीतीश सरकार भी कठघरे में खड़ी की गई किन्तु दोबारा वह हादासा नहीं दोहराया जाएगा इस बात की गारंटी कोई नहीं दे सकता। प्रश्न ये है कि ये सिलसिला कभी रुकेगा या नहीं ? विकास के नए-नए दावों के बीच ये बात समूची व्यवस्था के माथे पर कलंक है कि देश की बड़ी आबादी जानवरों से भी बदतर हालातों में रहने मजबूर है। एक तरफ तो प्रधानमन्त्री ने गरीबों को 5 लाख तक की मुफ्त चिकित्सा जैसी सुविधा प्रदान की है वहीं दूसरी तरफ जिला स्तर के अस्पतालों में प्राथमिक चिकित्सा तक का समुचित इंतजाम नहीं है। गोरखपुर में हुए हादसे के दौरान भी अस्पताल में आक्सीजन की कमी की बात सामने आई थी। जब जिला अस्पतालों में ये बदहाली है तब और भी निचले स्तर पर क्या हालात होंगे इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। पांच लाख तक के नि:शुल्क इलाज की सुविधा बहुत ही अच्छी है लेकिन जब अस्पतालों में इलाज का इंतजाम ही नहीं होगा तब योजना का क्या लाभ? मुख्यमंत्री और चिकित्सा मंत्री से त्यागपत्र मांगने वाले विपक्ष को भी तो अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए। क्योंकि राजस्थान में साल भर पर पहले तक तो वही सत्ता में था और व्यवस्थाएं कोई एक दिन में तो सुधरती और बिगड़ती नहीं हैं।