‘पानीपत’ विवाद: इतिहास को जज्बात के आईने में देखने के मायने ?

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अजय बोकिल

बाॅलीवुड में इतिहास पर आधारित फिल्में बनाना, ऐतिहासिक तथ्योंि को अपने‍ हिसाब से संजोना, बदलना, ऐसी फिल्मों को लेकर बवाल मचना और इन सबके चलते फिल्म का अच्छी खासी कमाई कर जाना नई बात नहीं है। एक अर्थ में यह भी हिंदी फिल्मों का आजमाया हुआ फार्मूला है। केवल फिल्मों के नाम बदल जाते हैं, प्रवृत्ति वही रहती है। इस बार बवाल की चपेट में हाल में रिलीज फिल्म ‘पानीपत: द बिट्रेयल’ भी आ गई है। फिल्म निर्देशक आशुतोष गोवारीकर की इस ‘पीरियड फिल्म’ का राजस्थान में सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है। ‍यह विरोध मुख्यं रूप से राज्य के जाट समुदाय की अोर से हो रहा है, जिसका आरोप है कि ‘पानीपत फिल्म में तत्कालीन जाट महाराजा सूरजमल का गलत चरित्र चि‍त्रण किया गया है। इससे पूरे समाज की भावनाअों को ठेस पहुंची है। अगर निर्माता-निर्देशक फिल्म में सुधार नहीं करेंगे, तो वो फिल्म नहीं चलने देंगे। विवाद के बीच एक खबर यह है कि बाकी देश में ‘पानीपत’ ठीकठाक कमाई कर रही है। इसी के साथ यह सवाल भी उठ रहे हैं कि इतिहास आधारित फिल्मों को लेकर हम अतिसंवेदनशील क्यों हैं? फिल्म को वास्तविक इतिहास क्यों समझ लेते हैं? ऐतिहासिक चरित्रों को आराध्य मान लेना कितना उचित है? साथ में यह शंका भी कि ‘पानीपत’ का विवाद भी कहीं उसी मार्केंटिंग स्ट्रेटेजी का हिस्सा तो नहीं, जिसका अंत मोटी कमाई में होता है?
बहरहाल बात ‘पानीपत’ पर। भारत के मध्ययुगीन इतिहास में पानीपत (अब ‍हरियाणा में) ऐसी जगह है, जहां लड़ी गई तीनों निर्णायक लड़ाइयों ने देश का इतिहास और भाग्य बदला है। फिल्म जिस तीसरी पानीपत की लड़ाई पर बनी है, वह पेशवा के सेनापति सदाशिवराव भाऊ की मराठा सेनाअोंऔर अफगान शासक अहमदशाह अब्दाली की फौजों के बीच लड़ी गई थी। इस लड़ाई में भारत के कुछ मुस्लिम शासकों जैसे रोहेलखंड के नजीबुद्दौला आदि ने अब्दाली का साथ दिया तो मराठाअोंके साथ सूरजमल जाट रहे। साथ में मराठा सरदार होल्कर, सिंधिया आदि भी थे। इस भीषण लड़ाई में बहादुरी से लड़ने के बाद भी मराठों की करारी हार हुई। 14 जनवरी 1761 को लड़ी गई निर्णायक लड़ाई में खुद मुख्य सेनापति सदाशिवराव भाऊ, उनके भाई विश्वासराव भाऊ एवं कई अन्य मराठा सरदार खेत रहे। भारी नुकसान अब्दाली को भी हुआ। वह दिल्ली पर कब्जा करने का इरादा छोड़ अपने वतन को लौट गया। इस हार से जहां मराठों का पूरे भारत पर राज करने का सपना टूट गया वहीं हिंदू साम्राज्य की स्थापना की चाह भी चकनाचूर हो गई। हालांकि मराठे इस पराजय के झटके से जल्द उबरे भी, लेकिन फिर बात वैसी बनी नहीं। लेकिन इस हार ने भविष्य में अंग्रेजों के संपूर्ण भारत पर कब्जे का रास्ता साफ कर दिया। इस भयंकर लड़ाई में दोनो पक्षों के एक लाख से ज्यादा सैनिक और अन्य लोग मारे गए थे। मारे जाने वालों में मराठों का मुख्य तोपची इब्राहिम गार्दी और उसके वीर साथी भी थे। 40 हजार से ज्यादा मराठे तो युद्धबंदी के रूप में कत्ल कर दिए गए थे। पुणे में पेशवा बालाजी बाजीराव के पास इस शोकांतिका का संदेश इन मार्मिक शब्दों में पहुंचा था- ‘पानीपत में हमने 2 मोती, 27 स्वर्ण मुद्राएं और अनगिनत चांदी और तांबे के सिक्के खो दिए।‘
इस महान ऐतिहासिक घटनाक्रम में फिल्म बनाने का पूरा मसाला था, सो आशुतोष गोवारीकर ने यह काम किया। ‘लगान’ जैसी लाजवाब फिल्म बनाने वाले गोवारीकर की इस फिल्म पर सर्वाधिक आपत्ति जाट समाज को है। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि राजा सूरजमल जाट के मराठों के साथ सम्बन्ध नरम-गरम किस्म के रहे। बावजूद इसके उन्होंने पानीपत की लड़ाई में मराठों का साथ दिया, जबकि अन्य राजपूत राजाअों ने मराठों से इसलिए दूरी बना ली थी, क्योंकि वे मराठों के उनके निजी मामलों में बढ़ते हस्तक्षेप से नाराज थे। हिंदू शक्तियों के एक होने के सदाशिवराव भाऊ के आव्हान का भी उन पर कोई असर नहीं हुआ। फिल्म का ‍ करने वालों का कहना है कि इसमें सूरजमल जाट को मराठों से मदद के बदले में सौदेबाजी करते दिखाया गया है, जोकि सही नहीं है। उनके मुताबिक फिल्म में सूरजमल मराठो की मदद के बदले आगरे का किला और इमाद को दिल्ली का वजीर बनाने की शर्त रखते हैं। आपत्ति इस बात पर भी है कि सूरजमल को फिल्म में हरियाणवी और राजस्थानी बोलते दिखाया गया है, जबकि वे उस जमाने में उत्तर भारत में प्रचलित ब्रज भाषा के भी अच्छे जानकार थे। यहां तक कि महाराजा सूरजमल की 14 पीढ़ी के वशंज विश्वेन्द्र सिंह भी महाराजा के इस तरह चित्रण से आहत हैं। उन्होंने कहा कि महाराजा ने सौदेबाजी करना तो दूर युद्ध में हार के बाद बचे मराठाअोंतथा पेशवा के परिजनों की भरपूर मदद ही की थी। हालां‍‍कि यह भी सच है कि इस लड़ाई में मराठों की पराजय के बाद महाराजा सूरजमल को उत्तर भारत में अपने राज्य विस्तार में आसानी हो गई थी।
जो मुद्दा उठाया गया है, वह भावनात्मक ज्यादा लगता है बजाए ऐतिहासिक तथ्यों को विद्रूप करने के। इस तरह की वफादारियां, निजी स्वार्थों के आधार पर लामबंदियां, छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव, एक दूसरे पर हमले, लूट आदि उस जमाने की सामान्य बातें थीं। इसके बाद भी भारतीय इतिहास में महाराजा सूरजमल का महत्व कम नहीं होता। जहां तक मराठाअोंकी पराजय का प्रश्न है तो उन्होंने बहुत सी रणनीतिक गलतियां कीं, जिसका दुष्परिणाम उनकी करारी हार में हुआ। सबसे बड़ी गलती तो उन सदाशिवराव भाऊ को मराठा सेना की कमान सौंपना था, जिन्हें उत्तर भारत में युद्ध, राजनीति और मौसम का कोई अनुभव नहीं था। सदाशिवराव वीर और तेजस्वी योद्धा थे, लेकिन उन्होंने सारी कामयाबियां दक्षिण भारत में हासिल की थीं। इसके अलावा मराठा सेना के साथ बहुत बड़ी भीड़ उन तीर्थ यात्रियों और असैनिकों की थी, जो युद्ध के बहाने उत्तर भारत में पुण्यार्जन के लिए निकले थे। मराठा फौज पर वास्तव में वो बोझ ही थे। कहते हैं कि महाराजा सूरजमल ने सदाशिव राव भाऊ को इन सब खतरों और दिक्कतों से आगाह किया था, लेकिन भाऊ शायद ‍अति आत्मविश्वास में थे। न केवल मराठा बल्कि भारतीय इतिहास में भी पानीपत के इस तीसरे युद्ध का बहुत ज्यादा महत्व है। इतिहासकारों ने भी इस पर काफी कुछ लिखा है। मराठी भाषा में तो ‘पानीपत होना’ जुमला किसी भयंकर ट्रेजिडी का पर्याय बन चुका है। एक और प्रचलित मुहावरा है ‘विश्वास गेला पानीपताकत’ यानी पानीपत में विश्वास गंवा दिया। यहां विश्वास का एक अर्थ विश्वासराव भाऊ है।
पानीपत का ताजा विवाद कितने दिन चलेगा, कहना मुश्किल है। फिलहाल राजस्थान में कई मल्टीप्लेक्सों और सिनेमाघरों में ‘पानीपत’ के शो रद्द कर दिए गए हैं। राज्य सरकार ने लोगों की आपत्तियों को लेकर फिल्म के वितरकों से जवाब मांगा है। उधर जाट समुदाय का एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्य के मुख्य सचिव से मिलकर फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। पिछले साल हम ऐसे ही नजारे संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर देख चुके हैं। तब करणी सेना ने यह कहकर आसमान सर पर उठा लिया था कि इसमें रानी पद्मिनी का गलत ‍चित्रण हुआ है। इसको लेकर काफी हिंसा भी हुई। इन सबके बाद जो फिल्म रिलीज हुई तो पता चला कि उसमें वैसा कुछ था ही नहीं, जिसकी आंशका में इतना उपद्रव हुआ। आखिर इस फिल्म का उद्देश्य केवल मनोरंजन ही था। लेकिन तब भी इतिहास को जज्बात के आईने में देखने की कोशिश की गई। अलबत्ता जो ‘पद्मावती’ 180 करोड़ रू. में बनी थी, वह 307 करोड़ रू. कमा गई। अब गोवारीकर की ‘पानीपत’ 85 करोड़ में बनी है। विवाद शुरू होने के बीच फिल्म की पहले तीन दिन की कमाई साढ़े 17 करोड़ रू. बताई जा रही है। आगे का पैटर्न क्या होगा, देखने की बात है। इसका भी ‘पानी-पत’ होगा या फिर पानी और चढ़ेगा…?