आपराधिक लोग भी लेने लगे अखाड़ों का सहारा

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डॉ. गिरीशानंदजी महाराज
सनातन धर्म में भगवा त्याग, तपस्या, पवित्रता, बुद्धि और आध्यात्मिक बल का प्रतीक है। जो व्यक्ति अपने जीवन की खुशियों की बलि चढ़ाकर समाज के कल्याण के लिए नि:स्वार्थ रूप से समाज को समर्पित हो जाता है, उसे भगवा से पहचाना जाता है। प्राचीन काल में देश का ध्वज भगवा ही था और आज के राष्ट्र ध्वज में भी ऊपर भगवा रंग है। दुर्भाग्यवश आज उसी भगवा को लेकर बहस छिड़ी हुई है, क्योंकि लोग पवित्र भगवा के अर्थ को ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। जैसी की चर्चा है यह बात सही है कि कुछ राजनीतिक दल वोट बैंक के लिए भगवा का दुरुपयोग कर रहे हैं। देश में ऐसे संगठन भी हैं, जो अपने अनुयायियों को राजनीति करने के लिए भगवा धारण करा देते हैं। यहां तक कि कुछ आपराधिक लोग भी अखाड़ों का सहारा लेते हैं। इनकी वास्तविकता जानने पर जब अखाड़ा इन्हें निष्कासित कर देता है तब भी ये लोग साधु वेश धारण किए रहते हैं और आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते रहते हैं। इससे धर्म के साथ ही पवित्र भगवा भी बदनाम हो रहा है।
अग्नि अखाड़ा में बाल ब्रह्मचारी ब्राह्मण ही साधु होते हैं। बाकी अखाड़ों के साधु बाबा कहलाते हैं। सभी अखाड़ों के सर्वोच्च आचार्य शंकराचार्य होते हैं और शांकर परंपरा में ब्राह्मण ही संन्यासी होते हैं। इन्हें वेद-शास्त्रों का ज्ञान होता है और ये ही आचार्य होते हैं। अखाड़ों में केवल अग्नि अखाड़े का महामंडलेश्वर ही आचार्य होता है। बाकी के अखाड़ों में महामंडलेश्वर होते हैं। ये अखाड़े धर्म की रक्षा के लिए धर्म सेना का दायित्व निभाते हैं और शंकराचार्य के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
आज के दौर में हस्तक्षेप और रोक-टोक नहीं होने के कारण जिसके जो मन में आता है वह आचार्य और महामंडलेश्वर लिखने लगते हैं। यहां तक कि देश में कई स्वयंभू शंकराचार्य बड़ी संख्या में घूम रहे हैं, जबकि आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों के शंकराचार्य ही मान्य हैं। वर्तमान में दो पीठ द्वारका की शारदा पीठ एवं बद्रीकाश्रम की ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंदजी सरस्वती हैं, पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंदजी सरस्वती और शृंगेरी के शंकराचार्य भारती तीर्थ जी हैं। इनके अलावा जो भी शंकराचार्य लिखते हैं, वे अमान्य हैं।